Thursday, 18 April 2024

माह-ए-रमज़ान में रोजा रखने का रिवाज़ क्यों शुरू हुआ, जानें इसकी फज़ीलत

Ramadan Special : इस्लाम धर्म में माह-ए-रमज़ान की बहुत मान्यता है। रमज़ान का मुबारक महीना सावन के बाद शुरू होता…

माह-ए-रमज़ान में रोजा रखने का रिवाज़ क्यों शुरू हुआ, जानें इसकी फज़ीलत

Ramadan Special : इस्लाम धर्म में माह-ए-रमज़ान की बहुत मान्यता है। रमज़ान का मुबारक महीना सावन के बाद शुरू होता है जिसका मुस्लिम समुदाय के लोगों को बेहद बेसब्री से इंतजार रहता है। इस्लाम धर्म के लोगों के लिए रमज़ान (Ramadan) का महीना सबसे पाक माना जाता है। मुस्लिम समुदाय के रमज़ान का पूरा महीना रोजा रखकर, अल्लाह तआला की इबादत करते, ज़कात और फितरा आदि देकर गुजारते हैं।

Ramadan Special

Ramadan का मुबारक महीना इबादत का महीना माना जाता है। इस्लाम धर्म के मुताबिक रमज़ान के पाक महीने में जो शख्स सच्चे दिल से खुदा से दुआ मांगता है उसकी दुआ कुबूल होती है। इबादत के इस महीने में मुस्लिम लोग सूर्योदय से पहले उठकर सहरी कर लेते हैं और पूरे दिन भूखे प्यासे रहकर नमाज़ अदा करके,क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत करते हुए रब की इबादत करते हैं और शाम को सूरज डूबने के बाद रोजेदार अल्लाह तबारक व तआला का शुक्रिया अदा करते हुए लजीज़ पकवानों के साथ रोज़ा खोलते हैं।

मुसलमान के पांच फर्ज

ऐसा माना जाता है कि Ramadan के पाक महीने की शुरूआत 2 हिजरी (इस्लामिक सन) से की गई थी। ये वो वक्त था जब इस्लाम में रोज़े फर्ज कर दिए गए थे। दरअसल पैगम्बर हजरत मोहम्मद को मदीने गए हुए 2 साल पूरे हो गए थे, तभी से रोजा रखने की परम्परा शुरू हुई थी। इस्लाम धर्म के लोगों के लिए पांच फर्ज बताई गई है जिनमें कलमा, नमाज, जकात, रोजा और हज शामिल होता है। ऐसा माना जाता है कि इन पांच फर्जों का पालन करना बहुत जरूरी होता है इसलिए रोज़ा रखना बेहद जरूरी है, लेकिन आपको जानकारी के लिए बता दें कि बहुत छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, बीमारी से ग्रसित लोगों के लिए रोजा ना रखने की छूट दी गई है।

माह-ए-रमज़ान में नाजिल हुआ था क़ुरआन

कहा जाता है Ramadan के महीने में अल्लाह तआला ने हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम साहब पर मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ क़ुरआन-ए-पाक नाजिल फरमाया गया था। माहे-ए-रमज़ान को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है जैसे- रमज़ान महीने के शुरू के दस दिन रहमत, दूसरे दस दिन मग़फिरत और तीसरे दस जहन्नुम से आजादी के लिए माना जाता है।

माह-ए-रमज़ान का मकसद

माह-ए-रमज़ान इबादत, पाक और मग़फिरत के अलावा ‘क़ुरआन का महीना’ के नाम से भी जाना जाता है। Ramadan महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग ईशा की नमाज़ के बाद रात के वक्त तरावीह पढ़ते हैं और ज्यादा से ज्यादा क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत करते हुए गुजारते हैं। रमज़ान के पाक महीने में परिवार के सदस्य के हिसाब से गरीबों को ज़कात (अल्लाह तआला की राह में अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा जरूरतमंद लोगों को देना) दिया जाता है। Ramadan की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इस महीने शब्ब-ए-कदर की कई रातें आती हैं जिसमें मुसलमान पूरी रात अल्लाह तआला की इबादत करते हुए गुजारते हैं और इस रात जो दुआएं मांगी जाती है वो अल्लाह कूबूल फरमाते हैं।

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