उनकी लेखनी में हिन्दी, उर्दू और पंजाबी का मिठास भरा संगम है, और यही नहीं उन्होंने ब्रज, खड़ी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी जैसी बोलियों के रंग भी अपनी रचनाओं में इस तरह घोले कि शब्द जीवंत हो उठे।

Gulzar : हिन्दी सिनेमा के गीतों को अगर किसी एक शख्स ने धुन से उठाकर अहसास तक पहुँचाया है, तो वह नाम ग़ुलज़ार का है जिनका वास्तविक नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा (जन्म: 18 अगस्त 1934) है। वे सिर्फ़ गीतकार नहीं, बल्कि कवि, शायर, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक और नाटककार के तौर पर भी अपनी अलग, बेबाक पहचान रखते हैं। उनकी लेखनी में हिन्दी, उर्दू और पंजाबी का मिठास भरा संगम है, और यही नहीं उन्होंने ब्रज, खड़ी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी जैसी बोलियों के रंग भी अपनी रचनाओं में इस तरह घोले कि शब्द जीवंत हो उठे। सम्मान उनकी कला के पीछे-पीछे चलते रहे 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्म भूषण और फिर वैश्विक मंच पर 2009 में ‘Slumdog Millionaire’ के गीत ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर (Best Original Song) और ग्रैमी जिसने यह साबित कर दिया कि गुलज़ार की कलम सरहदों से बड़ी है।
गुलज़ार का जन्म झेलम ज़िले (तत्कालीन पंजाब) के दीना गाँव में हुआ था यह इलाका आज पाकिस्तान में आता है। उनका बचपन आसान नहीं रहा। वे अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान थे और बचपन में ही उनकी माँ का साया उठ गया। परिवार बड़ा था कुल नौ भाई-बहन, जिनमें गुलज़ार चौथे नंबर पर थे।
भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद परिवार अमृतसर आकर बस गया। आगे चलकर गुलज़ार मुंबई पहुँचे, जहाँ जीवन ने उन्हें शुरुआती दौर में मेहनत का कड़ा पाठ पढ़ाया। वे वर्ली के एक गैराज में मैकेनिक के तौर पर काम करने लगे खासतौर पर पेंट के रंग मिलाने जैसे कामों में। लेकिन काम के साथ-साथ उनके भीतर का पाठक जाग रहा था। खाली समय में किताबें पढ़ते-पढ़ते, लिखने का आकर्षण तेज़ होता गयाऔर यही आकर्षण आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
1 - शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।

2 - कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है,
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है।

3 - ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में,
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में।

4 - जब भी ये दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है।

5 - दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई,
जैसे एहसाँ उतारता है कोई।
