मेहसाणा के वडनगर में 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन मनाया जा रहा था। देशभर की नजर उस दिन उनकी जन्मभूमि वडनगर पर थी, लेकिन चेतना मंच की टीम के लिए यह यात्रा एक ऐसी मानवीय मुलाकात की वजह से यादगार बन गई, जिसने वडनगर की एक अलग तस्वीर सामने रखी।

दृष्टिकोण | आर.पी. रघुवंशी, संपादक — चेतना मंच
मेहसाणा, गुजरात के वडनगर की धरती पर कदम रखते हुए मेरे मन में एक स्वाभाविक उत्सुकता थी। आखिर यही वह स्थान है, जिसे आज पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि के रूप में जानता है। लेकिन वडनगर पहुंचने के बाद मुझे महसूस हुआ कि किसी स्थान की पहचान केवल किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से नहीं बनती। कभी-कभी उस मिट्टी में छिपी कोई दूसरी कहानी उससे भी अधिक गहरी होती है। 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर जब चेतना मंच समाचार पत्र और चेतना मंच न्यूज़ पोर्टल की पूरी टीम वडनगर पहुंची, तब हमारे लिए यह केवल एक पत्रकारिता यात्रा नहीं थी। यह उस धरती को अपनी आंखों से देखने का अवसर था, जिसके बारे में देश वर्षों से सुनता आया है। और इसी यात्रा में मेरी मुलाकात हुई उस व्यक्तित्व से, जिसे स्नेह से ‘सोम दादा’ कहने का मन करता है। मेरे लिए वडनगर की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि देखना नहीं, बल्कि सोम दामोदरदास मोदी के सान्निध्य में कुछ समय बिताना रहा।
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वडनगर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि के कारण विश्वभर में जाना जाता है। लेकिन यह नगर केवल आधुनिक राजनीतिक पहचान का नाम नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वडनगर का इतिहास बहुत पुराना है और यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन से जुड़े स्थल भी आज लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। 17 सितंबर को जब देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मना रहा था, तब वडनगर में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए। शर्मिष्ठा झील की महाआरती, सेवा संकल्प अभियान, स्वच्छता और जनभागीदारी से जुड़े कार्यक्रमों ने जन्मभूमि को एक बड़े सार्वजनिक आयोजन का केंद्र बना दिया। लेकिन मेरी नजर उस बड़े आयोजन से हटकर वडनगर के उस हिस्से पर चली गई जहां एक बुजुर्ग व्यक्ति वर्षों से वृद्धजनों की सेवा से जुड़ा हुआ है। वह व्यक्ति हैं—सोम दामोदरदास मोदी।

चेतना मंच की टीम के वरिष्ठ सहयोगी राजकुमार चौधरी ने सोम दादा से बातचीत के दौरान एक सवाल पूछा। बातचीत में सोम दादा ने जो बात कही, उसने हम सभी को एक क्षण के लिए चौंका दिया। उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री के भाई नहीं हैं। एक क्षण के लिए ऐसा लगा कि शायद बात ठीक से सुनी नहीं गई। लेकिन अगला वाक्य आया तो पूरा अर्थ सामने आ गया। सोम दादा का आशय था— “मैं प्रधानमंत्री का भाई नहीं हूं, मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी का बड़ा भाई हूं।” यह केवल शब्दों का खेल नहीं था। इस एक वाक्य में मुझे दो भाइयों के रिश्ते की एक पूरी दुनिया दिखाई दी। एक तरफ नरेंद्र दामोदरदास मोदी हैं, जो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। दूसरी तरफ सोम दामोदरदास मोदी हैं, जो अपने छोटे भाई की प्रधानमंत्री वाली पहचान से स्वयं को अलग रखते हुए उन्हें उसी नाम से याद करते हैं, जिस नाम से शायद बचपन में पुकारा जाता रहा होगा—नरेंद्र। सोम दादा की इसी भावना का उल्लेख पहले भी सार्वजनिक रिपोर्टों में हुआ है। 2015 के एक कार्यक्रम के संदर्भ में इंडिया टुडे ने लिखा था कि जब उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बड़ा भाई बताया गया तो सोमभाई मोदी ने स्वयं को प्रधानमंत्री के बजाय नरेंद्र का भाई बताया और कहा कि प्रधानमंत्री के लिए देश के करोड़ों लोग भाई-बहन हैं।
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पत्रकारिता में चार दशक से अधिक समय बिताने के बाद मैंने बहुत से बड़े लोगों को करीब से देखा है। सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक, बड़े पदों पर बैठे लोगों से लेकर जमीन पर संघर्ष करने वाले सामान्य लोगों तक—जीवन ने बहुत कुछ दिखाया है। इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में मेरी राय केवल इसलिए नहीं बनती कि वह किसी बड़े व्यक्ति का रिश्तेदार है। सोम दादा के बारे में मेरी व्यक्तिगत अनुभूति भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। यदि सोम दामोदरदास मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई न भी होते, तब भी उनके साथ हुई मुलाकात के बाद मेरी पत्रकारिता की दृष्टि यही कहती कि सामने बैठा व्यक्ति सामान्य अर्थों में साधारण जीवन जीने वाला जरूर हो सकता है, लेकिन उसके जीवन की प्राथमिकताएं साधारण नहीं हैं। उनकी दुनिया सत्ता से दूर है। उनका केंद्र वृद्धजन हैं। उनका समय सेवा में बीतता है। और शायद यही वजह है कि उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके रिश्ते को जानना पर्याप्त नहीं है।
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प्रधानमंत्री के बड़े भाई से अधिक—एक सेवाभावी व्यक्ति
सोमभाई मोदी वडनगर में वृद्धजनों की सेवा से जुड़े रहे हैं। इंडिया टुडे की एक विस्तृत रिपोर्ट में भी उन्हें वडनगर में बुजुर्गों के लिए संचालित सुविधा से जुड़े व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था। वहीं 2021 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में वडनगर स्थित वृद्धाश्रम का उल्लेख किया गया, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई मोदी संचालित करते हैं। यानी उनकी सार्वजनिक पहचान केवल इस तथ्य तक सीमित नहीं है कि वे भारत के प्रधानमंत्री के बड़े भाई हैं। उनकी अपनी एक सामाजिक भूमिका भी है। यही बात मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है। किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का रिश्तेदार होना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। लेकिन उस रिश्ते से पैदा होने वाली प्रसिद्धि से दूर रहकर वृद्धजनों के बीच जीवन बिताना एक अलग तरह की जीवन-दृष्टि अवश्य दिखाता है।

17 सितंबर 2026 को चेतना मंच की टीम के लिए यह यात्रा इसलिए भी विशेष थी क्योंकि उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन था। चेतना मंच ने उसी दिन अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि सोम दादा के आमंत्रण पर टीम वडनगर पहुंची और वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं के बीच वस्त्र-प्रसाद का वितरण किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार चौधरी, वीडियो एडिटर दीपक त्यागी तथा चेतना मंच की टीम के अन्य सदस्य मौजूद थे।
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मेरे लिए उस दिन का सबसे बड़ा दृश्य कोई राजनीतिक मंच नहीं था। वह दृश्य था—वृद्ध महिलाओं के बीच बैठना। उनसे मिलना। उनके चेहरे देखना। उनके हाथों में वस्त्र और प्रसाद देना। और यह महसूस करना कि किसी जन्मदिन का अर्थ केवल बधाइयों और समारोहों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देशभर में राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम हुए। गुजरात में भी सेवा, स्वच्छता, पौधारोपण, दीप प्रज्ज्वलन और जनभागीदारी से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए। वडनगर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की मौजूदगी में सेवा संकल्प अभियान से जुड़े कार्यक्रम हुए। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मुझे लगता है कि किसी बड़े सार्वजनिक आयोजन को समझने के लिए केवल मंच और भाषण देखना पर्याप्त नहीं होता। कभी-कभी मंच से दूर खड़ी कोई छोटी-सी तस्वीर अधिक कुछ कहती है। वडनगर के वृद्धाश्रम की वह तस्वीर मेरे लिए ऐसी ही तस्वीर थी। एक ओर देश के प्रधानमंत्री का जन्मदिन। दूसरी ओर उनके बड़े भाई का वृद्धजनों के बीच रहना। और बीच में सेवा का वह छोटा-सा प्रयास, जिसमें चेतना मंच की टीम भी सहभागी बनी।
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मैंने अपने जीवन में अनेक सम्मानित और प्रतिष्ठित लोगों से मुलाकात की है। लेकिन सोम दादा के लिए मेरे मन में जो अपनापन बना, उसे केवल पत्रकारिता की भाषा में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। मेरे लिए वह ‘सोमभाई मोदी’ से आगे बढ़कर ‘सोम दादा’ हो गए। यह संबोधन किसी औपचारिक परिचय का हिस्सा नहीं है। यह उस आत्मीयता का परिणाम है जो किसी व्यक्ति से मिलने के बाद भीतर पैदा होती है। मैं यह दावा नहीं करता कि किसी व्यक्ति को एक मुलाकात में पूरी तरह समझा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के 42 वर्षों ने मुझे इतना जरूर सिखाया है कि किसी व्यक्ति के व्यवहार, बोलने के तरीके और दूसरों के प्रति उसके रवैये से उसके जीवन की प्राथमिकताओं की झलक मिलती है। सोम दादा के साथ मेरा अनुभव इसी श्रेणी का है।
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मेरे मन में बार-बार वही बात लौटती है। आज नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनका राजनीतिक जीवन, सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय भूमिका अलग विषय हैं। लेकिन सोम दादा की बातचीत में मुझे प्रधानमंत्री नहीं, नरेंद्र दिखाई दिए। वह नरेंद्र, जो कभी अपने परिवार का छोटा भाई रहा होगा। वह नरेंद्र, जिसे बड़े भाई ने शायद उसी आत्मीयता से देखा होगा, जिस आत्मीयता से बड़े भाई छोटे भाई को देखते हैं। समय बदल गया। नरेंद्र का जीवन बदल गया। उनकी जिम्मेदारियां बदल गईं। उनकी पहचान बदल गई। लेकिन बड़े भाई के लिए वह रिश्ता शायद वहीं खड़ा है जहां से वह शुरू हुआ था। यही बात मेरे मन को छू गई।
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सोम दादा से मिलकर मेरे मन में एक बड़ा सवाल पैदा हुआ—क्या किसी व्यक्ति की पहचान उसके प्रसिद्ध रिश्ते से अलग भी हो सकती है? मेरा उत्तर है—हां। और सोम दादा इसका एक उदाहरण प्रतीत होते हैं। यदि कोई व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री का बड़ा भाई है तो स्वाभाविक रूप से लोग उसे उसी रिश्ते से पहचानेंगे। लेकिन वह व्यक्ति स्वयं अपने लिए दूसरी पहचान चुनता है—वृद्धजनों की सेवा करने वाले एक सामान्य सेवाभावी व्यक्ति की—तो उस पहचान को भी देखा जाना चाहिए। मेरी वडनगर यात्रा ने मुझे यही देखने का अवसर दिया।
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17 सितंबर को वडनगर में केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन नहीं था। मेरे लिए वह दिन एक पत्रकार के रूप में अपने भीतर झांकने का दिन भी था। हम अक्सर प्रसिद्ध लोगों के जीवन को उनकी उपलब्धियों से मापते हैं। लेकिन उनके परिवार, उनके पुराने रिश्ते और उनसे जुड़े उन लोगों को भूल जाते हैं जो प्रचार की रोशनी से दूर अपना जीवन जी रहे होते हैं।वडनगर में मुझे इसी दूसरी तस्वीर को देखने का अवसर मिला। एक तरफ नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि। दूसरी तरफ सोम दामोदरदास मोदी का सेवा-संसार। और इनके बीच एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता, जिसमें बड़े भाई के लिए देश का प्रधानमंत्री आज भी पहले ‘नरेंद्र’ है।
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वडनगर से लौटते समय मेरे मन में कोई राजनीतिक निष्कर्ष नहीं था। मेरे मन में केवल एक व्यक्तिगत इच्छा थी। यदि जीवन ने फिर अवसर दिया तो मैं सोम दादा के पास बैठना चाहूंगा। बिना कैमरे के। बिना किसी इंटरव्यू के। बिना किसी समाचार की तलाश के। बस कुछ देर उनके पास बैठकर यह समझने के लिए कि एक व्यक्ति जिसने अपने छोटे भाई को देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचते देखा, उसने स्वयं अपने जीवन का रास्ता सेवा की ओर क्यों मोड़ा। शायद ऐसे सवालों के उत्तर समाचार की सुर्खियों में नहीं मिलते। वे किसी वृद्धाश्रम के शांत कमरे में मिलते हैं। किसी बुजुर्ग के चेहरे की मुस्कान में मिलते हैं। किसी सेवाभावी व्यक्ति की दिनचर्या में मिलते हैं। और कभी-कभी किसी बड़े भाई के मुंह से निकले एक छोटे से वाक्य में मिलते हैं— “मैं प्रधानमंत्री का भाई नहीं, नरेंद्र का बड़ा भाई हूं।” मेरे लिए वडनगर की सबसे बड़ी स्मृति यही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि देखने मैं वडनगर गया था। लेकिन लौटते समय अपने साथ सोम दादा की आत्मीयता, वृद्धजनों की सेवा की तस्वीर और ‘नरेंद्र’ नाम में छिपे एक बड़े भाई के रिश्ते की कहानी लेकर लौटा। शायद यही वडनगर की वह दूसरी पहचान है, जिसे केवल नक्शे पर देखकर नहीं समझा जा सकता। इसे महसूस करने के लिए वहां जाना पड़ता है। और कभी-कभी किसी सोम दादा के पास कुछ देर बैठना पड़ता है।
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