उनकी रचनाओं में दौर की धड़कन, आम आदमी की पीड़ा और उम्मीद की रोशनी एक साथ दिखाई देती है यही वजह है कि उन्हें उर्दू साहित्य की सबसे असरदार आवाज़ों में गिना जाता है।

Majrooh Sultanpuri : मजरूह सुल्तानपुरी 20वीं सदी के उन चुनिंदा उर्दू शायरों में शुमार रहे, जिनकी शायरी ने साहित्य और समाज दोनों को नई संवेदना दी। 1 अक्टूबर 1919 को जन्मे और 24 मई 2000 को दुनिया से रुख़्सत हुए मजरूह न सिर्फ़ प्रगतिशील आंदोलन के मजबूत स्वर थे, बल्कि हिंदी सिनेमा में बतौर गीतकार भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में दौर की धड़कन, आम आदमी की पीड़ा और उम्मीद की रोशनी एक साथ दिखाई देती है यही वजह है कि उन्हें उर्दू साहित्य की सबसे असरदार आवाज़ों में गिना जाता है।
मजरूह सुल्तानपुरी के साहित्यिक योगदान को केंद्र में रखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के सहयोग से सुल्तानपुर के गनपत सहाय कॉलेज में “ग़ज़ल के आइने में मजरूह सुल्तानपुरी” विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया था । देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों से आए शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने इस आयोजन में भाग लिया और मजरूह के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मजरूह ने उर्दू शायरी को नई ऊँचाई दी और उसे जन-भावनाओं की भाषा बनाया। समिनार की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. सीमा रिज़वी ने की, जबकि आयोजन का संयोजन गनपत सहाय कॉलेज की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. जेबा महमूद ने किया था । इस अवसर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. अली अहमद फातिमी ने कहा कि मजरूह का जन्म सुल्तानपुर में हुआ था और उनकी शायरी में इस मिट्टी की झलक साफ दिखाई देती है। उन्होंने मजरूह को तरक्कीपसंद शायरी की ऐसी आवाज़ बताया, जिसने उर्दू को नया मुकाम दिलाने में अहम भूमिका निभाई। मंच से उनकी चर्चित पंक्तियाँ “मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया”का उल्लेख भी हुआ, जिसे मजरूह की लोकप्रियता और वैचारिक असर का प्रतीक माना गया।
1 - मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

2 - कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा,
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा।

3 - बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए,
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते। 
4 - अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम,
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम।
5 - तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए,
निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए। 