ओशो को लेकर सबसे बड़ी भ्रान्ति यह है कि ओशो एक sex गुरु थे। बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। ओशो की मौत को लेकर भी एक बड़ा रहस्य मौजूद है। ओशो को जानने वाले दवा करते है कि मौत कोई साधारण मौत नहीं थी , बल्कि धीमा जहर देकर ओशो की हत्या की गई थी।

Osho : ओशो 20 वीं शताब्दी के सबसे चर्चित धर्मगुरु रहे है। ओशो की मौत को 35 वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है। कोई व्यक्ति अपनी मौत के 35 वर्ष बाद भी उतनी ही चर्चा में बना रहे जितनी चर्चा में वह जीवित रहते हुए हुई थी,तो इसे उस व्यक्ति का आकर्षण ही कहा जा सकता है। ओशो के भक्तों,ओशो के अनुयायी हो अथवा ओशो के विरोधी हो ओशो के आकर्षण से कोई बच नहीं पाया है। ओशो को लेकर सबसे बड़ी भ्रान्ति यह है कि ओशो एक sex गुरु थे। बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। ओशो की मौत को लेकर भी एक बड़ा रहस्य मौजूद है। ओशो को जानने वाले दवा करते है कि मौत कोई साधारण मौत नहीं थी , बल्कि धीमा जहर देकर ओशो की हत्या की गई थी। यहाँ हम आपको ओशो के जीवन के महत्वपूर्ण पक्ष से परिचित कराने का प्रयास कर रहे है।
ओशो भारतीय दर्शन और आधुनिक चेतना-विमर्श का ऐसा नाम हैं, जो 35 साल बाद भी उतनी ही तीखी बहस का केंद्र है जितना अपने दौर में थे। उनके समर्थक उन्हें जड़ता तोड़ने वाला निर्भीक विचारक मानते रहे, जबकि आलोचक उनकी जीवनशैली और प्रयोगों को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे। ओशो अक्सर कहते थे कि इंसान धरती पर बस मेहमान है। ओशो के अनुसार मनुष्य पृथ्वी पर ठहरने नहीं, गुजरने के लिए आता है। लेकिन उनकी अपनी यात्रा भी उसी कथन की तरह जितनी बेपरवाह दिखती है, उतनी ही परतदार, बहसों से भरी और कई रहस्यों से घिरी रही। 11 दिसंबर 1939 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव में जैन परिवार में जन्मे ओशो का देहांत 19 जनवरी 1990 को पुणे में हुआ. मगर कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
आचार्य रजनीश जिन्हें दुनिया आज ओशो के नाम से पहचानती है उनके बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था। कहा जाता है कि शुरुआती वर्षों में उनका कुछ समय नानी के घर भी बीता और वहीं से उनके स्वभाव में वह अलग तरह की अकेली आजादी झलकने लगी, जो आगे चलकर उनकी सोच की पहचान भी बनी। समय के साथ साथ आचार्य रजनीश के नाम भी बदले और पहचान भी। 1960 के दशक में वे आचार्य रजनीश कहलाए, फिर उनके अनुयायियों ने उन्हें भगवान रजनीश के रूप में देखना शुरू कर दिया। लेकिन 1989 के आसपास दुनिया ने उन्हें सबसे अधिक ओशो नाम से जाना। ओशो शब्द को लेकर कई व्याख्याएं मिलती हैं कहीं इसे समुद्र में विलीन हो जाने जैसे अर्थ से जोड़ा जाता है, तो कहीं इसे भीतर की गहराई और विस्तार का प्रतीक माना जाता है। यही वजह रही कि उनके आश्रम, ध्यान केंद्र और संस्थान भी धीरे-धीरे इसी एक नाम ओशो के साथ पहचाने जाने लगे।
ओशो ने अपनी पेशेवर यात्रा की शुरुआत दर्शन (फिलॉसफी) के लेक्चरर के रूप में की, लेकिन जल्द ही क्लासरूम की दीवारें उनके लिए छोटी पड़ गईं। उनके प्रवचन तेज, बेबाक और सीधे चोट करने वाले थे। यही कारण था कि ओशो जितनी तेजी से लोगों के बीच चर्चित हुए, उतनी ही तेजी से विवादों के घेरे में भी आ गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक 1970 के आसपास वे मुंबई पहुंचे और वहीं से नव-संन्यास की अवधारणा के जरिए अपने शिष्यों का एक नया संसार खड़ा किया जो परंपरा से टकराता भी था और उसे चुनौती भी देता था। फिर 1974 में पुणे के कोरेगांव पार्क में उनका ध्यान-आधारित केंद्र/आश्रम स्थापित हुआ, जिसने देखते ही देखते भारत ही नहीं, विदेशों तक से आने वाले साधकों और जिज्ञासुओं को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया।
ओशो की जीवनशैली को लेकर चर्चा हमेशा तेज रही। उनके पहनावे, घड़ियों और लग्जरी पसंद को लेकर समर्थक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बताते थे , जबकि आलोचक इसे अध्यात्म के विरुद्ध मानते थे। कई रिपोर्ट्स में यह दावे भी सामने आते रहे कि शिष्यों से मिले उपहारों में रोल्स रॉयस जैसी कारें शामिल थीं हालांकि उनकी संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े बताए जाते हैं। मगर इतना तय है कि यह प्रसंग ओशो की छवि से लंबे समय तक चिपक गया और विरोधियों के लिए उन्हें घेरने का बड़ा हथियार बनता रहा। इन्ही विवादों और टकरावों के बीच ओशो 1980 के आसपास अमेरिका पहुंचे। ओरेगॉन में उनके अनुयायियों ने विशाल इलाके में एक अनोखा कम्यून बसाया, जिसे रजनीशपुरम के नाम से जाना गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां रहने से लेकर सुरक्षा, परिवहन, रेस्टोरेंट और सार्वजनिक सुविधाओं तक एक छोटे शहर जैसी पूरी व्यवस्था खड़ी कर दी गई थी। यही वह दौर था जब ओशो के प्रयोग और बयान बार-बार सुर्खियों में आए और उनके पक्ष-विपक्ष की बहस पहले से भी ज्यादा तेज हो गई।
ओरेगॉन का यह कम्यून आगे चलकर अमेरिकी प्रशासन की कड़ी निगरानी में आ गया। रजनीशपुरम से जुड़े एक बहुचर्चित बायोटेरर/फूड फ़ूड पॉइजनिंग प्रकरण में ओशो की सेक्रेटरी आनंद शीला को सजा मिलने के बाद माहौल और सख्त हो गया। इसके बाद इमिग्रेशन समेत अन्य आरोपों के तहत ओशो की गिरफ्तारी और पूछताछ की खबरें भी सामने आती रहीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ समय जेल में रहने के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि ओशो को अमेरिका छोड़ना पड़ा और इसी के साथ रजनीशपुरम की अलग दुनिया भी धीरे-धीरे बिखरने लगी। इसी दौर में कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया कि दुनिया के करीब 21 देशों ने ओशो के प्रवेश पर पाबंदी जैसी सख्ती की थी, हालांकि इन दावों के आंकड़ों और समय-सीमा को लेकर समय-समय पर बहस भी होती रही है।
1985 के आसपास ओशो भारत लौट आए और लौटते ही उनकी यात्रा एक बार फिर सुर्खियों सवालों और अटकलों के बीच आ खड़ी हुई। कुछ रिपोर्ट्स में नेपाल जाने-आने की चर्चाएं भी आती हैं, लेकिन कुल मिलाकर भारत वापसी के करीब पाँच साल बाद, 58 वर्ष की उम्र में पुणे में उनका निधन हो गया। यहीं से ओशो की कहानी का सबसे संवेदनशील और विवादित अध्याय शुरू होता है। एक तरफ ऐसे दावे उभरे कि अमेरिका में उन्हें थेलियम जैसे स्लो-पॉइजन दिए जाने की आशंका थी और खुद ओशो ने भी अपने भीतर जहर जैसे लक्षण महसूस होने की बात कही थी। दूसरी ओर, कुछ लोगों ने संस्था, संपत्ति और अंदरूनी खींचतान को भी शक की वजह बताया। सच क्या था यह आज भी साफ नहीं, लेकिन इतना तय है कि ओशो के जाने के बाद भी उनकी मृत्यु पर उठे सवाल उनकी चर्चा को और गहरा कर गए।
वरिष्ठ पत्रकार अभय वैद्य की किताब “Who Killed Osho” का जिक्र आते ही ओशो की मृत्यु से जुड़ी बहस फिर तेज़ हो जाती है। इस किताब में मौत के हालात, इलाज की प्रक्रिया, पोस्टमॉर्टम न होने, अंतिम संस्कार जल्दी कर दिए जाने और वसीयत जैसे पहलुओं पर सवाल उठाए गए हैं । कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ओशो की वसीयत को लेकर विवाद आगे चलकर बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां दस्तावेज़ की प्रामाणिकता पर अलग-अलग सवाल खड़े होते रहे। परिवार की तरफ से भी इसे पूरी तरह स्वाभाविक मृत्यु मानने पर संदेह जताए जाने की चर्चाएं सामने आती रही हैं।
आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में ओशो के वीडियो-प्रवचन एक बार फिर बड़े पैमाने पर सुने और साझा किए जा रहे हैं। कोई उन्हें जिंदगी की दिशा बदल देने वाली बातें बताता है, तो कोई उनके विचारों को खतरनाक हद तक उलझाने वाला करार देता है। शायद यही ओशो की कहानी का सबसे बड़ा सच भी है जैसे उनके विचार किसी एक निष्कर्ष में नहीं बंधते, वैसे ही उनकी जिंदगी और उनकी मौत भी आज तक किसी फैसले पर नहीं, बल्कि एक लगातार चलती बहस के रूप में मौजूद है। Osho