क्यूँ जवानी याद आ गई… मजाज़ के 5 शेर, जो आपको रोक लेंगे
शुरुआती दौर में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे, मगर वक्त के साथ उनकी शायरी ने अपनी जगह खुद बनाई और देखते ही देखते मजाज़ का नाम उर्दू अदब के यादगार हस्ताक्षरों में शुमार हो गया।

Asrarul Haq Majaz : असरारुल हक़ “मजाज़” (1911–1955) उर्दू की प्रगतिशील धारा से जुड़े उन रोमानी शायरों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान कम लिखकर भी गहरी छाप छोड़ने वालों में होती है। लखनऊ से उनका भावनात्मक और साहित्यिक रिश्ता इतना मजबूत रहा कि वे “मजाज़ लखनवी” के नाम से भी पहचाने गए। शुरुआती दौर में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे, मगर वक्त के साथ उनकी शायरी ने अपनी जगह खुद बनाई और देखते ही देखते मजाज़ का नाम उर्दू अदब के यादगार हस्ताक्षरों में शुमार हो गया।
जीवन-परिचय
मजाज़ का असली नाम असरारुल हक़ था। आगरा में रहते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए “शहीद” उपनाम अपनाया, लेकिन बाद में उन्होंने अपने नाम के साथ वह तख़ल्लुस जोड़ा, जिसने उन्हें अदब की दुनिया में स्थायी पहचान दिलाई—“मजाज़”। उनका जन्म 19 अक्टूबर 1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली में हुआ माना जाता है। हालांकि, कुछ साहित्यिक स्रोतों में उनकी जन्म-तिथि को लेकर मतभेद भी मिलता है फ़िराक़ गोरखपुरी के अनुसार यह 2 फरवरी 1909 बताई जाती है, और प्रकाश पंडित ने भी इसी तिथि को स्वीकार किया है।
असरारुल हक़ “मजाज़” टॉप 5 शेर
1 - हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया,
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया।

2 - फिर मिरी आँख हो गई नमनाक,
फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है।

3 - क्यूँ जवानी की मुझे याद आई,
मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था। 
4 - इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम,
हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम। 
5 - हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ,
ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था। 
Asrarul Haq Majaz : असरारुल हक़ “मजाज़” (1911–1955) उर्दू की प्रगतिशील धारा से जुड़े उन रोमानी शायरों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान कम लिखकर भी गहरी छाप छोड़ने वालों में होती है। लखनऊ से उनका भावनात्मक और साहित्यिक रिश्ता इतना मजबूत रहा कि वे “मजाज़ लखनवी” के नाम से भी पहचाने गए। शुरुआती दौर में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे, मगर वक्त के साथ उनकी शायरी ने अपनी जगह खुद बनाई और देखते ही देखते मजाज़ का नाम उर्दू अदब के यादगार हस्ताक्षरों में शुमार हो गया।
जीवन-परिचय
मजाज़ का असली नाम असरारुल हक़ था। आगरा में रहते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए “शहीद” उपनाम अपनाया, लेकिन बाद में उन्होंने अपने नाम के साथ वह तख़ल्लुस जोड़ा, जिसने उन्हें अदब की दुनिया में स्थायी पहचान दिलाई—“मजाज़”। उनका जन्म 19 अक्टूबर 1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली में हुआ माना जाता है। हालांकि, कुछ साहित्यिक स्रोतों में उनकी जन्म-तिथि को लेकर मतभेद भी मिलता है फ़िराक़ गोरखपुरी के अनुसार यह 2 फरवरी 1909 बताई जाती है, और प्रकाश पंडित ने भी इसी तिथि को स्वीकार किया है।
असरारुल हक़ “मजाज़” टॉप 5 शेर
1 - हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया,
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया।

2 - फिर मिरी आँख हो गई नमनाक,
फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है।

3 - क्यूँ जवानी की मुझे याद आई,
मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था। 
4 - इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम,
हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम। 
5 - हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ,
ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था। 












