Monday, 24 June 2024

जातीय विवाद : 32 सीटों पर पड़ेगा भारी

कर्मवीर  नागर  दादरी। दादरी के गुर्जर कॉलेज में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण पर उत्पन्न हुए विवाद…

जातीय विवाद : 32 सीटों पर पड़ेगा भारी

कर्मवीर  नागर 

दादरी। दादरी के गुर्जर कॉलेज में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण पर उत्पन्न हुए विवाद से किसको राजनीतिक लाभ हुआ और किस को राजनीतिक नुकसान? यह तो चिंतन और मंथन का अलग विषय है। फिलहाल चुनावी माहौल में इस विवाद के पीछे गेम का खिलाड़ी कौन है? और उसका मकसद क्या है? यह भी गूढ़ चिन्तन का विषय है।

अगर गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण को लेकर उपजे विवाद पर सामान्यत: गौर करें तो इस विवाद से गुर्जर और राजपूत दोनों ही जातियों को भारी नुकसान हुआ नजर आता है। जहां तक गुर्जर समाज की बात करें तो गुर्जर समाज के लोगों की भडकी भावनाओं और कथनों  से प्रतीत होता है कि यह सत्ता के बल पर गुर्जर वंश का इतिहास मिटाने का प्रयास है। अन्यथा तो अब से पहले गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के नाम से कई मूर्तियों और राजमार्गों का अनावरण हुआ है जिन पर किसी जाति ने कभी कोई विवाद या बखेड़ा नहीं किया। गुर्जर शब्द हटाकर मूर्ति अनावरण को जो संगठन अपनी भारी विजय मानकर जश्न मना रहे हैं मेरा मानना है कि उन संगठनों ने एक राजनीतिक दल का भारी नुकसान कर दिया है। क्योंकि गौतमबुद्ध नगर में ही नही बल्कि उत्तर प्रदेश के लगभग 32 जिलों में विधानसभा सीटों के नतीजे प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले समाज की भावनाओं की अनदेखी कोई नया गुल खिला सकती है।
इस घटनाक्रम से यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि एक तरफ आप संप्रदाय विशेष से दूरी बनाकर रखते हैं दूसरी तरफ क्षत्रिय श्रेणी में गिनी जाने वाली जातियों को साथ लगाने के लिए दिल बड़ा करना तो दूर उन्हेें तिरस्कृत करने पर उतारू हैं तो ऐसे समाज के लोग आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर कैसे चल पाएंगे।

जहां तक उत्तर प्रदेश में इस घटनाक्रम से नुकसान की बात है तो खासतौर पर राजपूत संगठनों को उत्तर प्रदेश सरकार के लोक प्रिय मुख्यमंत्री माननीय श्री योगी आदित्यनाथ के लिए धर्म संकट पैदा करने से बचना चाहिए था। इसलिए ऐसे में इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि जब उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल शुरू हो चुका है ऐसे वक्त गुर्जर समाज की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नुकसान देह साबित हो सकती है।

गुर्जर समाज के लोगों में खासा नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि राजपूत संगठनों द्वारा किए गए विरोध को हवा देने में सत्ता सीन बड़े नेताओं की अहम भूमिका रही है। इसी दबाव में सत्ता के भूखे गुर्जर समाज के लोगों ने सत्ता सुख के लालच में अपने वंशजों के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। क्योंकि भले ही राजपूत संगठन सम्राट मिहिर भोज के साथ गुर्जर शब्द लगाने का विरोध कर रहे थे लेकिन मौके पर तो गुर्जर समाज के नेतृत्व ने ही गुर्जर शब्द को मिटाने का काम किया है।
इस क्षेत्र के गुर्जर समाज का कहना है कि सम्राट मिहिर भोज के नाम से दादरी स्थित कालिज में सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का गुर्जर शब्द बगैर अनावरण किए जाने का दिन गुर्जर इतिहास में सदैव के लिए काले अक्षरों में दर्ज हो गया है। गुर्जर शब्द हटाकर सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का अनावरण महाभारत काल के द्रोपदी चीर हरण से कम नहीं है। क्योंकि गुर्जर समाज के तमाम दिग्गजों के सामने सम्राट मिहिर भोज के शिलालेख से ‘गुर्जर’ शब्द रुपी चीर हरण होते  देखा है।

असल सच्चाई तो यह भी है कि इतिहास के साथ खिलवाड़ की यह नौबत कतई नहीं आती अगर विद्या सभा का नेतृत्व स्व विद्याराम जी जैसे सक्षम और मजबूत हाथों में होता। विद्या सभा के कमजोर नेतृत्व की वजह से प्रोग्राम ऐसे हाथों में चला गया जिन्होंने समाज की किरकिरी और फजीहत कराने में ही कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इसलिए विद्या सभा के नेतृत्व को नैतिकता के आधार पर पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए।

भले ही एक सामाजिक संगठन इस घटना को किसी भी रूप में देख रहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इस घटना से उक्त समाज के संगठनों ने आपसी भाईचारे को नुकसान पहुंचा कर एक राजनीतिक दल को भारी नुकसान पहुंचा दिया है। अगर माननीय मुख्य मंत्री की उपस्थिति में हुए गुर्जर समाज के इस भारी नुकसान की भरपाई दल विशेष द्वारा बड़ा मरहम लगाकर नहीं की गई तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगभग 32 सीटों में बड़ा राजनीतिक नुक़सान होना संभव है।

गुर्जरों का चीरहरण

इस क्षेत्र के गुर्जर समाज का कहना है कि सम्राट मिहिर भोज के नाम से दादरी स्थित कालिज में सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का गुर्जर शब्द बगैर अनावरण किए जाने का दिन गुर्जर इतिहास में सदैव के लिए काले अक्षरों में दर्ज हो गया है। गुर्जर शब्द हटाकर सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का अनावरण महाभारत काल के द्रोपदी चीर हरण से कम नहीं है। क्योंकि गुर्जर समाज के तमाम दिग्गजों के सामने सम्राट मिहिर भोज के शिलालेख से ‘गुर्जर’ शब्द रुपी चीर हरण होते  देखा है।

इस्तीफा दें

असल सच्चाई तो यह भी है कि इतिहास के साथ खिलवाड़ की यह नौबत कतई नहीं आती अगर विद्या सभा का नेतृत्व स्व विद्याराम जी जैसे सक्षम और मजबूत हाथों में होता। विद्या सभा के कमजोर नेतृत्व की वजह से प्रोग्राम ऐसे हाथों में चला गया जिन्होंने समाज की किरकिरी और फजीहत कराने में ही कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इसलिए विद्या सभा के नेतृत्व को नैतिकता के आधार पर पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए।

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