Sunday, 16 June 2024

स्कूल : तीसरी लहर को देखते हुए स्कूल फिर से खोलना कितना जायज है

स्कूल वापसी : औचित्य और उपचार कोरोना के मामले एक बार फिर तेज़ी से बढ़ते नज़र आ रहे हैं। सामान्यतः…

स्कूल : तीसरी लहर को देखते हुए स्कूल फिर से खोलना कितना जायज है

स्कूल वापसी : औचित्य और उपचार

कोरोना के मामले एक बार फिर तेज़ी से बढ़ते नज़र आ रहे हैं। सामान्यतः जब भी कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती है, लॉकडाउन या कर्फ्यू आदि प्रतिक्रियावादी उपाय अपना लिए जाते हैं। कोविड की दूसरी लहर के दौरान भी ऐसा ही देखा गया। जैसे तैसे कुछ समय में आंकड़ों में सुधार आ भी गया किंतु ज़रा परिस्थिति संभालती नहीं कि निर्देश बाधा लगने लगते हैं और सावधानी बरतने का ज़िम्मा स्वयं को छोड़ दूसरों के सर मढ़ दिया जाता है। सामान्य जीवन जीने की उत्सुकता में उसी जीवन की रक्षा का प्रयोजन नजरंदाज होने लगता है। डेल्टा वेरिएंट के आने से जब लोगों को और चौकन्ना होने की आवश्यकता है वहीं अधिकतम लोग छुट्टी मनाने का विचार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि तीसरी लहराते आते देर नहीं लगेगी यदि अभी से सचेत हो विवेक से काम ना लिया गया। ऐसा भी अनुमान है कि जिस प्रकार से कोरोना जनसंख्या को प्रभावित कर रहा है तीसरी लहर आई तो 18 साल से कम की उम्र के बच्चों और युवाओं के संक्रमित होने का खतरा सबसे अधिक है। ऐसे में स्कूल खोलने का निर्णय बेहद सोच समझ लेना ज़रूरी हो जाता है। 

एक साल से अधिक समय में छात्र ऑनलाइन मध्यम की बारीकियों तो जान ही गए हैं। दूरदराज़ के इलाकों में भी मोबाइल फोनों और इंटरनेट की व्यवस्था कर ली गई है । यह सत्य की कुछ छात्र चुतराई से इस मध्यम का फायदा उठा रहे हैं अपितु ये भी निर्विवाद है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नहीं है। इसलिए वही ज़िले जहां कोरोना के कोई नए मामले सामने नहीं आए, वहीं स्कूल खोलने में समझदारी है। 

कुछ व्यक्तियों का मानना है कि मोबाइल, टैब इत्यादि के अधिक प्रयोग से बच्चों कि नेत्र ज्योति एवं शरीर का ढांचा बिगड़ रहा है लेकिन महामारी के दौरान स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के अनेकों उपाय सामने आए। सेहत बनाने और योग करने के महत्व को आजकल सभी समझते हैं। सभी कार्यों में संतुलन बना कर रखने की सीख केवल स्कूल से उत्पन्न हो यह जरूरी नहीं, ये बात तो घर पर भी सीखी जा सकती है। स्कूलों के लिए जरूर यह लाभ हानि का प्रश्न है किंतु यही बच्चे आगे जाकर मानव संसाधन के रूप में देश का भविष्य बनाएंगे। इसीलिए ये वक्त दूरदर्शिता दिखाने का है। 

जहाँ एक और घर के अंदर भी मास्क का प्रयोग करने की सलाह दी जा रही है और घर से बाहर तो डबल मास्किंग को अनिवार्य माना जा रहा है, वहाँ नादान बालकों के घर से स्कूल तक जाने में, चार से पांच घंटे वहाँ रहने में और वापस आने में अनगिनत गलतियाँ होने की संभावना है। सभी बच्चों को एक साथ बसों में लाने लेजाने कोविड निर्देशों के विरुद्ध है और स्वयं यातायात करना समय और ईंधन दोनों की बरबादी है। यदि केवल 50% छात्रों को स्कूल बुलाया जाए तो भी बाकी बचे 50% को अगले दिन या ऑनलाइन ही पढ़ना है तो स्कूलों के लिए और शिक्षाकों के लिए भी एक ही मध्यम का प्रयोग करना फायदेमंद है। 

18 साल से कम उम्र वालों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती यह भी है की उनके लिए अभी टीका भी उपलब्ध नहीं है। हालांकि भारत बायोटेक ने कोवेक्सिन का परीक्षण 12 से 18 साल के युवाओं में प्रारंभ कर दिया है परंतु इसकी सफलता अभी अनुमानित है तय नहीं। इसके बड़े पैमाने में उत्पादन में भी समय है तो तब तक चौकन्ने रहने में ही भलाई है। बच्चों में एक खास बात यह भी देखी गई है की इनके ज्यादातर मामले स्पर्शोन्मुख अर्थात लक्षण नज़र ना आने वाले हैं। ऐसे में वे न सिर्फ खुद कोरोना से संक्रमित हो सकते हैं बल्कि अपने परिवार को भी संक्रमित कर सकते हैं और स्कूल खुले तो शिक्षकों को भी।

यद्यपि नए ज़माने की नई पीढ़ी कईं तरीकों से ज्यादा तेज़, समझदार और व्यावहारिक है लेकिन स्वभाव से चंचल हैं और लोकप्रिय प्रवृत्तियों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। वे सक्षम हैं इसमें कोई शक नहीं परंतु जान बूझ कर विपत्ति मोल लेना भी ठीक नहीं। जब तक कोरोना जैसी अप्रत्याशित महामारी को पूरी तरह नहीं समझ लिया जाता, सावधानी में ही समझदारी है। केवल स्कूल ही नहीं, जहां भी संक्रमण का खतरा हो उस हर जगह से इस समय दूरी बनाकर रखने से ही कोरोना पर विजय पाई जा सकती है। समाज से सीख लेकर अपने व्यक्तित्व बना रहे बच्चों और युवाओं के सामने सही उदाहरण प्रस्तुत करना परम आवश्यक है और ये ज़िम्मेदारी हम सभी की है। 

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