Friday, 21 June 2024

Aditya L-1 : चांद के बाद अब भारत की सूरज पर छलांग

Aditya L-1 News : भारत की कामयाबी और सफलता पर आज दुनिया आश्चर्यचकित है। भारत ने दस दिन में ही…

Aditya L-1 : चांद के बाद अब भारत की सूरज पर छलांग

Aditya L-1 News : भारत की कामयाबी और सफलता पर आज दुनिया आश्चर्यचकित है। भारत ने दस दिन में ही चांद के बाद अब सूर्य पर छलांग लगा दी। दस दिन पूर्व चंद्रयान के चांद के दक्षिण ध्रुव पर कामयाब लैंडिग के बाद भारत का अंतरिक्ष यान सूर्य के बारे में जानकारी एकत्र करने करने के लिए रवाना हो गया। भारत के मिशन सूर्य के लिए आदित्य एल-वन का कल दो सितंबर सफलतापूर्वक प्रेक्षण हुआ। आदित्य सूर्य का अध्ययन करेगा। सूर्य के रहस्यों को खोलेगा। इससे भारत के सूर्य विज्ञान की पूरी दुनिया में धाक जमेगी। भारत के आय के साधन बढ़ेंगे। भारत के वैज्ञानिकों की दुनिया में मांग होगी।

चंद्रयान-3 की चांद के दक्षिणी ध्रुव पर कामयाब लैंडिंग के 10वें दिन इसरो ने शनिवार को आदित्य एल-वन मिशन लॉन्च कर दिया। आदित्य सूर्य की स्टडी करेगा। इसे दो सितंबर की सुबह 11.50 बजे पीएसएलवी-सी57 के एक्सएल वर्जन रॉकेट के जरिए श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से भेजा गया।

Aditya L-1 News in Hindi

सूर्य की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन

Aditya L-1 News : रॉकेट ने 63 मिनट 19 सेकेंड बाद आदित्य को 235 x 19500 किलोमीटर की पृथ्वी की ऑर्बिट में छोड़ दिया। करीब चार महीने बाद यह 15 लाख किलोमीटर दूर लैगरेंज पॉइंट-एक तक पहुंचेगा। इस पॉइंट पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ता। इसके चलते यहां से सूरज पर आसानी से रिसर्च की जा सकती है। इसरो ने बताया कि जिस सोलर सिस्टम में हमारी पृथ्वी है, उसका केंद्र सूर्य ही है। सभी आठ ग्रह सूर्य के ही चक्कर लगाते हैं। सूर्य की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन है। पृथ्वी पर जीवन पनपने की मुख्य वजह सूरज ही है। सूर्य से लगातार ऊर्जा बहती है। इन्हें हम चार्ज्ड पार्टिकल्स कहते हैं। सूर्य का अध्ययन करके ये समझा जा सकता है कि सूर्य में होने वाले बदलाव अंतरिक्ष को और पृथ्वी पर जीवन को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।

स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के डायरेक्टर नीलेश देसाई ने कहा कि जितनी जरूरी हमारे रहने के लिए पृथ्वी है, उतना ही जरूरी हमारे जीवन के लिए सूरज है। पृथ्वी पर जीवन पनपने की वजह ही सूरज है। यदि सूर्य समाप्त हो जाए, तो कुछ ही समय बाद पृथ्वी पर जीवन का भी नाश हो जाएगा। हम पृथ्वी के प्राकृतिक माहौल के अनुसार बने हैं, लेकिन सूरज पर हुआ छोटे से छोटा बदलाव भी जीवन को समाप्त कर सकता है। सूर्य की गर्मी व प्रकाश जीवन का मुख्य आधार है। हम पृथ्वी के प्राकृतिक माहौल के अनुसार बने हैं। प्रकाश का सामान्य प्रवाह, जो पृथ्वी को रोशन करता है और जीवन को संभव बनाता है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि सूरज के रहस्य इतने अनजाने हैं कि सारी दुनिया उसके बारे में जानना चाहती है। धरती से सूरज 150,920 हजार किलोमीटर दूर है और हमारा मिशन धरती से 15 लाख किलोमीटर दूर जाकर वहां स्थिर होकर स्टडी करेगा। धरती से सूरज पूरा 13 लाख गुना बड़ा है। सूरज पर अब तक दुनिया की स्पेस एजेंसियों के गिने-चुने मिशन ही गए। इस लिहाज से भारत का ये मिशन काफी अहम है। सूर्य हमारा सबसे नजदीकी सितारा है और इसलिए हम उसे दूसरे सितारों से ज्यादा अच्छे से देख सकते हैं। सूर्य का अध्ययन करने से हमें दूसरे सितारों के बारे में भी ज्यादा जानकारी प्राप्त होगी। इससे हमारी इस ब्रह्मांड की समझ थोड़ी और बढ़ेगी। सूर्य से ही पृथ्वी पर सब जीवन को ऊर्जा मिलती है, लेकिन सूर्य में विस्फोटक घटनाएं भी होती हैं। ये घटनाएं हमारे उपग्रह और संचार-तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती हैं। सूर्य का अध्ययन करके हम ऐसी घटनाओं से पहले ही सावधान होकर इन दुर्घटनाओं को रोक सकते हैं।

पृथ्वी से सूर्य का पूरा अध्ययन नहीं किया जा सकता

Aditya L-1 News : सूर्य का अध्ययन अंतरिक्ष से करना जरूरी है, क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल और चुम्बकीय क्षेत्र हानिकारक किरणों, जैसे यूवी किरण, को रोक देते हैं। इसका मतलब है कि सूर्य पर ये प्रयोग करने के लिए जरूरी सामग्री पृथ्वी पर उपलब्ध नहीं है। इसलिए, पृथ्वी से सूर्य का पूरा अध्ययन नहीं किया जा सकता।

यह मिशन, चंद्रयान की तरह, पहले ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करेगा और फिर यह अधिक तेजी से सूर्य की ओर उड़ान भरेगा। ‘आदित्य एल-वन’ पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचेगा। जब तक कि यह पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल पर काबू नहीं पा लेता, ये बीच में एक बिंदु (लैगरेंज प्वाइंट) पर रुकेगा, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एल1’ नाम दिया गया है।

आदित्य एल-वन अंतरिक्ष यान अपनी दूरी करीब चार माह में पूरी करेगा। अपने गन्तव्य पर पंहुच कर यह वहां से सूर्य की विभिन्न गतिविधियों, आंतरिक और बाहरी वातावरण आदि का अध्ययन करेगा। संयुक्त राज्य अमेरिका पहले इसी तरह का एक मिशन एल-टू क्षेत्र में सूर्य के करीब भेज चुका है।

Aditya L-1 News : 23 अगस्त को चंद्रमा पर चंद्रयान-3 उतारने वाला भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा देश बन गया। यह अंतरिक्ष यान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा है, जहां अभी तक किसी भी देश का कोई मिशन नहीं पहुंचा है। यह भारतीय वैज्ञानिकों की एक बड़ी उपलब्धि है। दुनिया के वैज्ञानिक मान रहे हैं कि “चंद्रयान-3 के रोवर को बहुत ही स्मार्ट तरीके से डिजाइन किया गया है। छह पहियों वाली यह छोटी सी मशीन एक कार की तरह है। रोवर अपने निर्णय स्वयं लेता है, अपने रास्ते स्वयं चुनता है। चंद्रमा की सतह के वातावरण और तापमान आदि पर नजर रखता है। यह अपना काम अच्छे से कर रहा है।”

भारत ने 1950 और 1960 के दशक में जब अंतरिक्ष अनुसंधान पर काम शुरू किया था, तक किसी को यकीन नहीं था, कि भारत इतनी तरक्की करेगा। आज भारत अंतरिक्ष तकनीक में रूस और अमेरिका जैसे देशों से स्पर्धा कर रहा है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अब यह निश्चित रूप से दुनिया के प्रमुख देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसियों की कतार में खड़ा है।

भारत ने चंद्रयान-3 मिशन पर लगभग 70 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं, जो क्रिस्टोफर नोलन की 2014 की अंतरिक्ष मिशन फ़िल्म ‘इंटरस्टेलर’ पर खर्च किए गए 131 मिलियन डॉलर के आधे से भी कम है।

अंतरिक्ष अनुसंधान और विकास को आमतौर पर अमीर देशों का साहसिक कार्य माना जाता है, लेकिन भारत की सफलता ने दुनिया के उभरते देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नया उत्साह और जुनून भी पैदा किया है। चंद्रमा या सूर्य के अनुसंधान और उससे प्राप्त ज्ञान पर किसी एक देश का एकाधिकार नहीं है। यह दुनिया भर में मानव विकास और मानवता के लिए समर्पित है। चंद्रमा और सूर्य के अनुसंधान से भारतीय वैज्ञानिकों को जो भी मिलेगा, उससे पूरी दुनिया को फायदा होगा। दुनिया ने जो भी प्रगति की है, वह वैज्ञानिक अनुसंधान और नए आविष्कारों के कारण ही संभव हो पाई है।

Aditya L-1 News : श्रीहरिकोटा से आदित्य एल-1 की सफल लॉन्चिंग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैज्ञानिकों को बधाई दी है। चौथे चरण की कामयाबी के बाद ये कक्ष में स्थापित हो गया। इससे पहले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने अगस्त 2018 में पार्कर सोलर प्रोब लॉन्च किया था। दिसंबर 2021 में पार्कर ने सूर्य के ऊपरी वायुमंडल, कोरोना से उड़ान भरी और वहां कणों और चुंबकीय क्षेत्रों का नमूना लिया। नासा के अनुसार, यह पहली बार था कि किसी अंतरिक्ष यान ने सूर्य को छुआ। फरवरी 2020 में नासा ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के साथ हाथ मिलाया और डेटा एकत्र करने के लिए सोलर ऑर्बिटर लॉन्च किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सूर्य ने पूरे सौर मंडल में लगातार बदलते अंतरिक्ष वातावरण को कैसे बनाया और नियंत्रित किया। नासा द्वारा अन्य सक्रिय सौर मिशन अगस्त, 1997 में लॉन्च किए गए एडवांस्ड कंपोजिशन एक्सप्लोरर हैं। अक्टूबर, 2006 में सौर स्थलीय संबंध वेधशाला, फरवरी, 2010 में सोलर डायनेमिक्स वेधशाला और इंटरफेस रीजन इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ जून, 2013 में लॉन्च किया गया। जापान, यूरोप और चीन भी सूरज के अध्ययन में लगे हैं।

पिछले चार वर्षों में भारत में लगभग डेढ़ सौ निजी अंतरिक्ष कंपनियां अस्तित्व में आई हैं। ये टेक स्टार्टअप बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इन कंपनियों में अरबों रुपए का निवेश किया जा रहा है। इसरो के अंतरिक्ष मिशन में उच्च प्रौद्योगिकी स्टार्टअप और निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ती जा रही है। ये कंपनियां भी अपने दम पर आगे बढ़ रही हैं। 2022 में, ‘स्काईरूट’ नामक एक निजी कंपनी ने भारत में निर्मित रॉकेट पर अपना उपग्रह अंतरिक्ष में लॉन्च किया था। यह पहली बार था कि भारत की किसी निजी कंपनी ने अपने ही रॉकेट से अपना उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया था। हैदराबाद स्थित यह कंपनी इस साल के अंत तक एक बड़ा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रही है।

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत एक महाशक्ति

Aditya L-1 News : भारत हर एक क्षेत्र में खुद को काफी तेजी से विकसित कर रहा है, चाहे वो रक्षा क्षेत्र हो या विज्ञान क्षेत्र। मिशन मार्स से लेकर मून मिशन तक हर जगह भारत ने एक अमिट छाप छोड़ी है। इतना ही नहीं, भारत की मदद से दूसरे देशों के सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में लॉन्च किए जा रहे हैं। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को आज एक महाशक्ति के रूप में देखा जाने लगा है। भारत एक साथ 100 से अधिक सैटेलाइट लॉन्च कर पहले ही रिकॉर्ड बना चुका है। दूसरे देशों की सेटेलाइट छोड़ने से भारत की आय बढ़ रही है, भारत का व्यापार बढ़ रहा है। भारत इस क्षेत्र में जितना आगे बढ़ेगा, उतनी ही उसकी आय बढ़ेगी। पूरी दुनिया में भारत की तकनीकि कला विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और इंजीनियर की मांग बढ़ेगी।

-अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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