उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले प्रियंका गांधी के सामने कांग्रेस को मजबूत बनाने और सपा के साथ सीट बंटवारे में संतुलन साधने की चुनौती है। क्या कांग्रेस अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर पाएगी?

Editorial : उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से आकार लेने लगी हैं। भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने राजनीतिक समीकरण साधने में जुटी हैं। इसी बीच कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा को उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारी और संगठन से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी सौंपे जाने ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को दोबारा मजबूत राजनीतिक ताकत बना पाएंगी या फिर पार्टी की राजनीति सपा के साथ गठबंधन और सीटों के बंटवारे तक ही सीमित रह जाएगी? वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का राजनीतिक आकलन इस सवाल को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर देता है। उनके विश्लेषण के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबला करने से पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना है। पार्टी के सामने संगठन खड़ा करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और जीतने योग्य उम्मीदवार तैयार करने की चुनौती है। ऐसे में सीटों की बड़ी दावेदारी और वास्तविक चुनावी ताकत के बीच संतुलन बनाना प्रियंका गांधी के लिए आसान नहीं होगा।

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार
तीन नवंबर को प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर संगठन, चुनावी समितियों, प्रचार अभियान और समाजवादी पार्टी के साथ संभावित सीट बंटवारे पर चर्चा की। दिवाली के बाद गठबंधन को लेकर बातचीत आगे बढ़ाने की बात भी सामने आई। इसके साथ ही 'वोट चोरी' के मुद्दे पर प्रदेश में रैलियां आयोजित करने की तैयारी है। हालांकि, अभी तक सीटों के बंटवारे को लेकर कोई अंतिम सहमति नहीं बनी है। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति की असली परीक्षा होगी। पार्टी को यह तय करना होगा कि वह कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है और कितनी सीटों पर उसके पास जीतने की वास्तविक क्षमता है। कांग्रेस के सामने केवल चुनावी सभाएं करने या बड़े नेताओं को मैदान में उतारने की चुनौती नहीं है। उसे जिला स्तर पर संगठन को सक्रिय करना होगा। विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत नेतृत्व तैयार करना होगा और बूथ स्तर पर ऐसी टीम बनानी होगी, जो चुनाव के दिन तक मतदाताओं से संपर्क बनाए रख सके।
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प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ी भूमिका मिलने के बाद कांग्रेस को उनसे काफी उम्मीदें हैं। लेकिन पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि केवल बड़े प्रचार अभियान और लोकप्रिय नारों से चुनावी सफलता हासिल करना आसान नहीं है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई थी। उस चुनाव में कांग्रेस प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से केवल रायबरेली जीत सकी थी। अमेठी में राहुल गांधी को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने महिला-केंद्रित अभियान चलाया। 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' जैसे नारे के साथ उन्होंने प्रदेश में व्यापक प्रचार किया। इसके बावजूद कांग्रेस 403 विधानसभा सीटों में से केवल दो सीटें जीत सकी और उसका वोट प्रतिशत 2.33 प्रतिशत रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। वहीं समाजवादी पार्टी ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें हासिल कीं। इन नतीजों ने कांग्रेस को कुछ राजनीतिक राहत जरूर दी, लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में भी दोहराया जा सकेगा?
2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन सीटों के बंटवारे में दोनों दलों की राजनीतिक हैसियत और जमीनी ताकत निर्णायक भूमिका निभाएगी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीतकर 32.06 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि कांग्रेस केवल दो सीटों पर सिमट गई थी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा ने प्रदेश में 37 सीटें जीतकर अपनी मजबूत स्थिति दिखाई। ऐसे में अखिलेश यादव के सामने कांग्रेस की सीटों की मांग का सवाल केवल गठबंधन की मजबूरी या राजनीतिक रिश्तों से तय नहीं होगा। सपा यह देखना चाहेगी कि कांग्रेस किन विधानसभा क्षेत्रों में अपने दम पर मुकाबला करने की स्थिति में है। कांग्रेस की ओर से 125 से लेकर 175 सीटों तक की दावेदारी की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल जीत की संभावना का है। केवल लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों में बेहतर प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में जीत की गारंटी नहीं माना जा सकता। उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय समीकरण, संगठन की सक्रियता और बूथ प्रबंधन जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर क्षेत्र का अपना अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरण है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, जाट, मुस्लिम और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण है। अवध क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का पुराना संगठन कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकता है। बुंदेलखंड में कांग्रेस को मजबूत स्थानीय चेहरे और सक्रिय कार्यकर्ताओं की जरूरत होगी। वहीं पूर्वांचल में जातीय समीकरण, स्थानीय नेताओं का प्रभाव और भाजपा का संगठन चुनावी मुकाबले को जटिल बनाते हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए पूरे प्रदेश में एक जैसी रणनीति कारगर नहीं होगी। उसे हर विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर अपनी तैयारी करनी होगी। सबसे अहम सवाल यह है कि कांग्रेस के पास कितने ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां उसका उम्मीदवार अपने दम पर चुनावी मुकाबला कर सकता है? कितनी जिला इकाइयां सक्रिय हैं? कितने बूथों पर प्रशिक्षित कार्यकर्ता मौजूद हैं? और कितने पुराने नेता पार्टी के लिए जमीन पर काम कर रहे हैं? इन सवालों के जवाब ही कांग्रेस की वास्तविक चुनावी ताकत तय करेंगे।
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उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों को केवल गठबंधन और सत्ता विरोधी मुद्दों पर निर्भर नहीं रहना होगा। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें और 41.29 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। उसके सामने मुकाबले के लिए कांग्रेस और सपा को बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं, किसानों, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करने होंगे। वर्ष 2017 का सपा-कांग्रेस गठबंधन भी विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक है। उस समय दोनों दलों ने साझा प्रचार अभियान और बड़े नारों के साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। गठबंधन के बावजूद यदि दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के उम्मीदवार को स्वीकार नहीं करते हैं, तो चुनावी रणनीति कमजोर पड़ सकती है। इसलिए 2027 में गठबंधन की सफलता केवल सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि दोनों दलों के बीच जमीनी तालमेल से तय होगी।
प्रियंका गांधी के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक सक्रियता पैदा करना। दूसरी, समाजवादी पार्टी के साथ बातचीत में ऐसी सीटों की मांग करना, जहां कांग्रेस के पास जीतने की वास्तविक संभावना हो। यदि कांग्रेस अपनी राजनीतिक ताकत से अधिक सीटों की मांग करती है तो गठबंधन की बातचीत में टकराव पैदा हो सकता है। वहीं यदि पार्टी अपनी दावेदारी बहुत सीमित कर देती है तो उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पर असर पड़ सकता है। इसका समाधान सीटों की बड़ी संख्या बताने में नहीं, बल्कि विधानसभा क्षेत्रवार मजबूत तैयारी और जीत की संभावना का स्पष्ट आकलन करने में है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह जरूर दिखाया कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक लाभ मिला। लेकिन गठबंधन से मिली सफलता को कांग्रेस के स्वतंत्र राजनीतिक पुनरुत्थान का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी।
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