इश्क और हथकड़ियाँ : हत्या की आरोपी लड़की ने जेल के कैदी से रचाई शादी

प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद की शादी का कार्ड भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दोनों ने कोर्ट की अनुमति से शादी कर ली है और अब दोनों का पूरे इलाके में चर्चा हो रही है।

Love and handcuffs
हत्या के आरोपी युवक-युवती की शादी का कार्ड (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar23 Jan 2026 10:33 PM
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अलवर जिले के बड़ौदा मेव कस्बे में एक अविश्वसनीय मामला सामने आया है, जहां हत्या के आरोपी लड़की और एक पूर्व हत्या के आरोपी कैदी ने कोर्ट के निर्देश पर मिली पैरोल का लाभ उठाकर शादी कर ली है। यह शादी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। बड़ौदा मेव के होली चौक मोहल्ले में रहने वाली 33 वर्षीय प्रिया सेठ और 32 वर्षीय हनुमान प्रसाद ने आज विवाह बंधन में बंध गए। दोनों ही हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। हाईकोर्ट के आदेश से दोनों को पैरोल मिली थी, जिसके बाद यह शादी संभव हो सकी।

प्रिया सेठ का अतीत

प्रिया सेठ का जीवन शुरू से ही शिक्षित परिवार से रहा है। उसके दादा प्रिसिंपल थे, पिता कॉलेज लैक्चरर और माता सरकारी स्कूल में टीचर हैं। 10वीं और 12वीं में अच्छे अंक लाने के बाद उसे जयपुर भेजा गया था। हालांकि, वहां उसकी जिंदगी गलत रास्ते पर चली गई। जयपुर में रहकर उसने ऑनलाइन प्रेमजाल का सहारा लिया और महंगे शौक पूरे करने का प्रयास किया।

हत्या का पूरा मामला

बता दें कि 2018 में प्रिया ने अपने प्रेमी दीक्षांत कामरा का कर्ज उतरवाने के लिए झूठी प्रेम कहानी रची। उसने दुष्यंत शर्मा को डेटिंग ऐप के जरिए अपने जाल में फंसाया। योजना के मुताबिक 2 मई 2018 को उसने उसे मिलने बुलाया और उसके घर ले जाकर उसके दोस्तों के साथ मिलकर उसे बंधक बना लिया। फिर, उसकी हत्या कर दी और चेहरे को क्षत-विक्षत कर शव को सूटकेस में भरकर पहाड़ियों में फेंक दिया।  पुलिस ने इस मामले में प्रिया, दीक्षांत और लक्ष्‍य वालिया को गिरफ्तार किया। कोर्ट ने तीनों को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

प्रिया का प्रेमी दीक्षांत और हत्या का मकसद

प्रिया ने अपने प्रेमी दीक्षांत से भी झूठ बोला था कि वह करोड़पति है, जिससे वह प्रभावित हो गया। उसकी योजना में दीक्षांत और उसके दोस्त लक्ष्‍य वालिया भी शामिल थे। अंततः, उन्होंने हत्या कर शव को छुपाने का प्रयास किया।  

दूसरी ओर, हनुमान प्रसाद का अतीत

वहीं, हनुमान प्रसाद का नाम भी विवादों में रहा है। 2017 में, उसने अपने प्रेम संबंध के चलते अपने ही साथी की हत्या कर दी थी। उस समय वह फिजिकल टीचर की तैयारी कर रहा था। पुलिस ने उसे दो दिन बाद गिरफ्तार किया। उस समय पता चला कि हनुमान और उसकी प्रेमिका संतोष शर्मा के बीच प्रेम था, जो दोनों ताइक्वांडो जानते थे। दोनों ने शादी का भी मन बना लिया था, लेकिन हत्याकांड ने सब कुछ बदल दिया।

शादी और सोशल मीडिया में चर्चा 

प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद की शादी का कार्ड भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दोनों ने कोर्ट की अनुमति से शादी कर ली है और अब दोनों का पूरे इलाके में चर्चा हो रही है।

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पति को मारने के बाद महिला ने किया सनसनीखेज कृत्य

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के चिलुवुरु गांव से दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। लक्ष्मी माधुरी नामक महिला ने अपने पति लोकम शिव नागराजू की हत्या की साजिश रची और प्रेमी की मदद से उसे अंजाम दिया। पड़ोसियों और दोस्तों ने नागराजू के कान के पास खून और चोट देखीं।

The case from Chiluvuru village in Andhra Pradesh
आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के चिलुवुरु गांव का मामला (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar23 Jan 2026 06:24 PM
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Andhra Pradesh News : पुलिस के अनुसार, घटना वाली रात माधुरी ने अपने पति के लिए बिरयानी बनाई और उसमें नींद की गोलियां मिला दीं। गहरी नींद में सोते ही नागराजू की हत्या के लिए माधुरी का प्रेमी गोपी रात 11:30 बजे घर पहुंचा। गोपी ने नागराजू की छाती पर बैठकर उन्हें जकड़ा और माधुरी ने तकिए से उनका दम घोंट दिया।

हत्या के बाद बर्बरता

बता दें कि पति के मौत की सुनिश्चित करने के बाद गोपी वहां से चला गया। लेकिन माधुरी ने मदद नहीं मांगी और न ही पड़ोसियों को सूचना दी। पुलिस का दावा है कि वह पूरे समय पति के शव के पास बैठी रही और अश्लील वीडियो देखती रही।

संदेह से खुली सच्चाई

बता दें कि सुबह करीब 4 बजे माधुरी पड़ोसियों के पास गई और कहा कि पति की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। हालांकि पड़ोसियों और दोस्तों ने नागराजू के कान के पास खून और चोट देखीं। पोस्टमार्टम में पुष्टि हुई कि मौत दम घुटने से हुई और छाती की हड्डियों में फ्रैक्चर था। पूछताछ में माधुरी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। Andhra Pradesh News

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लाल क़िले की दीवारों में दर्ज है भारत का राजनीतिक इतिहास

गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल क़िले से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर इसकी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

Delhi Red Fort History
अंग्रेज़ों ने महल को बनाया सैनिक छावनी (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar23 Jan 2026 04:46 PM
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दिल्ली का लाल क़िला केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि सदियों से हिंदुस्तान की सत्ता, संघर्ष और संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है। मुग़ल साम्राज्य के स्वर्णिम युग से लेकर ब्रिटिश राज और आधुनिक भारत तक, लाल क़िले ने सत्ता के हर उतार-चढ़ाव को नज़दीक से देखा है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल क़िले से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर इसकी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठता है कि आख़िर लाल क़िला ही क्यों सत्ता का प्रतीक बना?

शाहजहां से शुरू हुआ सत्ता का सफ़र

लाल क़िले का निर्माण 1639 में मुग़ल बादशाह शाहजहां ने यमुना नदी के तट पर करवाया था। इसे उस दौर में क़िला-ए-मुबारक कहा जाता था। लाल बलुआ पत्थर से बने इस क़िले को मुग़ल साम्राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक राजधानी के रूप में विकसित किया गया। यहीं से बादशाह झरोखा दर्शन देते थे, दीवान-ए-आम में जनता की फरियाद सुनी जाती थी और दीवान-ए-ख़ास में साम्राज्य के अहम फ़ैसले लिए जाते थे। यही वजह रही कि लाल क़िला सत्ता का केंद्र बन गया।

षड्यंत्र और सत्ता संघर्ष का गवाह

लाल क़िले ने मुग़ल इतिहास के सबसे दर्दनाक सत्ता संघर्ष भी देखे। दारा शिकोह और औरंगज़ेब के बीच छिड़ा युद्ध, दारा की पराजय, सार्वजनिक अपमान और अंततः उनकी हत्या—ये सब घटनाएं इसी क़िले से जुड़ी हैं। इसके बाद औरंगज़ेब का कठोर शासन और फिर मुग़ल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ।

लूट, आक्रमण और पतन

1739 में ईरान के नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर लाल क़िले से मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा लूट लिया। इसके बाद अफ़ग़ान, मराठा और सिख आक्रमणों ने क़िले की गरिमा को गहरी चोट पहुंचाई। धीरे-धीरे लाल क़िला सिर्फ़ एक प्रतीक बनकर रह गया।

1857 की क्रांति और ब्रिटिश राज

1857 की पहली आज़ादी की लड़ाई में लाल क़िला विद्रोह का केंद्र बना। बहादुर शाह ज़फ़र को विद्रोह का प्रतीक मानते हुए अंग्रेज़ों ने यहीं उन पर मुक़दमा चलाया और बाद में उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया।इसके बाद अंग्रेज़ों ने लाल क़िले को शाही महल से सैनिक छावनी में बदल दिया। मुग़ल स्थापत्य को नुकसान पहुंचाया गया और कई ऐतिहासिक इमारतों का स्वरूप बदल दिया गया।

आजादी की गूंज और आधुनिक भारत

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर चले मुक़दमे ने लाल क़िले को आज़ादी की लड़ाई का नया प्रतीक बना दिया। 15 अगस्त 1947 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल क़िले से तिरंगा फहराया, तब यह क़िला औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त भारत की पहचान बन गया।

आज का लाल क़िला

वर्ष 2007 में यूनेस्को ने लाल क़िले को विश्व धरोहर घोषित किया। आज यह भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्रीय अस्मिता और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। हर साल प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस पर इसी क़िले से राष्ट्र को संबोधन देना इस परंपरा को आगे बढ़ाता है। लाल क़िला केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि भारत के इतिहास की जीवित गवाही है—जहां सत्ता बनी, टूटी और अंततः जनता के हाथों में आई।

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