भारत–ईरान रिश्तों का इतिहास: मुगल काल से जुड़ा खास नाता
ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार उग्र होते जा रहे हैं। राजधानी तेहरान में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। कई सरकारी दफ्तरों में आगजनी, तोड़फोड़ और कब्जे की खबरें सामने आई हैं।

बता दें कि प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पें हुई हैं। हालात को काबू में रखने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं और भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। इसी बीच जब ईरान एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है, तो यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि भारत के इतिहास में ईरान की क्या भूमिका रही है। खासकर मुगल काल में ईरान सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि शाही जरूरतों और संस्कृति का अहम केंद्र था।
मुगल और ईरान के रिश्ते क्यों थे खास?
बता दें कि मुगल साम्राज्य और ईरान के संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी थे। बाबर मध्य एशिया की परंपराओं से आए थे, जहां फारसी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। सत्ता संघर्ष के दौरान हुमायूं को ईरान के शाह तहमास्प से सैन्य और राजनीतिक मदद मिली थी। इसी कारण मुगल दरबार में फारसी भाषा, पहनावा, कला और प्रशासनिक प्रणाली को विशेष स्थान मिला। धीरे-धीरे ईरान मुगल साम्राज्य की शाही जरूरतों का एक प्रमुख स्रोत बन गया।
ईरान की शराब और अफीम: शाही शौक का प्रतीक
ईरान की शराब उस दौर में अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थी। मुगल बादशाह जहांगीर को खास तौर पर फारसी शराब और अफीम का शौकीन माना जाता है। दरबार में इन चीजों को केवल नशे की वस्तु नहीं, बल्कि शाही रुतबे और विदेशी संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता था। लंबी दूरी, सुरक्षा व्यवस्था और विशेष पैकिंग के कारण यह शराब बेहद महंगी पड़ती थी, जिसे केवल शाही खजाना ही वहन कर सकता था।
अफीम: नशा नहीं, दवा भी
बाबर से लेकर जहांगीर तक कई मुगल शासक अफीम का सेवन करते थे। उस समय इसे सीमित मात्रा में औषधि और आराम देने वाले पदार्थ के रूप में भी देखा जाता था। उच्च गुणवत्ता वाली अफीम ईरान और मध्य एशिया से मंगवाई जाती थी, जिसे ऊंटों के कारवां के जरिए भारत लाया जाता था। महीनों की यात्रा, सुरक्षा खर्च और रास्ते के कर इसे एक महंगा आयात बनाते थे।
फारसी रेशम और कालीन: मुगल शान की पहचान
ईरान के रेशम और कालीन मुगल दरबार की शान माने जाते थे। फारसी कालीन अपनी बारीक कारीगरी, गहरे रंगों और जटिल डिज़ाइनों के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। इन्हें शाही महलों, दरबारों और विशिष्ट अतिथियों के स्वागत में इस्तेमाल किया जाता था। रेशमी वस्त्र शाही पोशाकों और राजनयिक उपहारों के लिए मंगवाए जाते थे, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक थे।
ईरान से कलाकार, कवि और विद्वान भी आते थे
मुगल और ईरान का संबंध केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं था। फारसी कवि, चित्रकार, संगीतकार, प्रशासक और चिकित्सक भी मुगल दरबार का हिस्सा बने। अकबर के दरबार में हकीम हमाम जैसे ईरानी चिकित्सक थे, जो यूनानी चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ थे। मुगल मिनिएचर पेंटिंग, शायरी और इतिहास लेखन पर फारसी प्रभाव साफ नजर आता है।
फल, मेवे और घोड़े भी थे अहम आयात
मुगल बादशाह ईरान और आसपास के इलाकों से अंगूर, सेब, बादाम, पिस्ता जैसे फल और मेवे मंगवाते थे, जो उस समय भारत में दुर्लभ माने जाते थे। इसके अलावा ऊंची नस्ल के घोड़े ईरान और मध्य एशिया से आयात किए जाते थे, जो सेना और शाही सवारी दोनों के लिए जरूरी थे। घोड़ों का आयात रणनीतिक महत्व और शाही प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ था।
कितना आता था खर्च?
हालांकि उस दौर के सटीक आर्थिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि इन वस्तुओं की दुर्लभता, लंबी दूरी की यात्रा, व्यापारियों की फीस, सुरक्षा खर्च और रास्ते के करों के कारण यह आयात बेहद महंगा होता था। यह सारा खर्च शाही खजाने से किया जाता था, जिसकी आय मुख्य रूप से कृषि कर और व्यापार से होती थी।
बता दें कि प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पें हुई हैं। हालात को काबू में रखने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं और भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। इसी बीच जब ईरान एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है, तो यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि भारत के इतिहास में ईरान की क्या भूमिका रही है। खासकर मुगल काल में ईरान सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि शाही जरूरतों और संस्कृति का अहम केंद्र था।
मुगल और ईरान के रिश्ते क्यों थे खास?
बता दें कि मुगल साम्राज्य और ईरान के संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी थे। बाबर मध्य एशिया की परंपराओं से आए थे, जहां फारसी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। सत्ता संघर्ष के दौरान हुमायूं को ईरान के शाह तहमास्प से सैन्य और राजनीतिक मदद मिली थी। इसी कारण मुगल दरबार में फारसी भाषा, पहनावा, कला और प्रशासनिक प्रणाली को विशेष स्थान मिला। धीरे-धीरे ईरान मुगल साम्राज्य की शाही जरूरतों का एक प्रमुख स्रोत बन गया।
ईरान की शराब और अफीम: शाही शौक का प्रतीक
ईरान की शराब उस दौर में अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थी। मुगल बादशाह जहांगीर को खास तौर पर फारसी शराब और अफीम का शौकीन माना जाता है। दरबार में इन चीजों को केवल नशे की वस्तु नहीं, बल्कि शाही रुतबे और विदेशी संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता था। लंबी दूरी, सुरक्षा व्यवस्था और विशेष पैकिंग के कारण यह शराब बेहद महंगी पड़ती थी, जिसे केवल शाही खजाना ही वहन कर सकता था।
अफीम: नशा नहीं, दवा भी
बाबर से लेकर जहांगीर तक कई मुगल शासक अफीम का सेवन करते थे। उस समय इसे सीमित मात्रा में औषधि और आराम देने वाले पदार्थ के रूप में भी देखा जाता था। उच्च गुणवत्ता वाली अफीम ईरान और मध्य एशिया से मंगवाई जाती थी, जिसे ऊंटों के कारवां के जरिए भारत लाया जाता था। महीनों की यात्रा, सुरक्षा खर्च और रास्ते के कर इसे एक महंगा आयात बनाते थे।
फारसी रेशम और कालीन: मुगल शान की पहचान
ईरान के रेशम और कालीन मुगल दरबार की शान माने जाते थे। फारसी कालीन अपनी बारीक कारीगरी, गहरे रंगों और जटिल डिज़ाइनों के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। इन्हें शाही महलों, दरबारों और विशिष्ट अतिथियों के स्वागत में इस्तेमाल किया जाता था। रेशमी वस्त्र शाही पोशाकों और राजनयिक उपहारों के लिए मंगवाए जाते थे, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक थे।
ईरान से कलाकार, कवि और विद्वान भी आते थे
मुगल और ईरान का संबंध केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं था। फारसी कवि, चित्रकार, संगीतकार, प्रशासक और चिकित्सक भी मुगल दरबार का हिस्सा बने। अकबर के दरबार में हकीम हमाम जैसे ईरानी चिकित्सक थे, जो यूनानी चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ थे। मुगल मिनिएचर पेंटिंग, शायरी और इतिहास लेखन पर फारसी प्रभाव साफ नजर आता है।
फल, मेवे और घोड़े भी थे अहम आयात
मुगल बादशाह ईरान और आसपास के इलाकों से अंगूर, सेब, बादाम, पिस्ता जैसे फल और मेवे मंगवाते थे, जो उस समय भारत में दुर्लभ माने जाते थे। इसके अलावा ऊंची नस्ल के घोड़े ईरान और मध्य एशिया से आयात किए जाते थे, जो सेना और शाही सवारी दोनों के लिए जरूरी थे। घोड़ों का आयात रणनीतिक महत्व और शाही प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ था।
कितना आता था खर्च?
हालांकि उस दौर के सटीक आर्थिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि इन वस्तुओं की दुर्लभता, लंबी दूरी की यात्रा, व्यापारियों की फीस, सुरक्षा खर्च और रास्ते के करों के कारण यह आयात बेहद महंगा होता था। यह सारा खर्च शाही खजाने से किया जाता था, जिसकी आय मुख्य रूप से कृषि कर और व्यापार से होती थी।












