पति को मारने के बाद महिला ने किया सनसनीखेज कृत्य

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के चिलुवुरु गांव से दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। लक्ष्मी माधुरी नामक महिला ने अपने पति लोकम शिव नागराजू की हत्या की साजिश रची और प्रेमी की मदद से उसे अंजाम दिया। पड़ोसियों और दोस्तों ने नागराजू के कान के पास खून और चोट देखीं।

The case from Chiluvuru village in Andhra Pradesh
आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के चिलुवुरु गांव का मामला (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar23 Jan 2026 06:24 PM
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Andhra Pradesh News : पुलिस के अनुसार, घटना वाली रात माधुरी ने अपने पति के लिए बिरयानी बनाई और उसमें नींद की गोलियां मिला दीं। गहरी नींद में सोते ही नागराजू की हत्या के लिए माधुरी का प्रेमी गोपी रात 11:30 बजे घर पहुंचा। गोपी ने नागराजू की छाती पर बैठकर उन्हें जकड़ा और माधुरी ने तकिए से उनका दम घोंट दिया।

हत्या के बाद बर्बरता

बता दें कि पति के मौत की सुनिश्चित करने के बाद गोपी वहां से चला गया। लेकिन माधुरी ने मदद नहीं मांगी और न ही पड़ोसियों को सूचना दी। पुलिस का दावा है कि वह पूरे समय पति के शव के पास बैठी रही और अश्लील वीडियो देखती रही।

संदेह से खुली सच्चाई

बता दें कि सुबह करीब 4 बजे माधुरी पड़ोसियों के पास गई और कहा कि पति की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। हालांकि पड़ोसियों और दोस्तों ने नागराजू के कान के पास खून और चोट देखीं। पोस्टमार्टम में पुष्टि हुई कि मौत दम घुटने से हुई और छाती की हड्डियों में फ्रैक्चर था। पूछताछ में माधुरी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। Andhra Pradesh News

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लाल क़िले की दीवारों में दर्ज है भारत का राजनीतिक इतिहास

गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल क़िले से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर इसकी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

Delhi Red Fort History
अंग्रेज़ों ने महल को बनाया सैनिक छावनी (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar23 Jan 2026 04:46 PM
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दिल्ली का लाल क़िला केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि सदियों से हिंदुस्तान की सत्ता, संघर्ष और संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है। मुग़ल साम्राज्य के स्वर्णिम युग से लेकर ब्रिटिश राज और आधुनिक भारत तक, लाल क़िले ने सत्ता के हर उतार-चढ़ाव को नज़दीक से देखा है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल क़िले से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर इसकी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठता है कि आख़िर लाल क़िला ही क्यों सत्ता का प्रतीक बना?

शाहजहां से शुरू हुआ सत्ता का सफ़र

लाल क़िले का निर्माण 1639 में मुग़ल बादशाह शाहजहां ने यमुना नदी के तट पर करवाया था। इसे उस दौर में क़िला-ए-मुबारक कहा जाता था। लाल बलुआ पत्थर से बने इस क़िले को मुग़ल साम्राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक राजधानी के रूप में विकसित किया गया। यहीं से बादशाह झरोखा दर्शन देते थे, दीवान-ए-आम में जनता की फरियाद सुनी जाती थी और दीवान-ए-ख़ास में साम्राज्य के अहम फ़ैसले लिए जाते थे। यही वजह रही कि लाल क़िला सत्ता का केंद्र बन गया।

षड्यंत्र और सत्ता संघर्ष का गवाह

लाल क़िले ने मुग़ल इतिहास के सबसे दर्दनाक सत्ता संघर्ष भी देखे। दारा शिकोह और औरंगज़ेब के बीच छिड़ा युद्ध, दारा की पराजय, सार्वजनिक अपमान और अंततः उनकी हत्या—ये सब घटनाएं इसी क़िले से जुड़ी हैं। इसके बाद औरंगज़ेब का कठोर शासन और फिर मुग़ल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ।

लूट, आक्रमण और पतन

1739 में ईरान के नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर लाल क़िले से मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा लूट लिया। इसके बाद अफ़ग़ान, मराठा और सिख आक्रमणों ने क़िले की गरिमा को गहरी चोट पहुंचाई। धीरे-धीरे लाल क़िला सिर्फ़ एक प्रतीक बनकर रह गया।

1857 की क्रांति और ब्रिटिश राज

1857 की पहली आज़ादी की लड़ाई में लाल क़िला विद्रोह का केंद्र बना। बहादुर शाह ज़फ़र को विद्रोह का प्रतीक मानते हुए अंग्रेज़ों ने यहीं उन पर मुक़दमा चलाया और बाद में उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया।इसके बाद अंग्रेज़ों ने लाल क़िले को शाही महल से सैनिक छावनी में बदल दिया। मुग़ल स्थापत्य को नुकसान पहुंचाया गया और कई ऐतिहासिक इमारतों का स्वरूप बदल दिया गया।

आजादी की गूंज और आधुनिक भारत

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर चले मुक़दमे ने लाल क़िले को आज़ादी की लड़ाई का नया प्रतीक बना दिया। 15 अगस्त 1947 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल क़िले से तिरंगा फहराया, तब यह क़िला औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त भारत की पहचान बन गया।

आज का लाल क़िला

वर्ष 2007 में यूनेस्को ने लाल क़िले को विश्व धरोहर घोषित किया। आज यह भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्रीय अस्मिता और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। हर साल प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस पर इसी क़िले से राष्ट्र को संबोधन देना इस परंपरा को आगे बढ़ाता है। लाल क़िला केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि भारत के इतिहास की जीवित गवाही है—जहां सत्ता बनी, टूटी और अंततः जनता के हाथों में आई।

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अभी भी जिंदा है 426 साल पुरानी ईस्ट इंडिया कम्पनी

ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारण ही भारत 200 साल तक गुलाम बना रहा है। बड़ा सवाल यह है कि भारत को गुलाम बनाने वाली ईस्ट इंडिया कम्पनी कहां चली गई? सवाल यह भी है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी अब कहां पर है?

426 साल बाद भी जिंदा है East India Company
426 साल बाद भी जिंदा है East India Company
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar23 Jan 2026 04:19 PM
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Who owns the East India Company? : भारत में 77वें गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही हैं। भारत की आजादी के बाद भारत में संविधान लागू होने की याद में गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। ऐसे में उस कंपनी की याद आना जरूरी है जिस कंपनी के कारण भारत 200 साल तक गुलाम बना रहा। उस कंपनी का नाम था ईस्ट इंडिया कम्पनी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारण ही भारत 200 साल तक गुलाम बना रहा है। बड़ा सवाल यह है कि भारत को गुलाम बनाने वाली ईस्ट इंडिया कम्पनी कहां चली गई? सवाल यह भी है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी अब कहां पर है?

ईस्ट इंडिया कम्पनी 426 साल पहले बनी थी

भारत को गुलाम बनाने वाली ईस्ट इंडिया कम्पनी के वर्तमान की बात करने से पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी के इतिहास की बात करना जरूरी है। आपको बता दें कि ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड में एक व्यापारिक कंपनी के रूप में हुई थी। इसको ब्रिटिश क्राउन से व्यापार के विशेष अधिकार मिले थे। जिसमें मुख्य रूप से भारत और पूर्वी एशिया के देश शामिल थे। व्यापार करने आई इस कंपनी का धीरे धीरे ने सैन्य और राजनीतिक प्रभाव बढऩे लगा और भारत में प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी ने बंगाल पर पूरी तरह कब्जा कर लिया। धीरे-धीरे यह सिलसिला पूरे देश में बढ़ा और एक समय ऐसा आया कि कंपनी का पूरे भारत पर अधिकार हो गया। हालांकि, जिस गति से कब्जा बढ़ा उसी गति से आजादी की मांग भी बढ़ी। 1857 की क्रांति जिसे भारत की आजादी की पहली क्रांति के तौर पर जाना जाता है, इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन छीन लिया। इसका मतलब हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने इस कंपनी से राजनीतिक और सैन्य ताकत को खत्म कर दिया।

वर्तमान में भारत का नागरिक है ईस्ट इंडिया कंपनी का मालिक 

वर्तमान समय की बात करें तो भारत पर 200 सालों तक राज करने वाली इस कंपनी का अधिकार 1874 में पूरी तरह खत्म कर दिया गया था, 131 साल बाद भारत के नागरिक संजीव मेहता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को खरीद लिया, इस कंपनी को साल 2005 में अधिग्रहण करने के बाद संजीव मेहता ने लग्जरी चाय, कॉफी और फूड आइटम्स की तरफ कंपनी का रुख मोड़ा और आज कंपनी लग्जरी चाय, कॉफी और लग्जरी गिफ्ट हैंपर तैयार करती है। इसके अलावा लग्जरी होमवेयर के साथ अन्य कई तरह के पेय पदार्थ कंपनी की तरफ से तैयार किया जाता है। Who owns the East India Company?

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