क्या आप जानते हैं कि इस आयोजन में करीब पांच टन वजनी पुष्पक विमान को यादव बंधु अपने कंधों पर उठाकर लाते हैं ? आखिर क्या वजह है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था और भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई है ?

UP News : उत्तर प्रदेश के वाराणसी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली भरत मिलाप की परंपरा एक बार फिर श्रद्धा, त्याग और भाईचारे का संदेश लेकर सामने आई। काशी के नाटी इमली स्थित भरत मिलाप मैदान में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मिलन का दृश्य देखकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। करीब 488 वर्ष पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा को देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशी मेहमान भी पहुंचे। आयोजन के दौरान पूरा मैदान जय श्रीराम और हर-हर महादेव के उद्घोष से गूंज उठा। ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’ की भावना को साकार करती इस लीला में भगवान श्रीराम के वनवास से लौटने और अपने भाइयों से मिलने का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। जैसे ही सूर्य की किरणें मैदान के निर्धारित स्थान पर पड़ीं, लीला का प्रमुख दृश्य सामने आया। श्रीराम और लक्ष्मण दौड़कर भरत और शत्रुघ्न के पास पहुंचे। दोनों भाई स्वागत में जमीन पर लेट गए। इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने उन्हें उठाकर गले लगाया तो वहां मौजूद श्रद्धालु भावुक हो गए। UP News
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काशी की भरत मिलाप लीला को शहर की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मान्यता के अनुसार, इस आयोजन की शुरुआत मेघा भगत से जुड़ी एक धार्मिक कथा से हुई थी। चित्रकूट रामलीला समिति के अध्यक्ष और भरत मिलाप के व्यवस्थापक बाल मुकुंद उपाध्याय के अनुसार, मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने मेघा भगत को स्वप्न में दर्शन देकर यहां भरत मिलाप कराने का निर्देश दिया था। इसके बाद से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। इस आयोजन का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। राम और भरत का मिलन त्याग, कर्तव्य, पारिवारिक प्रेम और आपसी सम्मान का संदेश भी देता है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में लोग इस दृश्य को देखने के लिए पहुंचते हैं। UP News
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भरत मिलाप की सबसे खास परंपराओं में पुष्पक विमान का आगमन शामिल है। पारंपरिक धोती-बनियान पहने, सिर पर पगड़ी बांधे और आंखों में सुरमा लगाए यादव बंधु करीब पांच टन वजनी पुष्पक विमान को कंधों पर उठाकर मैदान तक लाते हैं। काशी में इस परंपरा को ‘यदुकुल के कंधों पर रघुकुल का रथ’ कहा जाता है। यह दृश्य सामाजिक एकता और साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। आयोजन के दौरान श्रद्धालु इस परंपरा को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए। बताया जाता है कि चारों भाइयों के मिलन का मुख्य दृश्य शाम करीब 4:40 बजे हुआ। कुछ मिनटों तक चले इस भावनात्मक प्रसंग ने पूरे परिसर को भक्तिमय वातावरण से भर दिया। UP News
भरत मिलाप के इस ऐतिहासिक आयोजन में काशी नरेश भी हाथी पर सवार होकर मैदान पहुंचे। काशी राजपरिवार की भागीदारी इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, महाराज उदित नारायण सिंह ने वर्ष 1796 में पहली बार इस लीला में शाही अंदाज में भाग लिया था। इसके बाद राजपरिवार की पीढ़ियां इस आयोजन से जुड़ी रहीं और परंपरा का निर्वहन करती आई हैं। UP News
नाटी इमली का भरत मिलाप काशी की उन परंपराओं में शामिल है, जिनमें धार्मिक विश्वास के साथ सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक निरंतरता भी दिखाई देती है। भगवान श्रीराम और भरत का मिलन जहां भाईचारे और त्याग का संदेश देता है, वहीं पुष्पक विमान को कंधों पर उठाने वाले यादव बंधुओं की भूमिका सामाजिक समरसता की मिसाल पेश करती है। विदेशी मेहमानों और देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालुओं की मौजूदगी इस आयोजन के व्यापक आकर्षण को दर्शाती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी वाराणसी की सांस्कृतिक विरासत और जनआस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। UP News :
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