सपा के PDA के जवाब में BJP का बड़ा वार, 2027 के रण से पहले संगठन तैयार

उत्तर प्रदेश में विपक्ष की सामाजिक समीकरण आधारित राजनीति के बीच भाजपा अब अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, जातीय संतुलन साधने और जमीनी नेटवर्क मजबूत करने के मिशन पर तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश के 761 शहरी निकायों में 2802 पार्षदों का मनोनयन किया गया है।

PDA पर बीजेपी का बड़ा वार
PDA पर बीजेपी का बड़ा वार
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar17 Mar 2026 03:28 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए उत्तर प्रदेश की सत्ता में काबिज ने भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सियासी और संगठनात्मक रणनीति को नए सिरे से धार देना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश में विपक्ष की सामाजिक समीकरण आधारित राजनीति के बीच भाजपा अब अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, जातीय संतुलन साधने और जमीनी नेटवर्क मजबूत करने के मिशन पर तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश के 761 शहरी निकायों में 2802 पार्षदों का मनोनयन किया गया है। भाजपा की इस पहल को सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी बिसात पर चला गया एक बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि लंबे समय से संगठन में सक्रिय, लेकिन जिम्मेदारी की प्रतीक्षा कर रहे कार्यकर्ताओं को नई भूमिका देकर उन्हें मैदान में फिर से पूरी ताकत के साथ उतारा जाए।

उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं को मिला बूस्टर डोज

उत्तर प्रदेश भाजपा की रणनीति साफ है कि चुनाव से पहले संगठन के हर स्तर पर ऊर्जा, उत्साह और सक्रियता का माहौल बनाया जाए। पार्षद मनोनयन को इसी दिशा में एक बड़े “बूस्टर डोज” के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी मानती है कि जब स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी मिलेगी तो उनका मनोबल बढ़ेगा और वे जनता के बीच ज्यादा मजबूती से काम करेंगे। सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश में पार्टी अब सिर्फ चुनावी नारों के भरोसे नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के व्यवस्थित बंटवारे के जरिए बूथ से लेकर निकाय स्तर तक अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहती है। यही वजह है कि पार्षदों के मनोनयन के साथ-साथ जिला कमेटियों के गठन और प्रदेश संगठन में भी बदलाव की तैयारी तेज कर दी गई है।

PDA की राजनीति की काट निकालने की कोशिश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने इस मनोनयन प्रक्रिया में सभी वर्गों, जातियों और महिलाओं को प्रतिनिधित्व देकर एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि यह कदम विपक्ष की PDA राजनीति की काट के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों में संतुलित प्रतिनिधित्व के जरिए यह संकेत दिया है कि वह सिर्फ अपने परंपरागत वोट बैंक तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि समाज के हर तबके तक अपनी पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी की यह कोशिश सामाजिक समीकरणों को साधने के साथ-साथ विपक्ष की संभावित गोलबंदी को भी कमजोर करने की दिशा में मानी जा रही है।

निकाय स्तर पर कैसे हुआ समायोजन

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने समायोजन योजना के तहत अलग-अलग शहरी निकायों में तय संख्या के अनुसार मनोनयन किया है। नगर निगमों में 10-10, नगर पालिका परिषदों में 5-5 और नगर पंचायतों में 3-3 सदस्यों को नामित किया गया है। इन नामों के चयन में सामाजिक सक्रियता, संगठन के प्रति निष्ठा, स्थानीय स्वीकार्यता और विशेष योग्यता जैसे पहलुओं को महत्व दिया गया है। इस पूरी कवायद का मकसद उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थानीय इकाइयों को ज्यादा प्रभावी बनाना है, ताकि शहरी क्षेत्रों में भाजपा का संगठन सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जनसरोकारों से सीधे जुड़ा हुआ नजर आए। पार्षद मनोनयन के साथ भाजपा अब उत्तर प्रदेश में बोर्ड, आयोग, निगमों और एडवाइजरी कमेटियों के गठन को भी अंतिम रूप देने में जुटी है। पार्टी की कोशिश है कि अधिक से अधिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को अलग-अलग दायित्व देकर उन्हें सक्रिय भूमिका में लाया जाए। इसके अलावा जिला स्तरीय कमेटियों का गठन भी जारी है, जबकि प्रदेश संगठन की नई टीम पर भी मंथन चल रहा है। संकेत हैं कि उत्तर प्रदेश भाजपा इसी महीने के अंत तक संगठनात्मक स्तर पर कुछ और बड़े फैसले ले सकती है। इससे यह साफ हो रहा है कि पार्टी 2027 के चुनाव को लेकर किसी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।

जमीनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी

भाजपा की नजर सिर्फ संगठन विस्तार पर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में जमीनी पकड़ को और मजबूत करने पर भी है। मनोनीत पार्षद स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाएंगे, जनता से सीधा संवाद बढ़ाएंगे और निकाय स्तर पर पार्टी की मौजूदगी को ज्यादा प्रभावी बनाएंगे। इससे शहरी वोटरों के बीच भाजपा का संपर्क तंत्र और मजबूत होने की उम्मीद है। राजनीतिक नजरिए से देखें तो उत्तर प्रदेश में यह पूरी कवायद चुनाव से काफी पहले संगठन को एक्टिव मोड में लाने की रणनीति का हिस्सा है। भाजपा चाहती है कि 2027 की लड़ाई से पहले उसका हर कार्यकर्ता, हर स्थानीय इकाई और हर सामाजिक समीकरण चुनावी दृष्टि से पूरी तरह तैयार रहे। UP News

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उत्तर प्रदेश में रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ा फैसला, 24 परियोजनाओं को मंजूरी

रियल एस्टेट क्षेत्र को नई गति देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (यूपी-रेरा) ने राज्य के 13 जिलों में 24 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है। परियोजनाओं में करीब 6,841.85 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है, जिससे हजारों आवासीय और व्यावसायिक यूनिट्स विकसित होंगी।

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उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar17 Mar 2026 03:03 PM
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UP News : उत्तर प्रदेश में रियल एस्टेट क्षेत्र को नई गति देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (यूपी-रेरा) ने राज्य के 13 जिलों में 24 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं में करीब 6,841.85 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है, जिससे हजारों आवासीय और व्यावसायिक यूनिट्स विकसित होंगी।

198वीं बैठक में लिया गया अहम फैसला

यह मंजूरी यूपी-रेरा मुख्यालय में आयोजित 198वीं प्राधिकरण बैठक में दी गई, जिसकी अध्यक्षता संजय भूसरेड्डी ने की। बैठक में विभिन्न जिलों से आए प्रस्तावों की गहन समीक्षा की गई और केवल उन्हीं परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई, जो सभी नियामकीय मानकों पर खरी उतरीं।

7,800 से ज्यादा यूनिट्स का होगा विकास

मंजूर परियोजनाओं के तहत राज्य में करीब 7,830 आवासीय और व्यावसायिक यूनिट्स विकसित की जाएंगी। इससे शहरी बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलेगी। नए घरों और व्यावसायिक स्पेस की उपलब्धता बढ़ेगी। रियल एस्टेट बाजार में नई ऊर्जा आएगी। निवेश और परियोजनाओं के लिहाज से गौतम बुद्ध नगर जिला सबसे आगे रहा। यहां 5,218.41 करोड़ रुपये के निवेश से 5 परियोजनाओं को मंजूरी मिली। कुल 2,969 यूनिट्स विकसित की जाएंगी। इनमें व्यावसायिक, आवासीय और मिक्स्ड-यूज परियोजनाएं शामिल हैं।

लखनऊ, आगरा और गाजियाबाद में भी विस्तार

राजधानी लखनऊ में 132.65 करोड़ रुपये के निवेश से 4 परियोजनाएं, करीब 651 यूनिट्स का निर्माण होगा। इसी तरह आगरा में 

 3 आवासीय परियोजनाओं के तहत 312 यूनिट्स और गाजियाबाद में 3 परियोजनाओं के माध्यम से 468 यूनिट्स विकसित होंगी। 

इनके अलावा मेरठ, मथुरा, सहारनपुर, गोरखपुर, वाराणसी, बांदा, हापुड़ और बाराबंकी जैसे जिलों में भी आवासीय व व्यावसायिक परियोजनाओं को मंजूरी मिली है। इससे विकास का दायरा बड़े शहरों से आगे छोटे जिलों तक फैलेगा।

निवेशकों और खरीदारों के लिए सकारात्मक संकेत

रेरा अध्यक्ष संजय भूसरेड्डी के अनुसार पारदर्शी स्वीकृति प्रक्रिया से निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा। गृह खरीदारों को सुरक्षा और विश्वास मिलेगा तथा रियल एस्टेट सेक्टर में संतुलित और नियोजित विकास सुनिश्चित होगा। इस समय राज्य की नीतियों का असर दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में रियल एस्टेट में बढ़ता निवेश बाजार है। जिसमें सरकार की सुधारात्मक नीतियों

सरल अनुमोदन प्रक्रिया और सख्त निगरानी व्यवस्था का परिणाम है। इससे राज्य देश के प्रमुख निवेश केंद्रों में तेजी से उभर रहा है। 

उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी द्वारा दी गई यह मंजूरी न केवल रियल एस्टेट सेक्टर को गति देगी, बल्कि रोजगार सृजन, शहरी विकास और आर्थिक गतिविधियों को भी नई दिशा देगी। आने वाले समय में इसका सीधा लाभ आम लोगों और निवेशकों दोनों को मिलेगा।



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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : मातृत्व संरक्षण को बताया मौलिक मानवाधिकार

देश में महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व संरक्षण को मौलिक मानवाधिकार करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को मातृत्व से जुड़े अधिकारों से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि बच्चा जैविक है या गोद लिया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व संरक्षण को मौलिक मानवाधिकार करार दिया
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar17 Mar 2026 02:12 PM
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UP News : देश में महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व संरक्षण को मौलिक मानवाधिकार करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को मातृत्व से जुड़े अधिकारों से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि बच्चा जैविक है या गोद लिया गया है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा असंवैधानिक घोषित

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सामाजिक सुरक्षा संहिता की उस विवादित धारा को असंवैधानिक ठहराया, जिसमें केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को ही मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान था। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान समानता के अधिकार के खिलाफ है और इससे गोद लेने वाली माताओं के साथ भेदभाव होता है।

गोद लिए बच्चों की माताओं को भी मिलेगा समान अधिकार

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश मिलेगा। मातृत्व का अधिकार बच्चे की उम्र या जन्म के तरीके से सीमित नहीं किया जा सकता। गोद लिया हुआ बच्चा और जैविक बच्चा कानून की नजर में पूरी तरह समान हैं

मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, एक सामाजिक जिम्मेदारी

अदालत ने कहा कि मातृत्व को केवल जन्म देने तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह बच्चे के पालन-पोषण, देखभाल और भावनात्मक जुड़ाव से जुड़ा अधिकार है। गोद लेने वाली मां को भी उतना ही समय और संरक्षण चाहिए जितना एक जैविक मां को, इसलिए मातृत्व अवकाश का लाभ सभी माताओं को समान रूप से मिलना चाहिए।

महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम

यह फैसला न केवल कामकाजी महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कानून परिवार के हर स्वरूप को समान मान्यता देता है। गोद लेने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा, महिलाओं के साथ भेदभाव खत्म करने की दिशा में यह एक मजबूत कदम है। 

क्या होगा इस फैसले का असर?

विशेषज्ञों के अनुसार इस निर्णय से लाखों कामकाजी महिलाओं को फायदा मिलेगा। दत्तक ग्रहण को प्रोत्साहन मिलेगा तथा निजी और सरकारी संस्थानों को अपने नियमों में बदलाव करना होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि मातृत्व का अधिकार किसी भी परिस्थिति में सीमित नहीं किया जा सकता और हर महिला को समान सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए।


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