क्या लोकतंत्र में असहमति के नाम पर झूठ और अराजकता को भी अधिकार माना जा सकता है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के लेख ‘असहमति और अराजकता में अंतर’ ने लोकतंत्र की मर्यादा, विपक्ष की जिम्मेदारी और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर महत्वपूर्ण बहस छेड़ी है।

राजनाथ सिंह के लेख ने छेड़ी लोकतंत्र की मर्यादा, विपक्ष की जिम्मेदारी और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बड़ी बहस
चेतना मंच | दृष्टिकोण
विशेष संपादकीय
Editorial : लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में नहीं है कि देश के सभी नागरिक एक ही विचार से सहमत हों। लोकतंत्र की असली खूबसूरती इस बात में है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग एक-दूसरे के विचारों को सुन सकें, सत्ता से सवाल पूछ सकें, नीतियों का विरोध कर सकें और असहमति के बावजूद संवैधानिक व्यवस्था में अपना विश्वास बनाए रखें। लेकिन जब विचारों की जगह पूर्वाग्रह, तथ्यों की जगह आरोप और संवाद की जगह टकराव लेने लगे, तब लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का लेख ‘असहमति और अराजकता में अंतर’ इसी महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाता है। इस लेख में उन्होंने राजनीतिक विमर्श में बढ़ती भ्रामक सूचनाओं, कथित दुष्प्रचार, संवैधानिक संस्थाओं पर उठते सवालों और लोकतांत्रिक विरोध की मर्यादा पर चिंता व्यक्त की है। उनका मूल तर्क है कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इस अधिकार को झूठ और अराजकता का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। चेतना मंच की दृष्टि में यह विषय किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार तक सीमित नहीं है। यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़ा सवाल है। इस पर विचार करते समय सत्ता और विपक्ष, दोनों की भूमिका, जिम्मेदारी और जवाबदेही को समान गंभीरता से समझना आवश्यक है। Editorial
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भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को इसलिए नहीं अपनाया कि यहां सरकार के प्रत्येक निर्णय को सही मानकर स्वीकार कर लिया जाए। भारत ने लोकतंत्र इसलिए चुना क्योंकि यहां नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने और सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार प्राप्त है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल चुनाव लड़ना या सरकार बनाने का प्रयास करना नहीं है। विपक्ष का दायित्व सरकार की कमियों को सामने लाना, जनहित के मुद्दों को उठाना, सरकारी फैसलों की समीक्षा करना और जनता के सामने वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना भी है। इसी प्रकार लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व भी केवल बहुमत के आधार पर शासन चलाना नहीं है। सरकार को यह समझना होता है कि चुनाव में मिला जनादेश उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी प्रत्येक नीति, निर्णय और कार्रवाई आलोचना से परे हो जाती है। यहीं से स्वस्थ असहमति और राजनीतिक टकराव के बीच अंतर स्पष्ट होता है। यदि कोई नागरिक, पत्रकार, सामाजिक संगठन या विपक्षी दल किसी सरकारी निर्णय पर सवाल उठाता है, तो केवल सवाल उठाने के कारण उसे लोकतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता। यदि कोई विपक्षी नेता किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर प्रश्न उठाता है, तो उस प्रश्न की जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।
लोकतंत्र में सवालों का जवाब सवाल पूछने वाले की राजनीतिक पहचान देखकर नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर दिया जाना चाहिए। Editorial
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राजनाथ सिंह के लेख का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष असहमति और अराजकता के बीच अंतर करने का आग्रह है। इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि कई बार राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में विरोध और अव्यवस्था के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है। असहमति का अर्थ है किसी निर्णय, नीति, विचार या व्यवस्था से सहमत न होना और उसके विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत करना। इसके लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सार्वजनिक बहस, लेखन, न्यायिक प्रक्रिया, संसदीय चर्चा और चुनाव जैसे लोकतांत्रिक माध्यम उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठे तथ्यों का सहारा लेकर समाज में भ्रम फैलाता है, हिंसा को उकसाता है, प्रमाणों की जांच किए बिना गंभीर आरोपों को सत्य की तरह प्रचारित करता है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने के लिए गैरकानूनी रास्ते अपनाता है, तो ऐसे आचरण की आलोचना और जांच होनी चाहिए। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। सरकार की आलोचना, विरोध प्रदर्शन या किसी संवैधानिक संस्था से जवाब मांगना अपने आप में अराजकता नहीं है। इसी प्रकार किसी आंदोलन के दौरान असुविधा पैदा होने मात्र से उसके प्रत्येक सहभागी को व्यवस्था विरोधी नहीं कहा जा सकता। निर्णायक बात यह है कि विरोध का उद्देश्य क्या है, उसके तरीके क्या हैं और उसके पीछे प्रस्तुत किए जा रहे तथ्यों की विश्वसनीयता कितनी है। लोकतंत्र की परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि वह अपने समर्थकों को कितनी स्वतंत्रता देता है, बल्कि इससे भी होती है कि वह अपने आलोचकों के अधिकारों की कितनी रक्षा करता है। Editorial
रक्षा मंत्री ने अपने लेख में ‘पोस्ट-ट्रुथ’ की अवधारणा का उल्लेख किया है। इसका आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें सार्वजनिक बहस में प्रमाणित तथ्यों की तुलना में भावनाओं, पूर्वधारणाओं और बार-बार दोहराए जाने वाले दावों का प्रभाव अधिक हो जाता है। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में यह चुनौती और गंभीर हो गई है। कोई अधूरी जानकारी, पुराना वीडियो, संदर्भ से अलग किया गया बयान या अपुष्ट दावा कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। बाद में यदि उसका खंडन भी सामने आए, तब भी पहली सूचना से बनी धारणा पूरी तरह समाप्त नहीं होती। राजनीति में इसका इस्तेमाल कई तरह से हो सकता है। किसी घटना को उसके पूरे संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत करना, किसी आंकड़े का चुनिंदा इस्तेमाल करना, किसी न्यायिक आदेश के केवल एक हिस्से को प्रचारित करना या किसी आरोप को बार-बार दोहराकर उसे स्थापित तथ्य जैसा बना देना जनमत को प्रभावित कर सकता है।
लेकिन इस समस्या का समाधान केवल विपक्ष को चेतावनी देने से नहीं होगा। सत्ता पक्ष, विपक्ष, मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया मंचों और आम नागरिकों—सभी को सूचना की विश्वसनीयता के प्रति जिम्मेदार होना पड़ेगा। यदि सरकार कोई दावा करती है, तो उस दावे का भी परीक्षण होना चाहिए। यदि विपक्ष किसी घोटाले, अनियमितता या संस्थागत विफलता का आरोप लगाता है, तो उसके पास भी प्रमाण होने चाहिए। लोकतंत्र में किसी दावे की सत्यता इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसे कौन कर रहा है। उसका मूल्यांकन तथ्यों, प्रमाणों और निष्पक्ष जांच से होना चाहिए। Editorial
राजनाथ सिंह ने अपने लेख में निर्वाचन आयोग, ईवीएम और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठने वाले राजनीतिक विवादों का उल्लेख किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कुछ विपक्षी नेता इन मुद्दों पर संदेह पैदा करके संवैधानिक संस्थाओं की साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस विषय को समझने के लिए दो सिद्धांतों को एक साथ स्वीकार करना आवश्यक है। पहला, संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र की आधारशिला हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कानून का शासन और संस्थागत निरंतरता के बिना लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। इसलिए किसी संस्था के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाने वाले व्यक्ति या संगठन को अपने दावों के समर्थन में विश्वसनीय तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए। दूसरा, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि उनके प्रत्येक निर्णय या प्रक्रिया पर सवाल उठाना अनुचित हो जाए। किसी संस्था की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तव में, पारदर्शिता और जवाबदेही से ही संस्थाओं के प्रति सार्वजनिक विश्वास मजबूत होता है। यदि मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाए जाने की शिकायत है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी चुनावी प्रक्रिया को लेकर तकनीकी या प्रशासनिक सवाल उठाए जाते हैं, तो उनका जवाब उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दिया जाना चाहिए। इसी तरह यदि कोई आरोप जांच में निराधार पाया जाता है, तो उसे तथ्य के रूप में प्रचारित करना भी गलत है। किसी संस्था की विश्वसनीयता केवल इस बात से नहीं बचती कि उसके आलोचकों को चुप करा दिया जाए। उसकी विश्वसनीयता इस बात से भी बढ़ती है कि वह उचित सवालों के उत्तर देने और अपनी प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने में सक्षम हो। यही संतुलन लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करता है। Editorial
रक्षा मंत्री ने अपने लेख में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित विवादों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ठोस तथ्यों के बिना संदेह फैलाना उचित नहीं है।
इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि न्यायालय के निर्णयों का सम्मान करना संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से विवादों का समाधान लोकतंत्र को संस्थागत आधार देता है। साथ ही, किसी फैसले पर असहमति जताने, उसके कानूनी तर्कों पर चर्चा करने या कानून के दायरे में अपील करने का अधिकार भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौजूद है। न्यायपालिका के निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा और न्यायपालिका को बदनाम करने के उद्देश्य से निराधार आरोप लगाने के बीच अंतर किया जाना चाहिए। किसी फैसले से असहमत होने का अर्थ न्यायपालिका का अपमान करना नहीं है। इसी प्रकार किसी फैसले का राजनीतिक लाभ के लिए गलत अर्थ प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है। यह सिद्धांत सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। Editorial
राजनाथ सिंह का लेख मुख्य रूप से विपक्ष के कुछ नेताओं की राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं पर उठाए जा रहे सवालों की आलोचना करता है। लेकिन लोकतंत्र की व्यापक तस्वीर देखते हुए यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सत्ता पक्ष स्वयं असहमति के प्रति कैसा व्यवहार करता है। यदि विपक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत करता है, तो सरकार को प्रमाणों के साथ उनका खंडन करना चाहिए। यदि कोई आरोप निराधार है, तो तथ्यों और जांच के माध्यम से उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। लेकिन यदि सरकार की आलोचना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को विरोधी, राष्ट्रविरोधी या अराजकता फैलाने वाला बताने की प्रवृत्ति विकसित हो जाए, तो इससे स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। लोकतंत्र में सरकार के पास प्रशासनिक अधिकार होते हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ अतिरिक्त जिम्मेदारी भी आती है। सरकार को अपने निर्णयों के औचित्य की व्याख्या करनी होती है और जनता की शिकायतों को सुनना होता है। किसी नीति के खिलाफ उठने वाला विरोध कभी-कभी सरकार को अपनी कमियों का एहसास भी कराता है। सार्वजनिक असंतोष के बाद नीतियों की समीक्षा करना लोकतांत्रिक कमजोरी नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही का संकेत हो सकता है। इसलिए असहमति और अराजकता के बीच अंतर निर्धारित करते समय केवल विपक्ष के आचरण की नहीं, बल्कि सत्ता के व्यवहार की भी समीक्षा होनी चाहिए। Editorial
राजनाथ सिंह ने अपने लेख में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी का उल्लेख किया है, जिसे सामान्यतः ‘ग्रामर ऑफ अनार्की’ के नाम से जाना जाता है।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में अपने अंतिम संबोधन के दौरान संवैधानिक तरीकों को अपनाने के महत्व पर बल दिया था। उनका संदेश यह था कि जब लोगों के पास अपने अधिकारों और मांगों को व्यक्त करने के लिए संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाले असंवैधानिक तरीकों से सावधान रहना चाहिए। यह चेतावनी आज भी प्रासंगिक है। लेकिन इसकी प्रासंगिकता तभी पूरी तरह समझी जा सकती है, जब इसे संविधान के दूसरे मूल्यों के साथ पढ़ा जाए। संविधान केवल व्यवस्था बनाए रखने का दस्तावेज नहीं है। वह नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता, न्याय और गरिमा की रक्षा का भी आधार है। वह सरकार को अधिकार देता है, लेकिन साथ ही उन अधिकारों पर संवैधानिक सीमाएं भी निर्धारित करता है। इसलिए संवैधानिक तरीकों के प्रति प्रतिबद्धता का अर्थ केवल विरोध करने वालों से नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह भी है कि सरकार कानून के शासन का पालन करे, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे और लोकतांत्रिक असहमति के लिए पर्याप्त स्थान बनाए रखे। संविधान की रक्षा एकतरफा जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है। Editorial
आज लोकतंत्र के सामने एक बड़ी चुनौती सूचना की गति और उसकी विश्वसनीयता के बीच संतुलन स्थापित करने की है। समाचार माध्यमों पर यह जिम्मेदारी है कि वे किसी राजनीतिक आरोप को बिना जांचे प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत न करें। किसी व्यक्ति या संस्था पर गंभीर आरोप लगाने से पहले संबंधित पक्ष का दृष्टिकोण लेना, दस्तावेजों की जांच करना और दावों का संदर्भ स्पष्ट करना पत्रकारिता की बुनियादी आवश्यकताएं हैं। इसी प्रकार पाठकों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे किसी सनसनीखेज संदेश को बिना सत्यापन के आगे न बढ़ाएं। किसी नेता का बयान समाचार हो सकता है, लेकिन उस बयान में लगाया गया आरोप अपने आप में प्रमाणित तथ्य नहीं बन जाता। समाचार, आरोप, प्रतिक्रिया और न्यायिक निष्कर्ष—इन सभी के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। यदि मीडिया केवल राजनीतिक पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप को दोहराता रहे और तथ्यों की स्वतंत्र जांच न करे, तो वह जनता को जागरूक बनाने के अपने दायित्व को पूरा नहीं कर पाएगा। लोकतंत्र में सत्य की रक्षा केवल न्यायालयों या सरकारी संस्थाओं का काम नहीं है। यह जिम्मेदारी सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक सहभागी की है। Editorial
राजनाथ सिंह ने अपने लेख के अंतिम हिस्से में राजनीतिक समानता के साथ आर्थिक और सामाजिक न्याय के महत्व को भी स्वीकार किया है। यही वह बिंदु है, जहां लोकतंत्र की बहस को चुनावी राजनीति से आगे ले जाने की आवश्यकता है। लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि चुनाव समय पर हुए या सरकार को बहुमत मिला। यह भी देखना होगा कि आम नागरिक को न्याय कितनी आसानी से मिलता है, युवाओं को रोजगार के अवसर कितने उपलब्ध हैं, गरीब और वंचित वर्गों को शिक्षा तथा स्वास्थ्य की सुविधाएं कितनी सुलभ हैं और प्रशासनिक व्यवस्था आम लोगों की समस्याओं का समाधान कितनी संवेदनशीलता से करती है। यदि किसी नागरिक की शिकायत लंबे समय तक अनसुनी रहती है, यदि किसी समुदाय को न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है या यदि आर्थिक असमानता के कारण लोगों के अवसर सीमित हो जाते हैं, तो लोकतंत्र को इन सवालों का भी उत्तर देना होगा। असहमति को केवल राजनीतिक व्यवस्था के लिए चुनौती मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा। कई बार असहमति सामाजिक समस्याओं, प्रशासनिक कमियों और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को सामने लाती है। एक परिपक्व लोकतंत्र वह है जो निराधार आरोपों और हिंसक अव्यवस्था पर रोक लगाने में सक्षम हो, लेकिन वास्तविक शिकायतों को सुनने और उनका समाधान करने के लिए भी तत्पर रहे। Editorial
भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी विशाल जनसंख्या, आर्थिक क्षमता या सामरिक शक्ति नहीं है। उसकी बड़ी ताकत यह भी है कि अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों, संस्कृतियों और विचारधाराओं वाले करोड़ों नागरिक एक साझा संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत रहते हैं। इस विविधता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक मतभेदों को दुश्मनी में न बदला जाए। सरकार बदलने की इच्छा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सत्ता में बने रहने की आकांक्षा भी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन इन दोनों के बीच अंतिम निर्णय जनता के मत और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से ही होना चाहिए। यदि किसी दल को जनता का समर्थन नहीं मिलता, तो उसके लिए रास्ता संगठन को मजबूत करना, अपनी नीतियों की समीक्षा करना और जनता के बीच विश्वास अर्जित करना है। इसी तरह यदि सरकार की नीतियों से जनता असंतुष्ट है, तो विपक्ष का दायित्व उस असंतोष को तथ्यों, नीतिगत विकल्पों और संवैधानिक आंदोलनों के माध्यम से व्यक्त करना है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र को ऊर्जा देती है। लेकिन जब प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य केवल विरोधी को बदनाम करना रह जाए, तब लोकतंत्र का वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाता है। देश का भविष्य किसी एक राजनीतिक दल की सफलता या विफलता से बड़ा है। इसलिए राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों और वक्तव्यों में राष्ट्रीय हित, नागरिक अधिकार और संवैधानिक मर्यादा को प्राथमिकता देनी चाहिए। Editorial
राजनाथ सिंह के लेख ने लोकतंत्र में असहमति और अराजकता के बीच अंतर करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इस प्रश्न पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि वहां विरोध को किस प्रकार देखा और संभाला जाता है। चेतना मंच का मानना है कि लोकतंत्र में न तो झूठे दावों और जानबूझकर फैलाए गए भ्रम को संरक्षण मिलना चाहिए और न ही वास्तविक असहमति को अराजकता का नाम देकर खारिज किया जाना चाहिए। यदि विपक्ष गलत जानकारी फैलाता है, तो उसकी तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए। यदि सरकार कोई ऐसा निर्णय लेती है जिस पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उसे भी पारदर्शी तरीके से जवाब देना चाहिए। यदि कोई संवैधानिक संस्था अपना दायित्व निभाने में विफल रहती है, तो उसकी जवाबदेही तय करने के वैधानिक रास्ते खुले रहने चाहिए। लोकतंत्र में विश्वास केवल अपील करने से नहीं बनता। विश्वास निष्पक्ष व्यवहार, पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों के सम्मान से बनता है। इसी तरह राष्ट्रीय हित का अर्थ यह नहीं कि सभी नागरिक हर राजनीतिक मुद्दे पर एक ही राय रखें। राष्ट्रीय हित का अर्थ यह है कि मतभेदों के बावजूद संविधान, कानून, देश की एकता और नागरिकों की गरिमा को सर्वोपरि रखा जाए। लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है। लेकिन असहमति को प्रभावशाली बनाने के लिए सत्य, तर्क और जिम्मेदारी का साथ आवश्यक है। भारत को ऐसे लोकतांत्रिक वातावरण की आवश्यकता है जिसमें सरकार सवालों से असहज न हो, विपक्ष तथ्यों से दूर न भागे, मीडिया सत्यापन से समझौता न करे और नागरिक भावनात्मक उत्तेजना के बजाय विवेक के आधार पर राय बनाएं।आखिरकार लोकतंत्र की रक्षा केवल सत्ता की रक्षा नहीं है, केवल विपक्ष की राजनीति नहीं है और केवल संस्थाओं की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी नहीं है। लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ उस व्यवस्था की रक्षा करना है, जिसमें नागरिक स्वतंत्रता के साथ जी सकें, अपनी बात कह सकें, न्याय मांग सकें और बिना भय के अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले सकें। Editorial
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