Tuesday, 25 June 2024

Delhi Flood : “हवस की खोपड़ी” के कारण आई बाढ़, आप भी देखिए पर्यावरण से छेड़छाड़ के कारण मौत का नजारा

Delhi Flood : नोएडा/ नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर दूर दराज के इलाकों तक इन दिनों बाढ़…

Delhi Flood : “हवस की खोपड़ी” के कारण आई बाढ़, आप भी देखिए पर्यावरण से छेड़छाड़ के कारण मौत का नजारा

Delhi Flood : नोएडा/ नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर दूर दराज के इलाकों तक इन दिनों बाढ़ का मंजर है। यमुना नदी में आई बाढ़ का पानी भारत की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के गेट तक पहुंच गया है। आज हम आपको बता रहे हैं वर्षा के मौसम में हर साल बाढ़ से होने वाली तबाही का कारण। इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले आप चेतना मंच की टीम द्वारा यमुना नदी में घुसकर बनाई यह वीडियो देख लीजिए…

Delhi Flood Update

हवस की खोपड़ी है बाढ़ का कारण

यमुना नदी में आई हुई बाढ़ के विषय में हमने अनेक पर्यावरणविदों से बात की है। सभी पर्यावरणविद इस बात पर एक मत हैं कि इंसानों की ‘हवस की खोपड़ी’ ने पर्यावरण के साथ अनाप शनाप ढंग से छेड़छाड़ की है। उसी छेड़छाड़ नतीजा बाढ़ के रुप में सामने है।

प्रसिद्ध पर्यावरणविद प्रोफेसर आर.पी. सिंह ने बताया कि पहाड़ों में अवैध खनन, अवैध निर्माण, नदियों की सीमा के अंदर घुसकर किए जा रहे अवैध कब्जों के कारण जल स्रोतों खासतौर से नदियों के मार्ग अवरुद्ध किए जा हरे है। इन्हीं सब कारणों से वर्षा ऋतु में जब पानी अपने उफान पर आता है तो उसका नतीजा बाढ़ के रुप में सामने आता है।

इसी कड़ी में पर्यावरणविद अनुप शुक्ला कहते हैं कि मनुष्य की ‘हवस की खोपड़ी’ प्लेन जमीन पर कमाई करके भरती नहीं है। इसी कारण हस ‘हवस की खोपड़ी’ को भरने के लिए पहाड़ों व नदियों को अपना शिकार बनाता है। मनुष्य द्वारा की जाने वाली अवांछित छेड़छाड़ के कारण ही बाढ़ से तबाही मचती है।

पानी की व्यथा

सामाजिक कार्यकर्ता तथा वरिष्ठ पत्रकार राजेश बैरागी ने बाढ़ के कारणों का अपने एक व्यंग्य लेख के द्वारा बड़ा ही अनुठा चित्रण किया है। श्री बैरागी ने लिखा है कि छोटी मोटी अदालतें पानी का इंसाफ नहीं कर सकती हैं, इसलिए यमुना का पानी आज खुद चलकर दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की देहरी पर पहुंच गया। एसडीएम और तहसीलदार की अदालतों ने तो कभी भी उसकी अंत पुकार नहीं सुनी।

उन्होंने उसके वजूद को हमेशा उपेक्षित और तिरस्कृत ही किया है। उच्च न्यायालयों ने कभी कभार स्वत: संज्ञान लेकर और कभी किसी दीवाने पर्यावरण रक्षक और अधिकांश एनजीओ के नाम पर धंधा करने वालों की याचिकाओं पर टुकड़े टुकड़े निर्णय देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री की है।

निरंतर बहने वाले जल को ऐसे औपचारिक निर्णयों से इंसाफ कैसे मिल सकता है। यदि जल के वश में होता तो वह वाष्प बनकर कभी का खुले आकाश में उड़ गया होता। यदि उसके वश में होता तो वह जहां कहीं बर्फ बनकर ठहर जाता। उसके वश में होता तो वह कभी मनुष्यों की बस्ती की ओर आता ही नहीं।

परंतु अपनी आदत से विवश जल वहीं से होकर बहता है जहां मनुष्य को उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होती है और मनुष्य भी वहीं पहुंच जाता है जहां जल होता है। जल के अभाव में मनुष्य का अस्तित्व कहां। यहीं से जल के अस्तित्व को मिटाने की कथा प्रारंभ होती है।

Delhi Flood Update

मनुष्य ने जल को सीधा चलना सिखाने के लिए तटबंध बनाए, जल कुछ नहीं बोला। उसने जल को निरंतर बहने के काम से आराम देने के लिए बड़े बड़े बांध बनाए, जल ने विश्राम किया। परंतु जब मनुष्य उसकी धारा के बीच में अपना घर मकान, बाल बच्चे सब ले आया तो जल क्या करे। इसलिए आज जल पागलों की भांति इंसाफ मांगने सुप्रीम कोर्ट के दर पर जा पहुंचा। उसने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक देकर अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध गुहार लगा दी है।

मैंने देखा दिल्ली आईटीओ के सामने वाली सड़क पर वह बस में भी सवार हो गया। उसकी पीड़ा इतनी अधिक है कि उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। उसके रौद्र रूप को देखकर सरकार कहलाने वाले अपने कार्यालय बंद कर भाग खड़े हुए हैं। वह पसीने से तरबतर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर धरना दे रहा है। क्या उसे इंसाफ मिलेगा ?

चतुर लोग बता रहे हैं कि उसकी कसाब, अफजल गुरु और तीस्ता सीतलवाड़ जैसी पहुंच नहीं है कि उसके लिए आधी रात को या टाइम ओवर होने के बाद भी देश की सर्वोच्च अदालत खुले। उनका पक्का अनुमान है कि अदालत के ऊंचे कानों तक उसकी आवाज पहुंचने से पहले ही उसके तेवर नीचे आ जाएंगे। उसके बाद ? जल अपनी बदकिस्मती के साथ वापस नदी नालों में लौट जाएगा। Delhi Flood

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