नोएडा में उनके निधन की खबर फैलते ही शोक की लहर है और शहर के कला-प्रेमी, शुभचिंतक और परिचित लगातार उनके परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं।दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में शामिल 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ की रूपरेखा तैयार कर उन्होंने भारतीय शिल्प को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई।

Noida News : देश के जाने-माने मूर्ति शिल्पकार राम सुतार का निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। परिजनों के मुताबिक बीती रात नोएडा के सेक्टर-19 स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही सुबह से ही सेक्टर-19 में शोक जताने वालों का तांता लगा रहा और बड़ी संख्या में लोग उनके घर पहुंचते रहे। परिवार ने बताया कि राम सुतार करीब 98 वर्ष के थे। आज उनका अंतिम संस्कार नोएडा के सेक्टर-94 स्थित ‘अंतिम निवास’ में किया जाएगा। प्रशासनिक स्तर पर भी अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार की व्यवस्था को लेकर तैयारियां की जा रही हैं, ताकि श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। राम सुतार का जाना कला-जगत के लिए बड़ी क्षति मानी जा रही है। नोएडा में उनके निधन की खबर फैलते ही शोक की लहर है और शहर के कला-प्रेमी, शुभचिंतक और परिचित लगातार उनके परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं।
राम सुतार की पहचान सिर्फ एक कलाकार के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्र की स्मृतियों को आकार देने वाले शिल्पकार के रूप में थी। दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में शामिल 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ की रूपरेखा तैयार कर उन्होंने भारतीय शिल्प को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। वहीं संसद भवन परिसर में मौजूद उनकी कृतियां आज भी हर आने-जाने वाले को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास से जोड़ती हैं।
राम सुतार को पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे राष्ट्रीय सम्मानों के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा गया। हाल ही में उन्हें महाराष्ट्र भूषण सम्मान मिला था और यह पल इसलिए भी खास रहा क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस स्वयं अस्पताल जाकर उनसे मिले और सम्मान प्रदान किया। उस मौके पर राम सुतार ने “महाराष्ट्र अभिमान गीत” गाकर यह साबित कर दिया कि उम्र भले ही शतायु हो, जज़्बा आज भी उतना ही तरोताजा रहता है।
19 फरवरी 1925 को महाराष्ट्र के धुले ज़िले के गोंदुर गांव में जन्मे राम वनजी सुतार ने बहुत कम उम्र में अपनी कला की राह चुन ली थी। मूर्तिकला की शुरुआती बारीकियाँ उन्होंने श्रीराम कृष्ण जोशी के मार्गदर्शन में सीखीं और फिर मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से औपचारिक प्रशिक्षण लेकर अपनी पहचान को धार दी। साल 1959 में उन्होंने दिल्ली में सूचना एवं दूरसंचार मंत्रालय से करियर की शुरुआत की, लेकिन कुछ ही वर्षों में सरकारी नौकरी की सुरक्षित दुनिया छोड़कर उन्होंने पूर्णकालिक मूर्तिकार बनने का बड़ा फैसला लिया। इसके बाद दिल्ली में अपना स्वतंत्र मूर्तिकला स्टूडियो स्थापित कर उन्होंने वहीँ से कई ऐतिहासिक कृतियों को आकार दिया। उनके योगदान के सम्मान में उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से नवाज़ा गया। निजी जीवन में उन्होंने 1952 में प्रमिला से विवाह किया और उनके पुत्र अनिल सुतार भी आज मूर्तिकला जगत का जाना-पहचाना नाम हैं।
करीब छह दशकों के लंबे सफर में उन्होंने कई ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की प्रतिमाएं गढ़ीं। संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा उनकी चर्चित कृतियों में मानी जाती है, जिसकी प्रतिकृतियां विदेशों तक भेजी गईं। इसके अलावा 1953 में उन्होंने मायो स्वर्ण पदक जीता और 1954 से 1958 तक अजंता-वेरूला गुफाओं में ऐतिहासिक नक्काशी के कार्य से भी जुड़े रहे।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों में आज जिस तरह आधुनिक शहरी डिज़ाइन, सार्वजनिक कला (Public Art), म्यूज़ियम-केंद्रित सोच और बड़े स्मारक प्रोजेक्ट्स पर काम बढ़ रहा है, वहां राम सुतार का काम नई पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा संदर्भ है। नोएडा के कई आर्किटेक्चर स्टूडियो और आर्ट स्पेस में उनकी शैली विशेषकर यथार्थवादी शिल्प, स्केल और डिटेलिंग को अध्ययन के रूप में देखा जाता रहा है। Noida News