राम जन्मभूमि विवाद: गोपाल सिंह विशारद की कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने न केवल अयोध्या विवाद का अंत किया, बल्कि गोपाल सिंह विशारद के 69 साल पुराने दावे को भी मान्यता दी। यह निर्णय इस बात का उदाहरण है कि न्याय की प्रक्रिया भले ही लंबी हो, लेकिन अंततः न्याय होता है।

राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के साथ एक नाम फिर से चर्चा में आया है—गोपाल सिंह विशारद। 69 साल पहले जिस व्यक्ति ने राम जन्मभूमि में पूजा के अधिकार के लिए मुक़दमा दायर किया था, उसे न्यायालय ने उनकी मृत्यु के 33 साल बाद वह अधिकार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को सौंपते हुए राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक ज़मीन देने का भी आदेश दिया गया है।
कौन थे गोपाल सिंह विशारद?
गोपाल सिंह विशारद अयोध्या विवाद से जुड़े प्रारंभिक चार सिविल मुक़दमों में से एक के याचिकाकर्ता थे। उन्होंने 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में मुक़दमा दायर कर यह मांग की थी कि राम जन्मभूमि पर स्थापित मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें पूजा व दर्शन से रोका न जाए। राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में वे और एम. सिद्दीक दोनों ही मूल पक्षकार थे, जिनका बाद में निधन हो गया। उनके कानूनी वारिसों ने आगे मुक़दमे की पैरवी की।
1949 की रात और विवाद की शुरुआत
दावा किया जाता है कि 22–23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने बाबरी मस्जिद की दीवार फांदकर भीतर राम, जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। इसके बाद यह प्रचार हुआ कि भगवान राम अपने जन्मस्थान पर स्वयं प्रकट हुए हैं। इस घटना के बाद प्रशासन ने परिसर को विवादित घोषित कर दिया।
अदालत का पहला आदेश
गोपाल सिंह विशारद की याचिका पर सिविल जज ने उसी दिन स्थगनादेश जारी किया, जिसमें मूर्तियाँ न हटाने और पूजा जारी रखने का निर्देश दिया गया। बाद में इस आदेश को जिला जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। हालांकि इस स्थगनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन फ़ाइल वर्षों तक लंबित रही।
प्रशासन का पक्ष
तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. उग्रा ने अपने हलफनामे में कहा था कि विवादित स्थल को लंबे समय से मुसलमान नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते आ रहे थे और मूर्तियाँ चोरी-छिपे रखी गई थीं।
अन्य मुक़दमे भी जुड़े
बता दें कि 1951 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन और पूजा अधिकार को लेकर मुक़दमा दायर किया।
1961 में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और नौ मुस्लिम पक्षकारों ने मस्जिद और क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर स्वामित्व का दावा किया। 1989 में रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने भगवान राम को न्यायिक व्यक्ति घोषित करते हुए नया मुक़दमा दायर किया। इन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ चलती रही।
मौत के बाद भी जारी रहा मुक़दमा
1986 में गोपाल सिंह विशारद का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह ने मुक़दमे की पैरवी जारी रखी। सुन्नी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि विशारद का दावा व्यक्तिगत पूजा अधिकार तक सीमित था, जो उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के साथ एक नाम फिर से चर्चा में आया है—गोपाल सिंह विशारद। 69 साल पहले जिस व्यक्ति ने राम जन्मभूमि में पूजा के अधिकार के लिए मुक़दमा दायर किया था, उसे न्यायालय ने उनकी मृत्यु के 33 साल बाद वह अधिकार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को सौंपते हुए राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक ज़मीन देने का भी आदेश दिया गया है।
कौन थे गोपाल सिंह विशारद?
गोपाल सिंह विशारद अयोध्या विवाद से जुड़े प्रारंभिक चार सिविल मुक़दमों में से एक के याचिकाकर्ता थे। उन्होंने 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में मुक़दमा दायर कर यह मांग की थी कि राम जन्मभूमि पर स्थापित मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें पूजा व दर्शन से रोका न जाए। राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में वे और एम. सिद्दीक दोनों ही मूल पक्षकार थे, जिनका बाद में निधन हो गया। उनके कानूनी वारिसों ने आगे मुक़दमे की पैरवी की।
1949 की रात और विवाद की शुरुआत
दावा किया जाता है कि 22–23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने बाबरी मस्जिद की दीवार फांदकर भीतर राम, जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। इसके बाद यह प्रचार हुआ कि भगवान राम अपने जन्मस्थान पर स्वयं प्रकट हुए हैं। इस घटना के बाद प्रशासन ने परिसर को विवादित घोषित कर दिया।
अदालत का पहला आदेश
गोपाल सिंह विशारद की याचिका पर सिविल जज ने उसी दिन स्थगनादेश जारी किया, जिसमें मूर्तियाँ न हटाने और पूजा जारी रखने का निर्देश दिया गया। बाद में इस आदेश को जिला जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। हालांकि इस स्थगनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन फ़ाइल वर्षों तक लंबित रही।
प्रशासन का पक्ष
तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. उग्रा ने अपने हलफनामे में कहा था कि विवादित स्थल को लंबे समय से मुसलमान नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते आ रहे थे और मूर्तियाँ चोरी-छिपे रखी गई थीं।
अन्य मुक़दमे भी जुड़े
बता दें कि 1951 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन और पूजा अधिकार को लेकर मुक़दमा दायर किया।
1961 में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और नौ मुस्लिम पक्षकारों ने मस्जिद और क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर स्वामित्व का दावा किया। 1989 में रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने भगवान राम को न्यायिक व्यक्ति घोषित करते हुए नया मुक़दमा दायर किया। इन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ चलती रही।
मौत के बाद भी जारी रहा मुक़दमा
1986 में गोपाल सिंह विशारद का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह ने मुक़दमे की पैरवी जारी रखी। सुन्नी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि विशारद का दावा व्यक्तिगत पूजा अधिकार तक सीमित था, जो उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।












