बीएमसी चुनाव 2026: फिल्म, खेल और सामाजिक जगत समेत कई हस्तियों ने किया मतदान

महाराष्ट्र में आज बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव के लिए मतदान जारी है। इस दौरान फिल्म, खेल और सामाजिक जगत की कई जानी-मानी हस्तियों ने मतदान किया। क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर और अभिनेता नाना पाटेकर समेत कई सेलेब्रिटीज मतदान केंद्रों पर नजर आए।

BMC elections 2026
फिल्म, खेल और सामाजिक जगत के कई जानी-मानी हस्तियों ने किया मतदान (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar15 Jan 2026 03:43 PM
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बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) सहित महाराष्ट्र की 29 नगर निकायों में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से जारी है। सुबह 7.30 बजे शुरू हुई वोटिंग शाम 5.30 बजे तक चल रही है। जबकि मतगणना गुरुवार को होगी। 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट वाली बीएमसी पर सबकी निगाहें टिकी हैं। मुंबई में मतदान को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। फिल्म, कला और खेल जगत की कई नामचीन हस्तियों ने मतदान कर लोकतंत्र में अपनी भागीदारी निभाई। क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर और अभिनेता नाना पाटेकर समेत कई सेलेब्रिटीज़ सुबह-सुबह मतदान केंद्रों पर पहुंच कर वोट दे दे रहे है।

227 वार्डों के लिए 1700 उम्मीदवार मैदान में

बता दें कि बीएमसी चुनाव में कुल 227 वार्डों के लिए 1700 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। इनमें 822 पुरुष और 878 महिला उम्मीदवार शामिल हैं। मुंबई में कुल 1 करोड़ 3 लाख 44 हजार से अधिक मतदाता हैं, जिनमें करीब 55.16 लाख पुरुष, 48.26 लाख महिला और 1099 अन्य मतदाता शामिल हैं। मतदान के लिए शहर में 2 हजार से अधिक स्थानों पर 10,231 पोलिंग स्टेशन बनाए गए हैं।

सियासी मुकाबला हुआ दिलचस्प

बता दें कि इस बार मुंबई में सियासी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) महायुति के तहत चुनाव लड़ रही हैं, जबकि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी करीब 20 साल बाद फिर साथ आई है। वहीं एनसीपी ने कई जगहों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में अजित पवार गुट और शरद पवार गुट के बीच तालमेल देखने को मिल रहा है।

29 नगर निकायों में 2869 सीटों पर चुनाव

पूरे महाराष्ट्र में 893 वार्डों में फैली 2869 सीटों के लिए मतदान हो रहा है, जिसमें मुंबई, पुणे और आसपास के इलाके शामिल हैं। मतगणना शुक्रवार सुबह 23 काउंटिंग सेंटर्स पर होगी। हर सेंटर पर एक साथ दो-दो वार्डों की गिनती की जाएगी।

मतदान के चलते सार्वजनिक अवकाश

महाराष्ट्र सरकार ने चुनाव वाले सभी 29 नगर निगम क्षेत्रों में 15 जनवरी को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इस दिन सरकारी, अर्ध-सरकारी कार्यालय, बैंक और सार्वजनिक उपक्रम बंद रहेंगे। कर्मचारियों को वोट डालने के लिए समय देना अनिवार्य किया गया है। मतदान के कारण आज शेयर बाजार (BSE और NSE) में भी कारोबार बंद रहा।

सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुंबई में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। 10 अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, 33 डीसीपी और 84 एसीपी समेत 3,000 से अधिक पुलिस अधिकारी और 25,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी व होमगार्ड तैनात हैं। संवेदनशील इलाकों में सीसीटीवी और ड्रोन से निगरानी की जा रही है। अब सभी की नजरें गुरुवार को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि देश की सबसे अमीर नगरपालिका की कमान किसके हाथों में जाएगी।

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WiFi नाम किसने और कब रखा था? जानिए पूरा इतिहास

डिजिटल दौर में WiFi जितना जरूरी है, उतनी ही जरूरी इसकी सुरक्षा भी है। मजबूत पासवर्ड, समय-समय पर राउटर अपडेट और अनजान लोगों को नेटवर्क एक्सेस न देना—ये छोटी सावधानियां आपको बड़े साइबर खतरे से बचा सकती हैं।

WiFi in the digital age
डिजिटल दौर में WiFi (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 08:25 PM
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आज के डिजिटल युग में WiFi हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। घर, ऑफिस, स्कूल, होटल या कैफे—हर जगह इंटरनेट कनेक्टिविटी का सबसे आसान और तेज़ जरिया WiFi ही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि WiFi का नाम वाई-फाई ही क्यों रखा गया और इसका असली मतलब क्या है? ज्यादातर लोग इसका इस्तेमाल तो रोज़ करते हैं, लेकिन इसके नाम, तकनीक और सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारी से अनजान रहते हैं। यही जानकारी की कमी कई बार साइबर खतरे भी बढ़ा देती है।

क्या होता है WiFi?

WiFi एक वायरलेस नेटवर्किंग तकनीक है, जो बिना किसी तार के डिवाइस को इंटरनेट से जोड़ने का काम करती है। यह तकनीक रेडियो फ्रीक्वेंसी पर आधारित होती है और इसे तकनीकी भाषा में WLAN (Wireless Local Area Network) कहा जाता है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, टैबलेट जैसे डिवाइस WiFi के जरिए डेटा भेजते और प्राप्त करते हैं। अक्सर लोग मानते हैं कि WiFi का मतलब Wireless Fidelity होता है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। दरअसल, WiFi किसी शब्द का शॉर्ट फॉर्म नहीं है, बल्कि यह एक ब्रांड नेम है।

WiFi नाम की कहानी

WiFi नाम को साल 1999 में Wi-Fi Alliance नामक संगठन ने चुना था। इसका मकसद था कि IEEE 802.11 जैसे जटिल तकनीकी नाम की जगह आम लोगों के लिए एक आसान और याद रखने योग्य नाम दिया जाए। WiFi नाम को जानबूझकर Hi-Fi (High Fidelity) से प्रेरित होकर रखा गया, ताकि यह भरोसेमंद और हाई-क्वालिटी वायरलेस कनेक्शन का संकेत दे सके।

कैसे काम करता है WiFi?

WiFi सिस्टम में एक राउटर होता है, जो इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से जुड़ा रहता है। यह राउटर रेडियो सिग्नल के जरिए आसपास मौजूद डिवाइस तक नेटवर्क पहुंचाता है। जब कोई डिवाइस इन सिग्नल्स को पकड़ता है, तो वह इंटरनेट से कनेक्ट हो जाता है। इसी तकनीक की वजह से बिना केबल के इंटरनेट इस्तेमाल करना संभव हो पाता है।

क्या WiFi किसी एक कंपनी की तकनीक है?

बता दें कि WiFi किसी एक कंपनी या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। इसके मानकों और तकनीक को Wi-Fi Alliance नाम का संगठन नियंत्रित करता है, जिसमें दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां शामिल हैं। यह संगठन WiFi तकनीक को और ज्यादा तेज़, सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए लगातार काम करता है।

WiFi से जुड़े साइबर खतरे क्यों बढ़ते हैं?

अगर WiFi नेटवर्क सुरक्षित न हो, तो यह साइबर अपराधियों के लिए आसान निशाना बन सकता है। कमजोर पासवर्ड या ओपन नेटवर्क की वजह से डेटा चोरी, हैकिंग, पर्सनल जानकारी लीक, नेटवर्क का गलत इस्तेमाल जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। कई बार लोग बिना सोचे-समझे अपना WiFi पासवर्ड दूसरों से शेयर कर देते हैं, जिससे सुरक्षा जोखिम और भी बढ़ जाता है।

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राम जन्मभूमि विवाद: गोपाल सिंह विशारद की कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने न केवल अयोध्या विवाद का अंत किया, बल्कि गोपाल सिंह विशारद के 69 साल पुराने दावे को भी मान्यता दी। यह निर्णय इस बात का उदाहरण है कि न्याय की प्रक्रिया भले ही लंबी हो, लेकिन अंततः न्याय होता है।

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राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 06:34 PM
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राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के साथ एक नाम फिर से चर्चा में आया है—गोपाल सिंह विशारद। 69 साल पहले जिस व्यक्ति ने राम जन्मभूमि में पूजा के अधिकार के लिए मुक़दमा दायर किया था, उसे न्यायालय ने उनकी मृत्यु के 33 साल बाद वह अधिकार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को सौंपते हुए राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक ज़मीन देने का भी आदेश दिया गया है।

 कौन थे गोपाल सिंह विशारद?

गोपाल सिंह विशारद अयोध्या विवाद से जुड़े प्रारंभिक चार सिविल मुक़दमों में से एक के याचिकाकर्ता थे। उन्होंने 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में मुक़दमा दायर कर यह मांग की थी कि राम जन्मभूमि पर स्थापित मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें पूजा व दर्शन से रोका न जाए। राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में वे और एम. सिद्दीक दोनों ही मूल पक्षकार थे, जिनका बाद में निधन हो गया। उनके कानूनी वारिसों ने आगे मुक़दमे की पैरवी की।

1949 की रात और विवाद की शुरुआत

दावा किया जाता है कि 22–23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने बाबरी मस्जिद की दीवार फांदकर भीतर राम, जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। इसके बाद यह प्रचार हुआ कि भगवान राम अपने जन्मस्थान पर स्वयं प्रकट हुए हैं। इस घटना के बाद प्रशासन ने परिसर को विवादित घोषित कर दिया।

अदालत का पहला आदेश

गोपाल सिंह विशारद की याचिका पर सिविल जज ने उसी दिन स्थगनादेश जारी किया, जिसमें मूर्तियाँ न हटाने और पूजा जारी रखने का निर्देश दिया गया। बाद में इस आदेश को जिला जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। हालांकि इस स्थगनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन फ़ाइल वर्षों तक लंबित रही।

प्रशासन का पक्ष

तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. उग्रा ने अपने हलफनामे में कहा था कि विवादित स्थल को लंबे समय से मुसलमान नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते आ रहे थे और मूर्तियाँ चोरी-छिपे रखी गई थीं।

अन्य मुक़दमे भी जुड़े

बता दें कि 1951 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन और पूजा अधिकार को लेकर मुक़दमा दायर किया।

1961 में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और नौ मुस्लिम पक्षकारों ने मस्जिद और क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर स्वामित्व का दावा किया। 1989 में रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने भगवान राम को न्यायिक व्यक्ति घोषित करते हुए नया मुक़दमा दायर किया। इन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ चलती रही।

मौत के बाद भी जारी रहा मुक़दमा

1986 में गोपाल सिंह विशारद का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह ने मुक़दमे की पैरवी जारी रखी। सुन्नी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि विशारद का दावा व्यक्तिगत पूजा अधिकार तक सीमित था, जो उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

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