जाने भारत का गौरव, सम्राट अशोक का ऐतिहासिक परिचय

अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग एक से पंद्रह लाख लोगों की जान गई।

Emperor Ashoka Historical
अशोक के धर्म प्रचार के अमिट प्रमाण (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar12 Feb 2026 03:39 PM
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Historical introduction of Emperor Ashoka : मौर्य वंश के इतिहास में एक ऐसे शासक का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है, जिन्होंने तलवार के बजाय धर्म की शक्ति को अपनाते हुए विश्व इतिहास में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। सम्राट अशोक, जिन्हें उनके शासनकाल में 'असोक' के नाम से जाना जाता था, न केवल मौर्य साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि कलिंग युद्ध के बाद अपने जीवन के बदले हुए रूप के कारण आज भी एक आदर्श शासक के रूप में याद किए जाते हैं।

चंडाशोक से प्रियदर्शी तक का सफर

चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में अशोक एक महत्वाकांक्षी और कठोर शासक थे, जिन्हें 'चंडाशोक' कहा जाता था। उन्होंने उज्जैन और तक्षशिला में हुए विद्रोहों को कुचलने में अपनी क्षमता का परिचय दिया। ईसा पूर्व 273 के आसपास सिंहासन संभालने वाले अशोक ने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल के कारण मौर्य साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल और दक्षिण में मैसूर तक कर दिया।

कलिंग युद्ध: जीवन का निर्णायक मोड़

अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग एक से पंद्रह लाख लोगों की जान गई। इस विनाश और खूनखराबे ने अशोक के हृदय में हलचल मचा दी। युद्ध के भयावह परिणामों ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने युद्ध और हिंसा का मार्ग हमेशा के लिए त्याग दिया।

धम्म विजय और लोककल्याणकारी नीतियां

कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और 'धम्म विजय' (धर्म द्वारा विजय) का नारा दिया। उन्होंने अपने साम्राज्य में प्रजा के कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। उनके शासनकाल में मानव और पशु अस्पतालों की स्थापना, सड़कों पर पेड़ लगाना, कुओं की खुदाई और सिंचाई केंद्रों का निर्माण जैसे लोककल्याणकारी कार्य कराए गए। उन्होंने पशु शिकार पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अपनी प्रजा के प्रति करुणा और प्रेम के कारण उन्हें 'देवनमप्रिय प्रियदर्शी' की उपाधि मिली। उन्होंने घोषणा की, "सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।"

शिलालेखों में दर्ज है विरासत

अशोक ने अपने विचारों और आदेशों को देश के विभिन्न रणनीतिक स्थानों पर चट्टानों और स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया। सारनाथ में मिला सिंह स्तंभ आज भारत गणराज्य का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है, जबकि अशोक चक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अंग है। उन्होंने अपने पुत्र महिंदा और पुत्री संघामित्रा को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा।

अंतिम विदाई

37 वर्षों तक शासन करने वाले इस महान सम्राट का 72 वर्ष की आयु में पाटलिपुत्र में निधन हो गया है। उनकी मृत्यु के बाद मौर्य वंश का विभाजन हो गया और उनके पौत्र दशरथ मौर्य ने उनका उत्तराधिकार संभाला है। इतिहासकार मानते हैं कि अशोक ने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची विजय वह नहीं जो युद्ध से मिलती है, बल्कि वह है जो धर्म और दया से प्राप्त होती है। Historical introduction of Emperor Ashoka

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समुद्र में चलता ‘ईंधन का पहाड़’, जानिए जहाज का खर्चा गणित

अंतरराष्ट्रीय बाजार में समुद्री ईंधन की कीमतें तेल बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं। औसतन इसकी कीमत 600 से 800 डॉलर प्रति टन के बीच रहती है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 50,000 से 65,000 रुपये प्रति टन बैठती है।

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जानिए जहाज के ईंधन का गणित (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar12 Feb 2026 02:39 PM
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Ship Fuel Consumption: जब भी माइलेज की बात होती है तो आमतौर पर गाड़ियों को किलोमीटर प्रति लीटर के पैमाने पर आंका जाता है। लेकिन समुद्र में हजारों कंटेनर ढोने वाले विशाल जहाजों के लिए गणित बिल्कुल उल्टा हो जाता है। यहां सवाल यह नहीं होता कि जहाज 1 लीटर में कितनी दूरी तय करता है, बल्कि यह कि वह 1 किलोमीटर में कितने लीटर ईंधन जला देता है।

एक बड़े कंटेनर जहाज की खपत

करीब 350 से 400 मीटर लंबे बड़े कंटेनर जहाज प्रति किलोमीटर लगभग 200 से 250 लीटर तक ईंधन खर्च कर सकते हैं। इनकी दैनिक खपत स्पीड और लोड के अनुसार 150 से 250 टन तक पहुंच जाती है। आमतौर पर ये जहाज 20 से 24 नॉट (लगभग 37 से 44 किमी/घंटा) की क्रूजिंग स्पीड से चलते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्पीड में हल्की सी बढ़ोतरी भी ईंधन खपत को काफी बढ़ा देती है। यही वजह है कि शिपिंग कंपनियां लागत कम रखने के लिए नियंत्रित रफ्तार बनाए रखती हैं।

कौन सा ईंधन इस्तेमाल करते हैं जहाज?

साधारण गाड़ियों की तरह पेट्रोल या डीजल नहीं, बल्कि बड़े समुद्री जहाज ‘बंकर फ्यूल’ का इस्तेमाल करते हैं। इसमें मुख्य रूप से वेरी लो सल्फर फ्यूल ऑयल (VLSFO) या हैवी फ्यूल ऑयल (HFO) शामिल हैं। यह ईंधन सामान्य डीजल से ज्यादा गाढ़ा और भारी होता है और खास समुद्री इंजनों के लिए तैयार किया जाता है।पर्यावरणीय नियम सख्त होने के बाद कई जहाजों ने सल्फर उत्सर्जन कम करने के लिए कम सल्फर वाले ईंधन को अपनाया है।

1 किलोमीटर में कितना आता है खर्च?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में समुद्री ईंधन की कीमतें तेल बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं। औसतन इसकी कीमत 600 से 800 डॉलर प्रति टन के बीच रहती है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 50,000 से 65,000 रुपये प्रति टन बैठती है। यदि एक जहाज प्रति किलोमीटर लगभग 250 लीटर ईंधन खर्च करता है, तो मौजूदा कीमतों के आधार पर उसका अनुमानित ईंधन खर्च प्रति किलोमीटर करीब 15,000 से 20,000 रुपये तक हो सकता है।

क्यों बदलती रहती है खपत?

जहाज की ईंधन खपत स्थिर नहीं होती। कार्गो का वजन, जहाज का आकार, समुद्री मौसम और स्पीड जैसे कारक इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। पूरी तरह लदा हुआ जहाज इंजन पर ज्यादा दबाव डालता है, जिससे ईंधन की खपत बढ़ जाती है। स्पष्ट है कि समुद्री व्यापार की रीढ़ माने जाने वाले ये विशाल जहाज न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि इनके संचालन में ईंधन लागत एक अहम भूमिका निभाती है। Ship Fuel Consumption


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आज भारत बंद : न्यू लेबर कोड के खिलाफ आखिर क्यों सड़कों पर उतरे करोड़ों लोग?

आयोजकों का दावा है कि करीब 30 करोड़ से अधिक कर्मचारी और मजदूर इस हड़ताल में शामिल हैं। इस व्यापक बंद के पीछे मुख्य वजह सरकार द्वारा लाए गए चार नए श्रम कानून, कुछ आर्थिक नीतियां और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर उठी चिंताएं हैं।

bharat band
भारत बंद का आह्वान
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar12 Feb 2026 12:41 PM
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Bharat Bandh : 12 फरवरी को देशभर में बड़े स्तर पर भारत बंद का आह्वान किया गया है। इस बंद को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, बैंक कर्मचारियों के संगठनों और कई किसान संगठनों का समर्थन मिला है। आयोजकों का दावा है कि करीब 30 करोड़ से अधिक कर्मचारी और मजदूर इस हड़ताल में शामिल हैं। इस व्यापक बंद के पीछे मुख्य वजह सरकार द्वारा लाए गए चार नए श्रम कानून, कुछ आर्थिक नीतियां और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर उठी चिंताएं हैं।

मुख्य मुद्दा: नए लेबर कोड पर नाराजगी

सरकार ने पुराने 29 श्रम कानूनों को मिलाकर 4 नए लेबर कोड बनाए हैं। सरकार का कहना है कि इससे श्रम कानूनों को सरल और व्यवस्थित बनाया जाएगा। लेकिन ट्रेड यूनियनों का मानना है कि इन नए प्रावधानों से कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा कमजोर हो सकती है। उनका आरोप है कि कंपनियों के लिए कर्मचारियों की छंटनी आसान हो जाएगी। स्थायी नौकरियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम बढ़ सकता है। हड़ताल और यूनियन गतिविधियों पर सख्ती बढ़ सकती है, काम के घंटे बढ़ने की आशंका है। इसी वजह से यूनियनें इन कानूनों को वापस लेने की मांग कर रही हैं।

पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग

सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग नई पेंशन प्रणाली से असंतुष्ट है। उनकी मांग है कि पुरानी पेंशन योजना दोबारा लागू की जाए, जिसमें रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन मिलती थी। बैंक यूनियनों ने भी इस बंद को समर्थन दिया है। उनकी प्रमुख मांगें हैं सप्ताह में पांच दिन काम, वेतन समझौते में सुधार और सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण पर रोक लगाया जाए।

किसान संगठनों का समर्थन क्यों?

किसान संगठनों ने भी इस बंद में भाग लिया है। उनका कहना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि क्षेत्र पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा वे निम्न मुद्दों पर भी सरकार से असहमति जता रहे हैं। ड्राफ्ट सीड बिल, बिजली संशोधन विधेयक और कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका। किसानों का कहना है कि इन कदमों से छोटे और मध्यम किसानों की स्थिति कमजोर हो सकती है।

मनरेगा को लेकर भी मांग

मजदूर संगठनों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को मजबूत करने की मांग की है। वे चाहते हैं कि योजना का बजट बढ़ाया जाए, अधिक दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाए और ग्रामीण रोजगार सुरक्षा को मजबूत किया जाए। इन सेवाओं पर असर पड़ सकता है? इस बंद का असर कई जगहों पर देखने को मिल सकता है, संभावित रूप से प्रभावित होंगे:

* सरकारी बैंक

* बीमा दफ्तर

* कुछ राज्यों में बस सेवाएं

* औद्योगिक इकाइयां

* सरकारी कार्यालय

* स्थानीय बाजार

यह भारत बंद केवल श्रम कानूनों का विरोध नहीं है, बल्कि यह कर्मचारियों, किसानों और मजदूर संगठनों की संयुक्त नाराजगी का प्रदर्शन है। इसमें रोजगार सुरक्षा, पेंशन, कृषि नीतियां, निजीकरण और व्यापार समझौते जैसे कई बड़े मुद्दे शामिल हैं।Bharat Bandh 


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