प्रयागराज माघ मेले में संतों की लग्जरी गाड़ियों ने छेड़ी नई बहस

माघ मेले में जगद्गुरु महामंडलेश्वर संतोष दास, जिन्हें सतुआ बाबा के नाम से जाना जाता है, अपनी शानदार कारों के कारण सबसे अधिक सुर्खियों में हैं। उनकी लैंड रोवर डिफेंडर पहले ही आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी।

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सतुआ बाबा और उनकी लग्जरी गाड़ी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar15 Jan 2026 06:39 PM
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UP News : माघ मेला सदियों से त्याग, तपस्या और आत्मिक साधना का प्रतीक रहा है, लेकिन इस वर्ष मेले में दिखाई दे रही भव्यता ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कुछ प्रमुख संतों की आलीशान जीवनशैली, विशेषकर महंगी गाड़ियों में आगमन, श्रद्धा और वैराग्य के बीच एक नई चर्चा को जन्म दे रही है।

करोड़ों की गाड़ियों में पहुंचे संत

माघ मेले में जगद्गुरु महामंडलेश्वर संतोष दास, जिन्हें सतुआ बाबा के नाम से जाना जाता है, अपनी शानदार कारों के कारण सबसे अधिक सुर्खियों में हैं। उनकी लैंड रोवर डिफेंडर पहले ही आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी, वहीं हाल ही में उनके काफिले में शामिल हुई लगभग तीन करोड़ रुपये मूल्य की पोर्शे कार ने चर्चा को और तेज कर दिया। मेले में स्थित उनके शिविर में इस कार का धार्मिक विधि से पूजन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक जुटे।

श्रद्धा और सवाल दोनों साथ

इसे लेकर लोगों की राय बंटी हुई है। एक वर्ग का मानना है कि जो संत त्याग, संयम और भोग-विलास से दूर रहने की शिक्षा देते हैं, उनका इतना वैभवपूर्ण जीवन विरोधाभास पैदा करता है। वहीं समर्थकों का कहना है कि साधन होना और साधना करना दो अलग बातें हैं। उनके अनुसार यह समृद्धि गुरु-कृपा और ईश्वर की अनुकंपा का परिणाम है।

सतुआ बाबा का पक्ष

सतुआ बाबा का कहना है कि उनके जीवन में जो कुछ भी है, वह उनके गुरु, परंपरा और देवी-देवताओं के आशीर्वाद से है। उनका तर्क है कि अध्यात्म कभी दरिद्र नहीं रहा, बल्कि ईश्वर की कृपा जीवन को आगे बढ़ाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गाड़ियां उनके लिए सुविधा का साधन हैं, न कि मोह का कारण। उनके अनुसार ब्रांड या कीमत मायने नहीं रखती, बल्कि वह उद्देश्य महत्वपूर्ण है, जिसके लिए इन साधनों का उपयोग किया जाता है।

प्राचीन परंपरा का वर्तमान स्वरूप

सतुआ बाबा का मुख्य आश्रम काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित है। इस धार्मिक पीठ की स्थापना वर्ष 1803 में गुजरात के संत जेठा पटेल ने की थी। परंपरा के अनुसार, इस पीठ के प्रमुख को सतुआ बाबा कहा जाता है। आश्रम में आज भी बटुकों को वैदिक शिक्षा दी जाती है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे संतोष दास ने 11 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया था। उनकी प्रतिभा और साधना को देखते हुए उन्हें मात्र 19 वर्ष की उम्र में महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान की गई, जो अपने आप में एक दुर्लभ उदाहरण है।

केवल एक संत तक सीमित नहीं मामला

यह प्रवृत्ति केवल सतुआ बाबा तक सीमित नहीं है। किन्नर अखाड़े समेत अन्य कई महामंडलेश्वर भी महंगी गाड़ियों और भव्य जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। मेले में फॉर्च्यूनर, इनोवा और स्कॉर्पियो जैसी गाड़ियां आम दृश्य बन चुकी हैं। माघ मेला अब केवल साधना का केंद्र नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ अध्यात्म की नई तस्वीर भी प्रस्तुत कर रहा है। सवाल यह नहीं है कि संत क्या उपयोग कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या आधुनिक साधन और आध्यात्मिक जीवन साथ-साथ चल सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर हर व्यक्ति अपनी आस्था और सोच के अनुसार स्वयं तय कर रहा है।

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जेल में टेंडर का खेल : 10 टेंडर एक ही कंपनी को दिया, जांच के आदेश

पक्षपात का संदेह इसलिए हुआ क्यों कि एक ही कंपनी को सभी टेंडर देने से भ्रष्टाचार की आशंका है। अन्य कंपनियों का डिसक्वालीफिकेशन किस आधार पर हुआ। कई कंपनियां तकनीकी रूप से क्वालीफाई होने के बावजूद अंतिम बिड में बाहर कर दी गईं। टेंडर खोलने का समय को लेकर भी संदेह पैदा हुआ।

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जेल की सलाखें
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar15 Jan 2026 05:44 PM
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UP News : जेल विभाग में खाद्य तेल और मसालों के टेंडरों के मामले में अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। शासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए हैं। पिछले साल कारागार विभाग ने कुल 10 टेंडर निकाले थे जिनमें 9 खाद्य और मसाले संबंधित थे और 1 विद्युत यांत्रिकी से जुड़ा। तकनीकी बिड में कई कंपनियों ने हिस्सा लिया, लेकिन केवल तीन कंपनियां क्वालीफाई हुईं शिव शक्ति इंटरप्राइजेज, एमजी आॅगेर्नाइजेशन, राजमाता इंफ्राकॉन प्रा. लि.। हालांकि, फाइनेंशियल बिड में केवल शिव शक्ति इंटरप्राइजेज ही क्वालीफाई हुई, और इसके बाद सभी 10 टेंडर उसी कंपनी को आवंटित कर दिए गए।

सवाल उठाने वाले बिंदु

पक्षपात का संदेह इसलिए हुआ क्यों कि एक ही कंपनी को सभी टेंडर देने से भ्रष्टाचार की आशंका है। अन्य कंपनियों का डिसक्वालीफिकेशन किस आधार पर हुआ। कई कंपनियां तकनीकी रूप से क्वालीफाई होने के बावजूद अंतिम बिड में बाहर कर दी गईं।

टेंडर खोलने का समय को लेकर भी संदेह पैदा हुआ। आवेदन की समयसीमा रात 8 बजे समाप्त हुई, लेकिन टेंडर केवल 30 मिनट बाद रात 8:30 बजे खोले गए, जो प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियां

* हल्दी आपूर्ति: 11 कंपनियां

* काली मिर्च: 12 कंपनियां

* बड़ी इलायची और लाल मिर्च: 13-13 कंपनियां

* सरसों का तेल: 15 कंपनियां

इन सभी मामलों में अंतत: शिव शक्ति इंटरप्राइजेज को ही टेंडर आवंटित किया गया।

प्रशासनिक कदम

एक विधायक ने इस मामले में लिखित शिकायत की, जिसमें भारी अनियमितताओं का आरोप लगाया गया। शासन ने जांच के आदेश जारी किए और संयुक्त सचिव सूर्य प्रकाश मिश्रा ने जेल प्रशासन को रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दिए। हालांकि, जेल के डीजी पीसी मीणा का कहना है कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। इस पूरे मामले में टेंडर आवंटन की प्रक्रिया, केवल एक कंपनी का चयन और बाकी कंपनियों का बाहर होना सवालों के घेरे में है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि क्या किसी अनियमितता में लिप्तता रही है।

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संभल हिंसा मामला : पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर के आदेश को चुनौती देने की तैयारी

संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी और आदेश को निरस्त कराने की मांग की जाएगी।

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पुलिस अधिकारी और संभल हिंसा में आगजनी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar15 Jan 2026 03:30 PM
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UP News : संभल में हुई हिंसा से जुड़े मामले में तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी और तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर सहित 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब तक मुकदमा दर्ज नहीं हो सका है। अदालत के आदेश के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है।

हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी

संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी और आदेश को निरस्त कराने की मांग की जाएगी। उनका कहना है कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से गोली नहीं चलाई गई थी और जिस युवक के घायल होने की बात कही जा रही है, उसे लगी गोली पुलिस की नहीं है। पुलिस के अनुसार घायल युवक के पिता द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं। एसपी ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस समय घटना हुई, उस इलाके में तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था तैनात थी। ऐसे में किसी ठेले का जामा मस्जिद क्षेत्र तक पहुंचना संभव नहीं था।

जिसको गोली लगी उसे ही आरोपी बना दिया

उधर, शिकायतकर्ता यामीन ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर को नामजद करते हुए आरोप लगाया है कि हिंसा के दौरान पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें उनके बेटे आलम को तीन गोलियां लगीं। यामीन का कहना है कि उनका बेटा बिस्किट बेचने का काम करता है और घटना वाले दिन भी रोज की तरह सुबह ठेला लेकर निकला था। परिवार का आरोप है कि गोली लगने के बाद आलम का इलाज छिपकर कराया गया, जिससे उसकी जान बच सकी। बाद में पुलिस ने उसे ही मामले में आरोपी बना दिया। हालांकि जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है।

पहले से दिव्यांग है घायल युवक

22 वर्षीय आलम की बहन रजिया ने बताया कि उसका भाई पहले से ही दिव्यांग है और तीन पहिया ठेले से बिस्किट बेचकर परिवार की मदद करता था। गोली लगने के बाद उसकी हालत बेहद कमजोर हो गई है। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ही खराब थी, अब इलाज के चलते कर्ज़ तक लेना पड़ा है। रजिया का आरोप है कि जब अधिकारियों से कोई सुनवाई नहीं हुई तो उनके पिता को न्याय के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि बीते एक साल से उनका परिवार मानसिक दबाव में है। पुलिस द्वारा बार-बार घर आकर डराने-धमकाने का आरोप भी लगाया गया है। भय के कारण परिवार के कुछ सदस्य घर छोड़कर चले गए हैं और पूरा परिवार दहशत में जीवन जी रहा है।

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