Dashrath Manjhi: एक ऐसा शख्स जिसने तोड़ा पहाड़ का गुरूर, कॉमन मैन से बने माउंटेन मैन
Dashrath Manjhi: आज दशरथ मांझी को कौन नहीं जानता। हर मेहनती स्टूडेंट के दिल में दशरथ मांझी बसे हुए हैं। माउंटेन मैन कहे जाने वाले दशरथ मांझी ने अपनी जिद और मेहनत से बिहार के गेहलौर गांव के बीच पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। चलिए जानते हैं उनकी अनसुनी कहानी।

हर किसी की जिंदगी में ऐसी घटनाएं जरूर होती है जो पूरी दिशा बदल देती हैं। कुछ लोग मुश्किलों के सामने हार मान लेते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो संघर्ष को चुनौती समझकर अपने रास्ते खुद बनाते हैं। दशरथ मांझी ऐसे ही इंसान थे। बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर में जन्मे यह साधारण मजदूर अपनी जिंदगी में कभी भी असंभव को स्वीकार नहीं कर सके और बन गए माउंटेन मैन।
कौन थे दशरथ मांझी?
“माउंटेन मैन” के नाम से मशहूर दशरथ मांझी बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर के एक साधारण मजदूर थे। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती। उन्होंने 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद अपने गांव के लिए पहाड़ को काटकर एक रास्ता बनाया जिससे गांव और अस्पताल की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर सिर्फ 15 किलोमीटर हो गई।
पत्नी से थी बेइंतहा मोहब्बत
दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 को हुआ था। 1959 में उनकी पत्नी फल्गुनी देवी खाना लेकर जा रही थीं लेकिन रास्ते में उनका पैर फिसल गया और वह गहरी खाई में गिर गईं। अस्पताल तक पहुंचने में समय ज्यादा लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने दशरथ को ठान लिया कि वह अपने गांव के लोगों के लिए इस पहाड़ को काटकर रास्ता बनाएंगे।
शुरूआत में लोग कहते थे पागल
1960 में दशरथ मांझी ने काम शुरू किया। लोग उन्हें पागल कहने लगे क्योंकि यह काम बहुत मुश्किल था। 1600 साल पुरानी चट्टानों को केवल हथौड़ा और छेनी से काटना आसान नहीं था। उन्होंने दिन भर खेतों में काम किया और शाम से रात तक पहाड़ काटते रहे। कभी-कभी चट्टानें बहुत सख्त होने पर उन्होंने उन्हें गर्म करके फोड़ते। उनके हाथ छिलते और पैर जख्मी होते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
22 साल बाद मिली सफलता
1982 तक दशरथ मांझी ने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया। इस रास्ते से गांव के लोगों को अस्पताल और बाजार तक पहुंचने में आसानी हुई। उनका यह काम दिखाता है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।
दशरथ मांझी की कहानी हमें यह सिखाती है कि कड़ी मेहनत, जिद और धैर्य से किसी भी मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है। उनके प्रयास ने न केवल अपने गांव के लोगों की जिंदगी बदली बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई।
हर किसी की जिंदगी में ऐसी घटनाएं जरूर होती है जो पूरी दिशा बदल देती हैं। कुछ लोग मुश्किलों के सामने हार मान लेते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो संघर्ष को चुनौती समझकर अपने रास्ते खुद बनाते हैं। दशरथ मांझी ऐसे ही इंसान थे। बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर में जन्मे यह साधारण मजदूर अपनी जिंदगी में कभी भी असंभव को स्वीकार नहीं कर सके और बन गए माउंटेन मैन।
कौन थे दशरथ मांझी?
“माउंटेन मैन” के नाम से मशहूर दशरथ मांझी बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर के एक साधारण मजदूर थे। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती। उन्होंने 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद अपने गांव के लिए पहाड़ को काटकर एक रास्ता बनाया जिससे गांव और अस्पताल की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर सिर्फ 15 किलोमीटर हो गई।
पत्नी से थी बेइंतहा मोहब्बत
दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 को हुआ था। 1959 में उनकी पत्नी फल्गुनी देवी खाना लेकर जा रही थीं लेकिन रास्ते में उनका पैर फिसल गया और वह गहरी खाई में गिर गईं। अस्पताल तक पहुंचने में समय ज्यादा लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने दशरथ को ठान लिया कि वह अपने गांव के लोगों के लिए इस पहाड़ को काटकर रास्ता बनाएंगे।
शुरूआत में लोग कहते थे पागल
1960 में दशरथ मांझी ने काम शुरू किया। लोग उन्हें पागल कहने लगे क्योंकि यह काम बहुत मुश्किल था। 1600 साल पुरानी चट्टानों को केवल हथौड़ा और छेनी से काटना आसान नहीं था। उन्होंने दिन भर खेतों में काम किया और शाम से रात तक पहाड़ काटते रहे। कभी-कभी चट्टानें बहुत सख्त होने पर उन्होंने उन्हें गर्म करके फोड़ते। उनके हाथ छिलते और पैर जख्मी होते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
22 साल बाद मिली सफलता
1982 तक दशरथ मांझी ने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया। इस रास्ते से गांव के लोगों को अस्पताल और बाजार तक पहुंचने में आसानी हुई। उनका यह काम दिखाता है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।
दशरथ मांझी की कहानी हमें यह सिखाती है कि कड़ी मेहनत, जिद और धैर्य से किसी भी मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है। उनके प्रयास ने न केवल अपने गांव के लोगों की जिंदगी बदली बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई।












