उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद में महिला से सामूहिक दुष्कर्म के करीब 11 साल पुराने मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव और तत्कालीन एसएसआई वेदपाल सिंह को 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा दी गई है।

UP News : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से सामने आया पुलिस महकमे को शर्मसार करने वाला एक मामला करीब 11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। देवबंद थाने में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म के मामले में अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव और तत्कालीन उपनिरीक्षक वेदपाल सिंह को 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर अलग-अलग 1.20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि पीड़िता अपने पति को पुलिस हिरासत से छुड़ाने और उसके बारे में जानकारी लेने के लिए पुलिस के पास पहुंची थी। जिस पुलिस व्यवस्था से उसे मदद और सुरक्षा की उम्मीद थी, उसी के अधिकारियों पर उसके साथ अपराध करने का आरोप साबित हुआ।
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मामला वर्ष 2015 का है। अभियोजन पक्ष और पीड़िता के अधिवक्ता के अनुसार, 29 जुलाई 2015 को देवबंद पुलिस ने महिला के पति को उसके घर से हिरासत में लिया था। बाद में उसे एक मामले में गिरफ्तार दिखाकर जेल भेज दिया गया। महिला अपने पति को छुड़ाने और उसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लगातार प्रयास कर रही थी। 6 अगस्त 2015 की शाम एक पुलिसकर्मी उसके घर पहुंचा और उसे चौकी पर बुलाया। महिला अपनी सास और ननद के साथ चौकी पहुंची। वहां से पुलिसकर्मी उन्हें देवबंद थाने ले गए।
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पीड़िता के अधिवक्ता राजीव तोमर के मुताबिक, थाने में महिला की सास को रोक लिया गया और महिला तथा उसकी ननद को तत्कालीन थाना प्रभारी के सरकारी आवास पर ले जाया गया। ननद को कमरे के बाहर बैठा दिया गया। आरोप था कि तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव, तत्कालीन एसएसआई वेदपाल सिंह, चौकी प्रभारी पंकज धामा और एक अन्य पुलिसकर्मी ने महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। महिला की ननद जब शोर सुनकर अंदर पहुंची तो आरोपियों ने कथित तौर पर उस पर पिस्टल तान दी और जान से मारने की धमकी दी। इस घटना ने पुलिस थाने और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
मीडिया रिपोर्टों में पीड़िता के घटना के समय लगभग ढाई महीने की गर्भवती होने की बात भी सामने आई है। इस संवेदनशील पहलू ने मामले को और गंभीर बना दिया। हालांकि, गर्भावस्था से संबंधित चिकित्सकीय विवरण और अदालत के निर्णय में इस तथ्य के उल्लेख की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
पीड़िता ने घटना के बाद स्थानीय पुलिस अधिकारियों से शिकायत की। उसने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तक अपनी बात पहुंचाई, लेकिन उसे न्याय नहीं मिला। इसके बाद उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद 7 नवंबर 2017 को देवबंद थाने में चार आरोपियों के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म, धमकी समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया।
मामले की जांच अपराध शाखा अपराध अनुसंधान विभाग (सीबीसीआईडी) को सौंपी गई थी। जांच के बाद सीबीसीआईडी ने आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। लेकिन पीड़िता ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। उसने अदालत में विरोध याचिका दाखिल कर जांच के निष्कर्षों को चुनौती दी। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और मामले की सुनवाई हुई। करीब 11 साल से अधिक समय तक चली इस कानूनी लड़ाई में पीड़िता के बयान, गवाहों और अन्य साक्ष्यों पर विचार किया गया। आखिरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वितीय ने तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजमोहन यादव और वेदपाल सिंह को दोषी करार दिया।
6 नवंबर 2026 को अदालत ने दोनों दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 376डी के तहत 20-20 साल के कठोर कारावास और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त धारा 506 के तहत पांच-पांच साल के कारावास और 20-20 हजार रुपये जुर्माने का भी आदेश दिया गया। अदालत ने दोनों धाराओं में दी गई सजाओं को साथ-साथ चलाने का आदेश दिया है। इस प्रकार दोनों दोषियों को 20-20 साल की कठोर कैद भुगतनी होगी और प्रत्येक पर कुल 1.20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
इस मामले में दोषी ब्रजमोहन यादव घटना के समय देवबंद के थाना प्रभारी थे। बाद में उनका प्रमोशन क्षेत्राधिकारी (सीओ) के पद पर हुआ और वह सेवानिवृत्त हो गए। दूसरे दोषी वेदपाल सिंह घटना के समय एसएसआई के पद पर तैनात थे। मीडिया रिपोर्टों में उनकी फिरोजाबाद में तैनाती का उल्लेख किया गया है।
मामले में नामजद चौकी प्रभारी पंकज धामा की ओर से मानसिक रूप से अस्वस्थ होने संबंधी हलफनामा दिए जाने के बाद उनकी पत्रावली अलग कर दी गई थी। चौथे आरोपी की पहचान भी नहीं हो सकी। इसलिए इस मुकदमे का विचारण मुख्य रूप से इन दो दोषियों के खिलाफ चला।
पीड़िता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता राजीव तोमर के मुताबिक, महिला ने न्याय पाने के लिए लंबा संघर्ष किया। इस दौरान उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से गुजरना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, पीड़िता आजीवन कारावास की सजा चाहती थी। उसके अधिवक्ता ने फैसले और सजा का अध्ययन करने के बाद सजा बढ़ाने तथा उचित मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट जाने की संभावना भी जताई है।
सहारनपुर का यह मामला केवल दो पुलिसकर्मियों को सजा सुनाए जाने तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि किसी थाने में ही महिला की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए और शिकायत करने के बाद भी उसे न्याय के लिए हाईकोर्ट तथा अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें, तो आम नागरिक पुलिस व्यवस्था पर भरोसा कैसे करे? इस मामले में पीड़िता ने लगभग 11 साल तक हार नहीं मानी। सीबीसीआईडी की क्लीन चिट के बावजूद उसने अदालत में अपनी लड़ाई जारी रखी और अंततः दो पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराए जाने तथा सजा सुनाए जाने तक पहुंची। यह फैसला महिला सुरक्षा, पुलिस जवाबदेही और न्यायिक व्यवस्था में पीड़ितों के अधिकारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
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