जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भाव जरूरत से ज्यादा गर्म हो चुके हैं और अगर अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार अपने-अपने टारगेट जोन तक पहुंचते हैं, तो वहां से मुनाफावसूली और ट्रेंड रिवर्सल का जोखिम बढ़ सकता है।

Silver Price Crash : देश के वायदा बाजार से लेकर दिल्ली सर्राफा बाजार तक चांदी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है, लेकिन इसी तेजी के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है क्या मौजूदा उछाल के बाद चांदी में तेज गिरावट भी आ सकती है? जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भाव जरूरत से ज्यादा गर्म हो चुके हैं और अगर अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार अपने-अपने टारगेट जोन तक पहुंचते हैं, तो वहां से मुनाफावसूली और ट्रेंड रिवर्सल का जोखिम बढ़ सकता है। बीते एक महीने में कीमतों में लगभग 50% से अधिक उछाल की वजह से यह बहस और तेज हो गई है। 17 दिसंबर को चांदी पहली बार करीब 2 लाख रुपये के आसपास बंद हुई थी, और 19 जनवरी तक 3 लाख के स्तर को छूने की बात कही जा रही है यानी एक महीने में करीब 1 लाख रुपये का जंप। ऐसे में विशेषज्ञ 30% तक की करेक्शन (करीब 1 लाख रुपये या उससे अधिक) की संभावना की तरफ संकेत कर रहे हैं।
जानकारों की नजर में चांदी की चाल समझने के लिए इस वक्त दो कंपास सबसे अहम हैं एक ग्लोबल और दूसरा घरेलू। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति औंस का स्तर सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सीमा और तकनीकी टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। मौजूदा भाव अगर वहां तक पहुंचते हैं, तो बाजार में ओवरबॉट (जरूरत से ज्यादा खरीदा हुआ) माहौल और गहरा सकता है यानी छोटे-से ट्रिगर पर भी तेज मुनाफावसूली की गुंजाइश बन सकती है। वहीं भारत के MCX पर 3.25 से 3.30 लाख रुपये का दायरा ‘रेज़िस्टेंस ज़ोन’ की तरह देखा जा रहा है, जहां तेजी की असली परीक्षा होगी। अगर चांदी इस दहलीज पर टिकने के बजाय फिसलती है, तो करेक्शन की रफ्तार बढ़ सकती है और गिरावट एक झटके में ज्यादा गहरी दिख सकती है।
चांदी की मौजूदा रैली के पीछे जिन वजहों ने आग लगाई थी, वही अब ब्रेक का काम भी कर सकती हैं। सबसे बड़ा ट्रिगर टैरिफ टेंशन और वैश्विक अनिश्चितता रही, जिसने निवेशकों को सेफ-हेवन की तरफ धकेला लेकिन अगर दबाव के बीच टैरिफ मोर्चे पर नरमी के संकेत मिलते हैं, तो यही सेफ-हेवन ट्रेड ढीला पड़ सकता है और कीमतों पर सीधा दबाव आ सकता है। दूसरी तरफ डॉलर इंडेक्स की संभावित मजबूती भी चांदी की चमक फीकी कर सकती है, क्योंकि डॉलर में रिकवरी अक्सर कीमती धातुओं को नीचे खींचती है। इसके अलावा, जब चांदी जरूरत से ज्यादा महंगी हो जाती है, तो बाजार “रिप्लेसमेंट” की राह पकड़ता है इंडस्ट्री और निवेशक कॉपर-एल्यूमीनियम जैसे विकल्पों की ओर शिफ्ट होने लगते हैं, जिससे मांग घटने का खतरा बढ़ता है। गोल्ड-सिल्वर रेश्यो अगर अपने निचले स्तर से ऊपर की तरफ सामान्य होने लगे, तो संकेत यही होगा कि गोल्ड तुलनात्मक रूप से मजबूत हो रहा है और चांदी में करेक्शन की गुंजाइश बढ़ रही है। ऊपर से तेज उछाल के बाद मुनाफावसूली लगभग तय मानी जाती है यही हवा निकलने वाला दौर कई बार गिरावट को अचानक तेज कर देता है। वहीं फेड रेट-कट की उम्मीदें अगर पहले ही भाव में डिस्काउंट हो चुकी हों, तो आगे बाजार फेड की टिप्पणी और संकेतों पर ज्यादा झटके खा सकता है। इन्हीं फैक्टर्स के जोड़ से विश्लेषकों का आकलन है कि अगर चांदी 3.25–3.30 लाख के पास जाकर फिसलती है, तो 30% तक का करेक्शन संभव है ।
इतिहास में बड़े फॉल पहले भी हुए हैं। 1980 में चांदी के भाव पीक के बाद बहुत कम समय में तेज टूटे थे। 2011 में भी ऊंचे स्तरों के बाद करेक्शन देखने को मिला। विशेषज्ञों का तर्क है कि जब बाजार अति-उत्साह में होता है और कीमतें जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो गिरावट भी उतनी ही तेज हो सकती है। हालांकि, आज का बाजार 1980 जैसा हूबहू होगा यह कहना ठीक नहीं, लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि परवलयिक (बहुत तेज) तेजी के बाद करेक्शन का जोखिम बढ़ जाता है।