बुलंद हौंसलों की मिसाल का गवाह बनी ग्रेटर नोएडा की धरती
ग्रेटर नोएडा में खेली जा रही डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला में खेल रहे दिव्यांग खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि यदि हौंसले बुलंद हों तो किसी भी प्रकार की दिव्यांगता मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।

Greater Noida News : उत्तर प्रदेश का ग्रेटर नोएडा शहर इन दिनों बुलंद हौंसलों की बड़ी मिसाल का गवाह बन रहा है। ग्रेटर नोएडा शहर में स्थापित शहीद विजय सिंह पथिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में मिक्स्ड डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला खेली जा रही है। ग्रेटर नोएडा में खेली जा रही डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला में खेल रहे दिव्यांग खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि यदि हौंसले बुलंद हों तो किसी भी प्रकार की दिव्यांगता मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।
किसी का पैर नहीं तो किसी का हाथ नहीं है
ग्रेटर नोएडा में खेली जा रही डिसेबिलिटी क्रिकेट में एक से बढक़र एक चौंकाने वाले दृश्य देखने को मिले हैं। इस प्रकार की क्रिकेट प्रतियोगिता में खेल रहे क्रिकेट के खिलाडिय़ों में से किसी खिलाड़ी के पैर नहीं हैं तो किसी खिलाड़ी के हाथ नहीं हैं। शरीर की दिव्यांगता के बावजूद यहां खेल रहे दिव्यांग खिलाड़ी जमकर चौके-छक्के मार रहे हैं। देखने वालों को अंदाजा भी नहीं है कि शरीर से दिव्यांग हो चुके इन खास प्रकार के खिलाडिय़ों के अंदर गजब के हौंसले भरे पड़े हैं। ग्रेटर नोएडा में खेल रहे कुछ दिव्यांग खिलाडिय़ों ने अपने जीवन के अनुभव मीडिया के साथ साझा किए है
गजब की क्रिकेट खेलते हैं दिव्यांग रविन्द्र
मिश्रित दिव्यांग टीम में भारतीय टीम के कप्तान दिव्यांग खिलाड़ी रविन्द्र गोपीनाथ संते हैं। भारतीय मिश्रित दिव्यांग क्रिकेट टीम के कप्तान रविन्द गोपीनाथ संते मूल रूप से मुंबई के कीलीवाड़ा (कोली गाँव) के रहने वाले हैं। रविन्द्र ने मीडिया को बताया कि जन्म से उनका सीधा हाथ पैरालिसिस हैं। लेकिन कभी भी इसको अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। क्रिकेट खेलना उन्हें अच्छा लगता हैं। पहले गांव में गांव के साथियों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेला करते थे। लेकिन डीसीसीआई की इंडिया में टीम में शामिल होने के लिए गांव से 65 किमी दूर तैयारियों के लिए जाना होता था। आने जाने में कुल करीब 130 किमी की दूरी तय करनी होती थी और इससे समय की बर्बादी होती थी। क्योंकि गांव के आसपास अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर स्टेडियम नहीं था। एक क्रिकेटर बनने में गांव से सभी लोगों से काफी सहयोग मिला। खासकर गांव के सरपंच ने काफी स्पोर्ट किया हैं।
शिव संकरा का हौंसला देता है बड़ी प्रेरणा
भारतीय मिश्रित दिव्यांग टीम के प्रसिद्ध बल्लेबाज शिव शंकर का हौंसला बड़ी प्रेरणा देता है। भारतीय टीम के बल्लेबाज कर्नाटक के बेंगलुरु निवासी शिव शंकरा महज छह साल की उम्र में एक सडक़ दुर्घटना में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। डॉक्टरों को उनका दायां हाथ काटना पड़ा, जिससे वे दिव्यांग हो गए। लेकिन शिव शंकरा का सपना कुछ और ही था। एक हाथ से क्रिकेट खेलने की शुरुआत करते समय उन्हें ताने भी सुनने पड़े, लेकिन उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज किया। कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने टॉप ऑर्डर में बल्लेबाजी शुरू की और आज वे भारतीय मिश्रित दिव्यांग टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।बचपन में हुआ पोलियो किन्तु हार नहीं मानी
भारतीय दिव्यांग मिश्रित क्रिकेट टीम के खिलाड़ी मुंबई निवासी आकाश पाटिल बचपन में पोलियो की चपेट में आ गए थे, जिससे उनका बायां पैर प्रभावित हुआ। हालांकि माता-पिता ने कभी उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास नहीं होने दिया। पिता स्वयं क्रिकेट खेला करते थे और बेटे को भी क्रिकेट के गुर सिखाते थे। आकाश बताते हैं कि एक समय उन्हें लगा था कि भारतीय टीम में खेलने का सपना अधूरा रह जाएगा। लेकिन डीसीसीआई ने उन्हें वह मंच दिया, जहां वे अपने सपनों को साकार कर सके। आज वे लिफ्टी स्पिनर और लिफ्टी बल्लेबाज के रूप में टीम के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं। Greater Noida News
Greater Noida News : उत्तर प्रदेश का ग्रेटर नोएडा शहर इन दिनों बुलंद हौंसलों की बड़ी मिसाल का गवाह बन रहा है। ग्रेटर नोएडा शहर में स्थापित शहीद विजय सिंह पथिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में मिक्स्ड डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला खेली जा रही है। ग्रेटर नोएडा में खेली जा रही डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला में खेल रहे दिव्यांग खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि यदि हौंसले बुलंद हों तो किसी भी प्रकार की दिव्यांगता मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।
किसी का पैर नहीं तो किसी का हाथ नहीं है
ग्रेटर नोएडा में खेली जा रही डिसेबिलिटी क्रिकेट में एक से बढक़र एक चौंकाने वाले दृश्य देखने को मिले हैं। इस प्रकार की क्रिकेट प्रतियोगिता में खेल रहे क्रिकेट के खिलाडिय़ों में से किसी खिलाड़ी के पैर नहीं हैं तो किसी खिलाड़ी के हाथ नहीं हैं। शरीर की दिव्यांगता के बावजूद यहां खेल रहे दिव्यांग खिलाड़ी जमकर चौके-छक्के मार रहे हैं। देखने वालों को अंदाजा भी नहीं है कि शरीर से दिव्यांग हो चुके इन खास प्रकार के खिलाडिय़ों के अंदर गजब के हौंसले भरे पड़े हैं। ग्रेटर नोएडा में खेल रहे कुछ दिव्यांग खिलाडिय़ों ने अपने जीवन के अनुभव मीडिया के साथ साझा किए है
गजब की क्रिकेट खेलते हैं दिव्यांग रविन्द्र
मिश्रित दिव्यांग टीम में भारतीय टीम के कप्तान दिव्यांग खिलाड़ी रविन्द्र गोपीनाथ संते हैं। भारतीय मिश्रित दिव्यांग क्रिकेट टीम के कप्तान रविन्द गोपीनाथ संते मूल रूप से मुंबई के कीलीवाड़ा (कोली गाँव) के रहने वाले हैं। रविन्द्र ने मीडिया को बताया कि जन्म से उनका सीधा हाथ पैरालिसिस हैं। लेकिन कभी भी इसको अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। क्रिकेट खेलना उन्हें अच्छा लगता हैं। पहले गांव में गांव के साथियों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेला करते थे। लेकिन डीसीसीआई की इंडिया में टीम में शामिल होने के लिए गांव से 65 किमी दूर तैयारियों के लिए जाना होता था। आने जाने में कुल करीब 130 किमी की दूरी तय करनी होती थी और इससे समय की बर्बादी होती थी। क्योंकि गांव के आसपास अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर स्टेडियम नहीं था। एक क्रिकेटर बनने में गांव से सभी लोगों से काफी सहयोग मिला। खासकर गांव के सरपंच ने काफी स्पोर्ट किया हैं।
शिव संकरा का हौंसला देता है बड़ी प्रेरणा
भारतीय मिश्रित दिव्यांग टीम के प्रसिद्ध बल्लेबाज शिव शंकर का हौंसला बड़ी प्रेरणा देता है। भारतीय टीम के बल्लेबाज कर्नाटक के बेंगलुरु निवासी शिव शंकरा महज छह साल की उम्र में एक सडक़ दुर्घटना में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। डॉक्टरों को उनका दायां हाथ काटना पड़ा, जिससे वे दिव्यांग हो गए। लेकिन शिव शंकरा का सपना कुछ और ही था। एक हाथ से क्रिकेट खेलने की शुरुआत करते समय उन्हें ताने भी सुनने पड़े, लेकिन उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज किया। कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने टॉप ऑर्डर में बल्लेबाजी शुरू की और आज वे भारतीय मिश्रित दिव्यांग टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।बचपन में हुआ पोलियो किन्तु हार नहीं मानी
भारतीय दिव्यांग मिश्रित क्रिकेट टीम के खिलाड़ी मुंबई निवासी आकाश पाटिल बचपन में पोलियो की चपेट में आ गए थे, जिससे उनका बायां पैर प्रभावित हुआ। हालांकि माता-पिता ने कभी उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास नहीं होने दिया। पिता स्वयं क्रिकेट खेला करते थे और बेटे को भी क्रिकेट के गुर सिखाते थे। आकाश बताते हैं कि एक समय उन्हें लगा था कि भारतीय टीम में खेलने का सपना अधूरा रह जाएगा। लेकिन डीसीसीआई ने उन्हें वह मंच दिया, जहां वे अपने सपनों को साकार कर सके। आज वे लिफ्टी स्पिनर और लिफ्टी बल्लेबाज के रूप में टीम के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं। Greater Noida News












