जाने भारत का गौरव, सम्राट अशोक का ऐतिहासिक परिचय
अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग एक से पंद्रह लाख लोगों की जान गई।

Historical introduction of Emperor Ashoka : मौर्य वंश के इतिहास में एक ऐसे शासक का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है, जिन्होंने तलवार के बजाय धर्म की शक्ति को अपनाते हुए विश्व इतिहास में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। सम्राट अशोक, जिन्हें उनके शासनकाल में 'असोक' के नाम से जाना जाता था, न केवल मौर्य साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि कलिंग युद्ध के बाद अपने जीवन के बदले हुए रूप के कारण आज भी एक आदर्श शासक के रूप में याद किए जाते हैं।
चंडाशोक से प्रियदर्शी तक का सफर
चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में अशोक एक महत्वाकांक्षी और कठोर शासक थे, जिन्हें 'चंडाशोक' कहा जाता था। उन्होंने उज्जैन और तक्षशिला में हुए विद्रोहों को कुचलने में अपनी क्षमता का परिचय दिया। ईसा पूर्व 273 के आसपास सिंहासन संभालने वाले अशोक ने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल के कारण मौर्य साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल और दक्षिण में मैसूर तक कर दिया।
कलिंग युद्ध: जीवन का निर्णायक मोड़
अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग एक से पंद्रह लाख लोगों की जान गई। इस विनाश और खूनखराबे ने अशोक के हृदय में हलचल मचा दी। युद्ध के भयावह परिणामों ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने युद्ध और हिंसा का मार्ग हमेशा के लिए त्याग दिया।
धम्म विजय और लोककल्याणकारी नीतियां
कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और 'धम्म विजय' (धर्म द्वारा विजय) का नारा दिया। उन्होंने अपने साम्राज्य में प्रजा के कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। उनके शासनकाल में मानव और पशु अस्पतालों की स्थापना, सड़कों पर पेड़ लगाना, कुओं की खुदाई और सिंचाई केंद्रों का निर्माण जैसे लोककल्याणकारी कार्य कराए गए। उन्होंने पशु शिकार पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अपनी प्रजा के प्रति करुणा और प्रेम के कारण उन्हें 'देवनमप्रिय प्रियदर्शी' की उपाधि मिली। उन्होंने घोषणा की, "सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।"
शिलालेखों में दर्ज है विरासत
अशोक ने अपने विचारों और आदेशों को देश के विभिन्न रणनीतिक स्थानों पर चट्टानों और स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया। सारनाथ में मिला सिंह स्तंभ आज भारत गणराज्य का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है, जबकि अशोक चक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अंग है। उन्होंने अपने पुत्र महिंदा और पुत्री संघामित्रा को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा।
अंतिम विदाई
37 वर्षों तक शासन करने वाले इस महान सम्राट का 72 वर्ष की आयु में पाटलिपुत्र में निधन हो गया है। उनकी मृत्यु के बाद मौर्य वंश का विभाजन हो गया और उनके पौत्र दशरथ मौर्य ने उनका उत्तराधिकार संभाला है। इतिहासकार मानते हैं कि अशोक ने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची विजय वह नहीं जो युद्ध से मिलती है, बल्कि वह है जो धर्म और दया से प्राप्त होती है। Historical introduction of Emperor Ashoka
Historical introduction of Emperor Ashoka : मौर्य वंश के इतिहास में एक ऐसे शासक का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है, जिन्होंने तलवार के बजाय धर्म की शक्ति को अपनाते हुए विश्व इतिहास में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। सम्राट अशोक, जिन्हें उनके शासनकाल में 'असोक' के नाम से जाना जाता था, न केवल मौर्य साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि कलिंग युद्ध के बाद अपने जीवन के बदले हुए रूप के कारण आज भी एक आदर्श शासक के रूप में याद किए जाते हैं।
चंडाशोक से प्रियदर्शी तक का सफर
चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में अशोक एक महत्वाकांक्षी और कठोर शासक थे, जिन्हें 'चंडाशोक' कहा जाता था। उन्होंने उज्जैन और तक्षशिला में हुए विद्रोहों को कुचलने में अपनी क्षमता का परिचय दिया। ईसा पूर्व 273 के आसपास सिंहासन संभालने वाले अशोक ने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल के कारण मौर्य साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल और दक्षिण में मैसूर तक कर दिया।
कलिंग युद्ध: जीवन का निर्णायक मोड़
अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग एक से पंद्रह लाख लोगों की जान गई। इस विनाश और खूनखराबे ने अशोक के हृदय में हलचल मचा दी। युद्ध के भयावह परिणामों ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने युद्ध और हिंसा का मार्ग हमेशा के लिए त्याग दिया।
धम्म विजय और लोककल्याणकारी नीतियां
कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और 'धम्म विजय' (धर्म द्वारा विजय) का नारा दिया। उन्होंने अपने साम्राज्य में प्रजा के कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। उनके शासनकाल में मानव और पशु अस्पतालों की स्थापना, सड़कों पर पेड़ लगाना, कुओं की खुदाई और सिंचाई केंद्रों का निर्माण जैसे लोककल्याणकारी कार्य कराए गए। उन्होंने पशु शिकार पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अपनी प्रजा के प्रति करुणा और प्रेम के कारण उन्हें 'देवनमप्रिय प्रियदर्शी' की उपाधि मिली। उन्होंने घोषणा की, "सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।"
शिलालेखों में दर्ज है विरासत
अशोक ने अपने विचारों और आदेशों को देश के विभिन्न रणनीतिक स्थानों पर चट्टानों और स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया। सारनाथ में मिला सिंह स्तंभ आज भारत गणराज्य का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है, जबकि अशोक चक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अंग है। उन्होंने अपने पुत्र महिंदा और पुत्री संघामित्रा को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा।
अंतिम विदाई
37 वर्षों तक शासन करने वाले इस महान सम्राट का 72 वर्ष की आयु में पाटलिपुत्र में निधन हो गया है। उनकी मृत्यु के बाद मौर्य वंश का विभाजन हो गया और उनके पौत्र दशरथ मौर्य ने उनका उत्तराधिकार संभाला है। इतिहासकार मानते हैं कि अशोक ने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची विजय वह नहीं जो युद्ध से मिलती है, बल्कि वह है जो धर्म और दया से प्राप्त होती है। Historical introduction of Emperor Ashoka












