पश्चिम के साथ पूरब से भी उठी उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग
पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर प्रदेश में अनेक संगठन उत्तर प्रदेश के बंटवारे को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।

UP News : उत्तर प्रदेश का बंटवारा करने की मांग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश से भी उठी है। सब जानते हैं कि उत्तर प्रदेश आबादी की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है। उत्तर प्रदेश को सम्पूर्ण विकास को आधार बनाकर लम्बे अर्से से उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग चलती रहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर प्रदेश में अनेक संगठन उत्तर प्रदेश के बंटवारे को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।
पश्चिमी निर्माण मोर्चा का संघर्ष बढ़ रहा है आगे
उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा का संघर्ष लगातार आगे बढ़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा के महासचिव कर्नल सुधीर सिंह का दावा है कि देर जरूर लग रही है किन्तु एक ना एक दिन उत्तर प्रदेश का बंटवारा अवश्य होगा। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश का सही अर्थों में तभी विकास होगा जब उत्तर प्रदेश को कम से कम तीन भागों में बांट दिया जाएगा। कर्नल सुधीर ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में शुरू हुए उत्तर प्रदेश के बंटवारे के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा है कि हम सब लोग एक साथ मिलकर उत्तर प्रदेश का बंटवारा कराने का काम करेंगे।
अमेठी से उठी उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग
उत्तर प्रदेश का अमेठी क्षेत्र प्रदेश का प्रसिद्ध क्षेत्र है। हाल ही में अमेठी से उत्तर प्रदेश का बंटवारा करके पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग खुलकर सामने आई है। एक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व प्राविधिक शिक्षा मंत्री डॉ. अमीता सिंह ने साफ कहा कि पूर्वांचल का विकास तभी संभव है, जब उसे अलग राज्य का दर्जा मिले। इस कार्यक्रम में हजारों लोग मौजूद रहे। पूर्वांचल को लेकर यह तर्क दिया जाता है कि यहां विकास की रफ्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश की तुलना में धीमी रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार के मामले में यह क्षेत्र आज भी पिछड़ा माना जाता है। समर्थकों का कहना है कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बने, तो प्रशासन ज्यादा फोकस के साथ काम कर पाएगा, योजनाएं जमीन पर तेजी से उतरेंगी और स्थानीय समस्याओं का समाधान बेहतर तरीके से होगा।
आसान नहीं है उत्तर प्रदेश का बंटवारा
किसी भी राज्य को बांटना आसान नहीं होता है। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें कई स्तरों पर सहमति और औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। भारत के संविधान में इसके लिए साफ व्यवस्था दी गई है, ताकि फैसले भावनाओं में नहीं, बल्कि कानून के दायरे में हों। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर किसी राज्य का क्षेत्र घटा-बढ़ा सके, दो या दो से अधिक राज्यों को मिला सके या नया राज्य बना सके. यानी अंतिम फैसला संसद के हाथ में होता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि राज्य सरकार या जनता की भूमिका नहीं होती है। जब किसी राज्य को बांटने का प्रस्ताव आता है, तो राष्ट्रपति उस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास राय के लिए भेजते हैं। विधानसभा इस पर चर्चा करती है और अपनी राय राष्ट्रपति को देती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि विधानसभा की राय बाध्यकारी नहीं होती। यानी अगर विधानसभा सहमत न भी हो, तब भी संसद कानून बना सकती है, लेकिन व्यवहारिक रूप से विधानसभा की राय को काफी महत्व दिया जाता है। राज्य बंटवारे का सीधा असर वहां रहने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए इस प्रक्रिया में जनता, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों से भी विचार-विमर्श किया जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अलग राज्य की मांग सिर्फ राजनीतिक है या इसके पीछे वास्तविक जरूरत और जनसमर्थन भी है।
संसद में कैसे पास होता है प्रदेश के बंटवारे का कानून
राज्य बंटवारे से जुड़ा विधेयक संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया जाता है। इसे पारित करने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होती है। यानी संविधान संशोधन जैसा भारी बहुमत यहां जरूरी नहीं होता है। यह बात राज्य गठन की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत सरल बनाती है। जब संसद से कानून पास हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद अधिसूचना जारी होती है और नया राज्य कानूनी रूप से अस्तित्व में आ जाता है। इसी के साथ प्रशासनिक ढांचा, सरकार और अन्य व्यवस्थाएं लागू की जाती हैं। भारत में इससे पहले भी कई नए राज्य बने हैं। साल 2000 में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से झारखंड का गठन हुआ था। 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना। इन उदाहरणों से साफ है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो, तो नया राज्य बनना संभव है। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश का बंटवारा करने की मांग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश से भी उठी है। सब जानते हैं कि उत्तर प्रदेश आबादी की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है। उत्तर प्रदेश को सम्पूर्ण विकास को आधार बनाकर लम्बे अर्से से उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग चलती रहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर प्रदेश में अनेक संगठन उत्तर प्रदेश के बंटवारे को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।
पश्चिमी निर्माण मोर्चा का संघर्ष बढ़ रहा है आगे
उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा का संघर्ष लगातार आगे बढ़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्माण मोर्चा के महासचिव कर्नल सुधीर सिंह का दावा है कि देर जरूर लग रही है किन्तु एक ना एक दिन उत्तर प्रदेश का बंटवारा अवश्य होगा। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश का सही अर्थों में तभी विकास होगा जब उत्तर प्रदेश को कम से कम तीन भागों में बांट दिया जाएगा। कर्नल सुधीर ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में शुरू हुए उत्तर प्रदेश के बंटवारे के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा है कि हम सब लोग एक साथ मिलकर उत्तर प्रदेश का बंटवारा कराने का काम करेंगे।
अमेठी से उठी उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग
उत्तर प्रदेश का अमेठी क्षेत्र प्रदेश का प्रसिद्ध क्षेत्र है। हाल ही में अमेठी से उत्तर प्रदेश का बंटवारा करके पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग खुलकर सामने आई है। एक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व प्राविधिक शिक्षा मंत्री डॉ. अमीता सिंह ने साफ कहा कि पूर्वांचल का विकास तभी संभव है, जब उसे अलग राज्य का दर्जा मिले। इस कार्यक्रम में हजारों लोग मौजूद रहे। पूर्वांचल को लेकर यह तर्क दिया जाता है कि यहां विकास की रफ्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश की तुलना में धीमी रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार के मामले में यह क्षेत्र आज भी पिछड़ा माना जाता है। समर्थकों का कहना है कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बने, तो प्रशासन ज्यादा फोकस के साथ काम कर पाएगा, योजनाएं जमीन पर तेजी से उतरेंगी और स्थानीय समस्याओं का समाधान बेहतर तरीके से होगा।
आसान नहीं है उत्तर प्रदेश का बंटवारा
किसी भी राज्य को बांटना आसान नहीं होता है। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें कई स्तरों पर सहमति और औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। भारत के संविधान में इसके लिए साफ व्यवस्था दी गई है, ताकि फैसले भावनाओं में नहीं, बल्कि कानून के दायरे में हों। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर किसी राज्य का क्षेत्र घटा-बढ़ा सके, दो या दो से अधिक राज्यों को मिला सके या नया राज्य बना सके. यानी अंतिम फैसला संसद के हाथ में होता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि राज्य सरकार या जनता की भूमिका नहीं होती है। जब किसी राज्य को बांटने का प्रस्ताव आता है, तो राष्ट्रपति उस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास राय के लिए भेजते हैं। विधानसभा इस पर चर्चा करती है और अपनी राय राष्ट्रपति को देती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि विधानसभा की राय बाध्यकारी नहीं होती। यानी अगर विधानसभा सहमत न भी हो, तब भी संसद कानून बना सकती है, लेकिन व्यवहारिक रूप से विधानसभा की राय को काफी महत्व दिया जाता है। राज्य बंटवारे का सीधा असर वहां रहने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए इस प्रक्रिया में जनता, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों से भी विचार-विमर्श किया जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अलग राज्य की मांग सिर्फ राजनीतिक है या इसके पीछे वास्तविक जरूरत और जनसमर्थन भी है।
संसद में कैसे पास होता है प्रदेश के बंटवारे का कानून
राज्य बंटवारे से जुड़ा विधेयक संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया जाता है। इसे पारित करने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होती है। यानी संविधान संशोधन जैसा भारी बहुमत यहां जरूरी नहीं होता है। यह बात राज्य गठन की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत सरल बनाती है। जब संसद से कानून पास हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद अधिसूचना जारी होती है और नया राज्य कानूनी रूप से अस्तित्व में आ जाता है। इसी के साथ प्रशासनिक ढांचा, सरकार और अन्य व्यवस्थाएं लागू की जाती हैं। भारत में इससे पहले भी कई नए राज्य बने हैं। साल 2000 में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से झारखंड का गठन हुआ था। 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना बना। इन उदाहरणों से साफ है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो, तो नया राज्य बनना संभव है। UP News












