13 जुलाई पर सियासी टकराव : मजार-ए-शुहदा की घेराबंदी और नजरबंदी, कश्मीर में क्या छुपाना चाहती है सरकार?
भारत
RP Raghuvanshi
01 Dec 2025 04:06 AM
Kashmir Politics : 13 जुलाई कश्मीर की राजनीति में एक ऐसा दिन जिसे शहादत और आत्म-सम्मान के प्रतीक के तौर पर याद किया जाता है। आज फिर से सत्ता और सियासत के टकराव की भेंट चढ़ गया। प्रशासन ने श्रीनगर स्थित मजार-ए-शुहदा पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद घाटी में राजनीतिक पारा उबल पड़ा है।
कब्रों की घेराबंदी, नेताओं की नजरबंदी
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व में हर साल मनाए जाने वाले इस शहीद दिवस पर इस बार कई प्रमुख नेताओं को नजरबंद कर दिया गया, और जो बाहर निकलने की कोशिश में थे, उन्हें हिरासत में ले लिया गया। इनमें पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता शामिल हैं। उमर अब्दुल्ला ने इस घटना को 'जलियांवाला बाग' से जोड़ते हुए सवाल उठाया है कि आखिर सरकार को अपने ही नागरिकों से इतना डर क्यों है?
महबूबा मुफ्ती ने केंद्र पर साधा निशाना
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट करते हुए सरकार की कार्रवाई को लोकतंत्र का गला घोंटना करार दिया। उन्होंने कहा, जब आप हमारे शहीदों को अपना मान लेंगे, जैसे हमने महात्मा गांधी और भगत सिंह को माना, तभी दिलों की दूरी खत्म होगी। महबूबा का आरोप है कि सरकार ने सिर्फ कार्यक्रम पर रोक ही नहीं लगाई, बल्कि शहीदों की कब्रों को भी सील कर दिया, ताकि जनता श्रद्धांजलि तक न दे सके। उन्होंने बताया कि पीडीपी नेताओं को चुपचाप घरों से निकलते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें खुर्शीद आलम, जोहैब मीर, सारा नईमा और तबस्सुम जैसे चेहरे शामिल हैं।
उमर अब्दुल्ला की तीखी प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रशासन पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाते हुए कहा, घरों को बाहर से बंद किया जा रहा है, पुलों को सील किया गया है, सुरक्षा बलों को जेलर बना दिया गया है। क्या सरकार को सिर्फ इसलिए डर है कि लोग अपने शहीदों को याद न कर लें? उमर ने कहा कि 1931 के शहीद वे लोग थे जिन्होंने कश्मीरियों को आवाज देने के लिए जान कुर्बान की, और आज की सरकार उन्हें याद करने तक की छूट देने को तैयार नहीं।
जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई अब महज एक तारीख नहीं रही, बल्कि यह राजनीतिक असहमति और स्मृति की लड़ाई बन चुकी है। जहां एक ओर सरकार 'कानून-व्यवस्था' का हवाला दे रही है, वहीं दूसरी ओर विरोधी दल इसे कश्मीरियों की पहचान और इतिहास को मिटाने की कोशिश करार दे रहे हैं। सवाल यही है कब्रों की घेराबंदी से क्या वास्तव में दिलों की दूरी खत्म होगी?