इतनी चांदी खप कहां रही है? टेक्नोलॉजी ने कैसे बढ़ाई कीमतें
सोलर एनर्जी की रफ्तार बढ़ने के साथ फोटोवोल्टिक सेल्स में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर पेस्ट भी मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है। वहीं EV और ऑटोमोबाइल की दुनिया में वायरिंग, सेंसर, बैटरी चार्जिंग सिस्टम और ऑटोनॉमस टेक की चिप्स तक चांदी की खपत बढ़ती जा रही है।

Silver Price : सोमवार को MCX पर चांदी ने पहली बार 3 लाख रुपये प्रति किलो का आंकड़ा छूकर बाजार में नई हलचल पैदा कर दी। भाव लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं, इसलिए आम खरीदार के मन में एक स्वाभाविक सवाल उठता है जब चांदी के गहनों का चलन पहले जैसा नहीं रहा, तो कीमतें इतनी तेज़ क्यों भाग रही हैं? दरअसल चांदी की कहानी अब ज्वेलरी तक सीमित नहीं रही टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और इंडस्ट्रियल सेक्टर ने इसे नए दौर की हाई-डिमांड धातु बना दिया है। यही वजह है कि मांग का दबाव बढ़ते ही निवेशकों की नजर भी चांदी पर टिक गई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल में देश में करीब 33 हजार टन चांदी की खपत हुई जिसमें जेवर और सिक्कों के साथ-साथ उद्योगों की जरूरत भी शामिल है। जैसे-जैसे इंडस्ट्रियल मांग का दायरा फैल रहा है, बाजार में यह धारणा मजबूत हो रही है कि चांदी की कीमतों में अभी और तेजी की गुंजाइश बनी रह सकती है।
1) चांदी का इस्तेमाल अब कहां-कहां हो रहा है?
चांदी की असली चमक अब शोरूम की रौशनी में नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों की मशीनों और हाई-टेक लैब्स के सर्किट में दिखाई दे रही है। आज यह धातु ज्वेलरी से आगे बढ़कर आधुनिक अर्थव्यवस्था की वर्कहॉर्स मेटल बन चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी, कैमरा, माइक्रोचिप और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड तक हर जगह चांदी की जरूरत कंडक्टर और कोटिंग के रूप में पड़ती है। सोलर एनर्जी की रफ्तार बढ़ने के साथ फोटोवोल्टिक सेल्स में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर पेस्ट भी मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है। वहीं EV और ऑटोमोबाइल की दुनिया में वायरिंग, सेंसर, बैटरी चार्जिंग सिस्टम और ऑटोनॉमस टेक की चिप्स तक चांदी की खपत बढ़ती जा रही है। मेडिकल सेक्टर में इसकी एंटी-बैक्टीरियल क्षमता के कारण वाउंड ड्रेसिंग, फिल्टर और उपकरणों की कोटिंग जैसी जरूरतें बनी हुई हैं। और परंपरागत तौर पर शगुन, पूजा-पाठ, सिक्के, पायल, बर्तन और धार्मिक वस्तुओं में चांदी की मांग आज भी स्थिर है। यही वजह है कि बढ़ती औद्योगिक जरूरतों और सांस्कृतिक उपयोग के मेल से भारत दुनिया के बड़े चांदी उपभोक्ताओं में लगातार गिना जाता है।
2) मांग अचानक क्यों बढ़ गई?
चांदी की तेजी किसी एक वजह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह कई परतों में बनता दबाव है और हर परत कीमतों को ऊपर धकेलती चली जाती है। दुनिया जिस रफ्तार से ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है, उसी रफ्तार से सोलर प्रोजेक्ट्स का जाल फैल रहा है और हर नए सोलर सेटअप के साथ चांदी की जरूरत बढ़ती जाती है। दूसरी तरफ EV और टेक्नोलॉजी बूम ने इंडस्ट्री की मांग को नया ईंधन दिया है ऑटो, बैटरी, सेंसर और एडवांस्ड चिप्स जैसी जरूरतों में चांदी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। इसी बीच अपूर्ति की टाइटनेस भी बाजार को और संवेदनशील बना रही है खनन उत्पादन में सीमाएं और सप्लाई-चेन की रुकावटें उपलब्धता घटाती हैं तो भाव स्वाभाविक रूप से चढ़ते हैं। महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक भी चांदी को सेफ-हैवन की तरह देखने लगे हैं, जिससे खरीदारी का दबाव बढ़ता है। ऊपर से नीतिगत समर्थन भारत समेत कई देशों की ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां मांग को लंबी अवधि का सहारा देती हैं। नतीजा यह कि चांदी की कीमतें क्षणिक उछाल नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल डिमांड के दम पर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ती दिख रही हैं।
3) भारत में चांदी का खजाना कहां है?
भारत की कहानी चांदी के मामले में थोड़ी उलटी है खपत के मोर्चे पर देश आगे, लेकिन उत्पादन के मोर्चे पर सीमाएं साफ दिखती हैं। यहां चांदी की ज्यादातर आपूर्ति किसी अलग सिल्वर माइन से नहीं आती, बल्कि जिंक, लेड और कॉपर की खदानों से बाय-प्रोडक्ट के तौर पर निकलती है यानी चांदी अक्सर मुख्य धातु नहीं, साइड-प्रोडक्शन बनकर साथ आती है। राजस्थान इस लिहाज से सबसे अहम पट्टी मानी जाती है, जहां जिंक-लेड माइनिंग के दौरान बड़ी मात्रा में चांदी भी निकलती है और यहां की खनन गतिविधियां देश की सप्लाई में बड़ा योगदान देती हैं। झारखंड की जमशेदपुर के आसपास की माइनिंग बेल्ट में उत्पादन सीमित स्तर पर बताया जाता है। वहीं कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गोल्ड/कॉपर खनन के साथ चांदी का हिस्सा भी साथ-साथ निकलता है। देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी छिटपुट उत्पादन मौजूद है, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि घरेलू मांग के मुकाबले भारतीय सप्लाई कम पड़ती है और यही कमी आयात पर निर्भरता को बढ़ाती है।
4) भारत किन देशों से चांदी आयात करता है?
घरेलू मांग की रफ्तार इतनी तेज है कि भारत की अपनी आपूर्ति अक्सर कम पड़ जाती है और यहीं से आयात की मजबूरी शुरू होती है। बाजार में आम तौर पर मेक्सिको, पेरू, रूस और चीन जैसे देशों को भारत के प्रमुख सोर्स के रूप में देखा जाता है, जहां से बड़े पैमाने पर चांदी मंगाई जाती है। Silver Price
Silver Price : सोमवार को MCX पर चांदी ने पहली बार 3 लाख रुपये प्रति किलो का आंकड़ा छूकर बाजार में नई हलचल पैदा कर दी। भाव लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं, इसलिए आम खरीदार के मन में एक स्वाभाविक सवाल उठता है जब चांदी के गहनों का चलन पहले जैसा नहीं रहा, तो कीमतें इतनी तेज़ क्यों भाग रही हैं? दरअसल चांदी की कहानी अब ज्वेलरी तक सीमित नहीं रही टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और इंडस्ट्रियल सेक्टर ने इसे नए दौर की हाई-डिमांड धातु बना दिया है। यही वजह है कि मांग का दबाव बढ़ते ही निवेशकों की नजर भी चांदी पर टिक गई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल में देश में करीब 33 हजार टन चांदी की खपत हुई जिसमें जेवर और सिक्कों के साथ-साथ उद्योगों की जरूरत भी शामिल है। जैसे-जैसे इंडस्ट्रियल मांग का दायरा फैल रहा है, बाजार में यह धारणा मजबूत हो रही है कि चांदी की कीमतों में अभी और तेजी की गुंजाइश बनी रह सकती है।
1) चांदी का इस्तेमाल अब कहां-कहां हो रहा है?
चांदी की असली चमक अब शोरूम की रौशनी में नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों की मशीनों और हाई-टेक लैब्स के सर्किट में दिखाई दे रही है। आज यह धातु ज्वेलरी से आगे बढ़कर आधुनिक अर्थव्यवस्था की वर्कहॉर्स मेटल बन चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी, कैमरा, माइक्रोचिप और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड तक हर जगह चांदी की जरूरत कंडक्टर और कोटिंग के रूप में पड़ती है। सोलर एनर्जी की रफ्तार बढ़ने के साथ फोटोवोल्टिक सेल्स में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर पेस्ट भी मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है। वहीं EV और ऑटोमोबाइल की दुनिया में वायरिंग, सेंसर, बैटरी चार्जिंग सिस्टम और ऑटोनॉमस टेक की चिप्स तक चांदी की खपत बढ़ती जा रही है। मेडिकल सेक्टर में इसकी एंटी-बैक्टीरियल क्षमता के कारण वाउंड ड्रेसिंग, फिल्टर और उपकरणों की कोटिंग जैसी जरूरतें बनी हुई हैं। और परंपरागत तौर पर शगुन, पूजा-पाठ, सिक्के, पायल, बर्तन और धार्मिक वस्तुओं में चांदी की मांग आज भी स्थिर है। यही वजह है कि बढ़ती औद्योगिक जरूरतों और सांस्कृतिक उपयोग के मेल से भारत दुनिया के बड़े चांदी उपभोक्ताओं में लगातार गिना जाता है।
2) मांग अचानक क्यों बढ़ गई?
चांदी की तेजी किसी एक वजह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह कई परतों में बनता दबाव है और हर परत कीमतों को ऊपर धकेलती चली जाती है। दुनिया जिस रफ्तार से ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है, उसी रफ्तार से सोलर प्रोजेक्ट्स का जाल फैल रहा है और हर नए सोलर सेटअप के साथ चांदी की जरूरत बढ़ती जाती है। दूसरी तरफ EV और टेक्नोलॉजी बूम ने इंडस्ट्री की मांग को नया ईंधन दिया है ऑटो, बैटरी, सेंसर और एडवांस्ड चिप्स जैसी जरूरतों में चांदी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। इसी बीच अपूर्ति की टाइटनेस भी बाजार को और संवेदनशील बना रही है खनन उत्पादन में सीमाएं और सप्लाई-चेन की रुकावटें उपलब्धता घटाती हैं तो भाव स्वाभाविक रूप से चढ़ते हैं। महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक भी चांदी को सेफ-हैवन की तरह देखने लगे हैं, जिससे खरीदारी का दबाव बढ़ता है। ऊपर से नीतिगत समर्थन भारत समेत कई देशों की ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां मांग को लंबी अवधि का सहारा देती हैं। नतीजा यह कि चांदी की कीमतें क्षणिक उछाल नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल डिमांड के दम पर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ती दिख रही हैं।
3) भारत में चांदी का खजाना कहां है?
भारत की कहानी चांदी के मामले में थोड़ी उलटी है खपत के मोर्चे पर देश आगे, लेकिन उत्पादन के मोर्चे पर सीमाएं साफ दिखती हैं। यहां चांदी की ज्यादातर आपूर्ति किसी अलग सिल्वर माइन से नहीं आती, बल्कि जिंक, लेड और कॉपर की खदानों से बाय-प्रोडक्ट के तौर पर निकलती है यानी चांदी अक्सर मुख्य धातु नहीं, साइड-प्रोडक्शन बनकर साथ आती है। राजस्थान इस लिहाज से सबसे अहम पट्टी मानी जाती है, जहां जिंक-लेड माइनिंग के दौरान बड़ी मात्रा में चांदी भी निकलती है और यहां की खनन गतिविधियां देश की सप्लाई में बड़ा योगदान देती हैं। झारखंड की जमशेदपुर के आसपास की माइनिंग बेल्ट में उत्पादन सीमित स्तर पर बताया जाता है। वहीं कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गोल्ड/कॉपर खनन के साथ चांदी का हिस्सा भी साथ-साथ निकलता है। देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी छिटपुट उत्पादन मौजूद है, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि घरेलू मांग के मुकाबले भारतीय सप्लाई कम पड़ती है और यही कमी आयात पर निर्भरता को बढ़ाती है।
4) भारत किन देशों से चांदी आयात करता है?
घरेलू मांग की रफ्तार इतनी तेज है कि भारत की अपनी आपूर्ति अक्सर कम पड़ जाती है और यहीं से आयात की मजबूरी शुरू होती है। बाजार में आम तौर पर मेक्सिको, पेरू, रूस और चीन जैसे देशों को भारत के प्रमुख सोर्स के रूप में देखा जाता है, जहां से बड़े पैमाने पर चांदी मंगाई जाती है। Silver Price












