Galgotia University: गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन का रोबोटिक डॉग अपना बताकर झूठा दावा किया। इस झूठ ने केवल यूनिवर्सिटी की नहीं बल्कि भारत की AI छवि को नुकसान पहुंचाया। सरकार ने पवेलियन खाली कराया और विवाद को रोकने के लिए कदम उठाए।

ग्रेटर नोएडा में स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम पिछले कुछ दिनों से भारत के एआई (AI) क्षेत्र के एक बड़े विवाद में आया है। ग्रेटर नोएडा के इस कैंपस ने भारत के अंतरराष्ट्रीय AI समिट में हिस्सा लिया लेकिन वहां की प्रोफेसर ने चीन के बने रोबोटिक डॉग को अपनी यूनिवर्सिटी का बताकर बड़ा झूठ बोला। ग्रेटर नोएडा के इस परिसर में आयोजित यह प्रदर्शनी भारत की AI क्षमताओं को दुनिया के सामने दिखाने का मौका थी। लेकिन गलगोटिया यूनिवर्सिटी के इस झूठ ने ग्रेटर नोएडा और पूरे देश की छवि को नुकसान पहुंचाया। ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इस समिट में जो किया उसे केवल प्राइवेट यूनिवर्सिटी का प्रचार नहीं कहा जा सकता बल्कि यह भारत के लिए एक गंभीर मामला बन गया है।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी, Greater Noida, एआई और मशीन लर्निंग की पढ़ाई के लिए जानी जाती है। यूनिवर्सिटी ने अपने पवेलियन में चीन का रोबोटिक डॉग रखा और दावा किया कि इसे उनके सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने विकसित किया है। लेकिन सच यह था कि यह रोबोटिक डॉग चीन की कंपनी Unitree Robotics से खरीदा गया था। प्रोफेसर नेहा सिंह ने इसके बारे में झूठ बोला और बाद में अपने बयान को छिपाने की कोशिश की। इस झूठ ने सिर्फ ग्रेटर नोएडा के कैंपस की छवि को ही नहीं बल्कि पूरे भारत की एआई क्षमताओं की विश्वसनीयता को भी प्रभावित किया।
भारत सरकार ने ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पवेलियन को खाली करवा दिया और वहां की लाइटें बंद कर दी। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने साफ कहा कि समिट में जो भी डिस्प्ले किया जाता है वह वास्तविक और प्रामाणिक होना चाहिए। गलत जानकारी को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। ग्रेटर नोएडा में स्थित इस यूनिवर्सिटी की ओर से किसी भी विवाद को छुपाने की कोशिश की गई लेकिन सरकार ने स्पष्ट कदम उठाए।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी में सिर्फ रोबोटिक डॉग के लिए विवाद में नहीं आई। थर्माकोल ड्रोन और सॉकर ड्रोन को लेकर भी सवाल उठे। कहा गया कि ये डिवाइस असली इनोवेशन नहीं थे और इन्हें बस शो के लिए पेश किया गया। हालांकि यूनिवर्सिटी का कहना था कि ये उपकरण छात्रों के लर्निंग टूल के रूप में रखे गए थे। ग्रेटर नोएडा के इस कैंपस में छात्रों को आकर्षित करने के लिए कई बार अतिरंजित दावे का सहारा लिया जाता है।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्राइवेट यूनिवर्सिटी होने के कारण छात्रों से महंगी फीस लेती है। AI और मशीन लर्निंग में बीटेक की चार साल की पढ़ाई का खर्च लगभग 8 लाख रुपये है। छात्र इस यूनिवर्सिटी में इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें उच्च प्लेसमेंट का भरोसा मिलता है। लेकिन चीन के रोबोटिक डॉग जैसे विज्ञापन मॉडल छात्रों को लुभाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ग्रेटर नोएडा में इस यूनिवर्सिटी ने इन उपकरणों के जरिए अपनी आधुनिकता दिखाने की कोशिश की।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का यह झूठ भारत के AI समिट और देश के इनोवेशन सेक्टर के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। भारत AI क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन ग्रेटर नोएडा की इस गलगोटिया यूनिवर्सिटी के झूठ ने भारत की मेहनत को कमतर दिखाया।