कौन थे दुल्ला भट्टी? जिनके बगैर आज भी अधूरी मानी जाती है लोहड़ी
Dulla Bhatti: Lohri 2026 के मौके पर हम आपके लिए एक ऐसे नायक की जानकारी लेकर आए हैं जिन्हें पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है। मुगल शासन के खिलाफ उनके संघर्ष, नारी सम्मान और लोककथाओं से जुड़ा इतिहास यहां विस्तार से पढ़ें।

जब भी लोहड़ी का पर्व आता है आग के चारों ओर घूमते हुए एक आवाज जरूर गूंजती है-“सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो? दुल्ला भट्टी वाला हो…” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस गीत में लिया जाने वाला दुल्ला भट्टी कौन था? आखिर क्यों उनके नाम के बगैर लोहड़ी अधूरी मानी जाती है? Lohri 2026 के मौके पर यह जानना बेहद जरूरी है कि दुल्ला भट्टी सिर्फ एक लोककथा नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ एक वास्तविक वीर था जिसे आज भी पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है। चलिए जानते हैं कौन थे दुल्ला भट्टी?
कौन थे दुल्ला भट्टी? (Who was Dulla Bhatti?)
दुल्ला भट्टी का वास्तविक नाम राय अब्दुल्ला भट्टी था। उनका जन्म 1547 ईस्वी में पंजाब के सांडल बार क्षेत्र में हुआ जो आज पाकिस्तान के फैसलाबाद इलाके में आता है। वे भट्टी राजपूत वंश से संबंध रखते थे, जो वीरता और स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध था। दुल्ला भट्टी का परिवार पहले से ही मुगल सत्ता के निशाने पर था क्योंकि उनके पिता और दादा ने किसानों पर लगाए जा रहे भारी करों और जमीनी शोषण का विरोध किया था। इसी अन्याय ने दुल्ला भट्टी को विद्रोह की राह पर खड़ा कर दिया।
मुगल शासन के खिलाफ खुला विद्रोह
मुगल काल में पंजाब के किसानों पर अत्यधिक कर लगाए जाते थे और जमींदारों के जरिये गरीबों का शोषण किया जाता था। दुल्ला भट्टी ने इस व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। वे जंगलों और ग्रामीण इलाकों से मुगल अधिकारियों पर हमले करते, कर वसूली रोकते और जो धन लूटा जाता था उसे गरीबों में बांट देते थे। यही कारण है कि आम जनता उन्हें मसीहा मानती थी जबकि मुगल दरबार उन्हें अपराधी और विद्रोही कहता था। यही दो अलग-अलग नजरिए दुल्ला भट्टी को एक ऐतिहासिक नायक बनाते हैं।
नारी सम्मान के रक्षक दुल्ला भट्टी
दुल्ला भट्टी का सबसे मानवीय पक्ष स्त्रियों की रक्षा से जुड़ा है। लोककथाओं के अनुसार, उस समय कुछ मुगल अधिकारी गरीब परिवारों की लड़कियों को जबरन उठा लिया करते थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी कई लड़कियों को मुक्त कराया और उनका सम्मानपूर्वक विवाह करवाया। सबसे प्रसिद्ध कथा सुंदरी और मुंदरी की है दो अनाथ बहनें जिनकी शादी दुल्ला भट्टी ने स्वयं पिता बनकर करवाई। उन्होंने जंगल में अलाव जलाकर विवाह संपन्न कराया और गुड़ व तिल देकर पिता का फर्ज निभाया। यही घटना लोहड़ी के गीतों का आधार बनी।
लोहड़ी और दुल्ला भट्टी का अटूट रिश्ता
लोहड़ी मूल रूप से फसल और सूर्य से जुड़ा त्योहार है लेकिन दुल्ला भट्टी की गाथा ने इसे सामाजिक न्याय और वीरता से जोड़ दिया। जब बच्चे और बड़े गाते हैं-“सुंदर मुंदरिए… दुल्ला भट्टी वाला हो” तो वे अनजाने में एक ऐसे नायक को याद कर रहे होते हैं जिसने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। लोकगीतों ने दुल्ला भट्टी को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है।
26 मार्च 1599 को दी गई थी फांसी
मुगल सत्ता लंबे समय तक दुल्ला भट्टी की गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं कर सकी। अंततः उन्हें पकड़ लिया गया और 26 मार्च 1599 को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। मुगलों ने सोचा कि इससे विद्रोह खत्म हो जाएगा लेकिन हुआ इसका उल्टा दुल्ला भट्टी मरकर भी अमर हो गए। उनकी शहादत ने उन्हें इतिहास से उठाकर लोकदेवता बना दिया।
इतिहास से ज्यादा ताकतवर लोककथा
इतिहास की किताबों में दुल्ला भट्टी का उल्लेख सीमित है लेकिन लोक-संस्कृति में उनका स्थान बहुत ऊंचा है। यही लोक परंपरा की ताकत है जो आम जनता के नायकों को अमर बना देती है। दुल्ला भट्टी न किसी धर्म विशेष के थे और न किसी सत्ता के। वे सिर्फ अन्याय के खिलाफ खड़े एक साहसी इंसान थे।
जब भी लोहड़ी का पर्व आता है आग के चारों ओर घूमते हुए एक आवाज जरूर गूंजती है-“सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो? दुल्ला भट्टी वाला हो…” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस गीत में लिया जाने वाला दुल्ला भट्टी कौन था? आखिर क्यों उनके नाम के बगैर लोहड़ी अधूरी मानी जाती है? Lohri 2026 के मौके पर यह जानना बेहद जरूरी है कि दुल्ला भट्टी सिर्फ एक लोककथा नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ एक वास्तविक वीर था जिसे आज भी पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है। चलिए जानते हैं कौन थे दुल्ला भट्टी?
कौन थे दुल्ला भट्टी? (Who was Dulla Bhatti?)
दुल्ला भट्टी का वास्तविक नाम राय अब्दुल्ला भट्टी था। उनका जन्म 1547 ईस्वी में पंजाब के सांडल बार क्षेत्र में हुआ जो आज पाकिस्तान के फैसलाबाद इलाके में आता है। वे भट्टी राजपूत वंश से संबंध रखते थे, जो वीरता और स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध था। दुल्ला भट्टी का परिवार पहले से ही मुगल सत्ता के निशाने पर था क्योंकि उनके पिता और दादा ने किसानों पर लगाए जा रहे भारी करों और जमीनी शोषण का विरोध किया था। इसी अन्याय ने दुल्ला भट्टी को विद्रोह की राह पर खड़ा कर दिया।
मुगल शासन के खिलाफ खुला विद्रोह
मुगल काल में पंजाब के किसानों पर अत्यधिक कर लगाए जाते थे और जमींदारों के जरिये गरीबों का शोषण किया जाता था। दुल्ला भट्टी ने इस व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। वे जंगलों और ग्रामीण इलाकों से मुगल अधिकारियों पर हमले करते, कर वसूली रोकते और जो धन लूटा जाता था उसे गरीबों में बांट देते थे। यही कारण है कि आम जनता उन्हें मसीहा मानती थी जबकि मुगल दरबार उन्हें अपराधी और विद्रोही कहता था। यही दो अलग-अलग नजरिए दुल्ला भट्टी को एक ऐतिहासिक नायक बनाते हैं।
नारी सम्मान के रक्षक दुल्ला भट्टी
दुल्ला भट्टी का सबसे मानवीय पक्ष स्त्रियों की रक्षा से जुड़ा है। लोककथाओं के अनुसार, उस समय कुछ मुगल अधिकारी गरीब परिवारों की लड़कियों को जबरन उठा लिया करते थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी कई लड़कियों को मुक्त कराया और उनका सम्मानपूर्वक विवाह करवाया। सबसे प्रसिद्ध कथा सुंदरी और मुंदरी की है दो अनाथ बहनें जिनकी शादी दुल्ला भट्टी ने स्वयं पिता बनकर करवाई। उन्होंने जंगल में अलाव जलाकर विवाह संपन्न कराया और गुड़ व तिल देकर पिता का फर्ज निभाया। यही घटना लोहड़ी के गीतों का आधार बनी।
लोहड़ी और दुल्ला भट्टी का अटूट रिश्ता
लोहड़ी मूल रूप से फसल और सूर्य से जुड़ा त्योहार है लेकिन दुल्ला भट्टी की गाथा ने इसे सामाजिक न्याय और वीरता से जोड़ दिया। जब बच्चे और बड़े गाते हैं-“सुंदर मुंदरिए… दुल्ला भट्टी वाला हो” तो वे अनजाने में एक ऐसे नायक को याद कर रहे होते हैं जिसने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। लोकगीतों ने दुल्ला भट्टी को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है।
26 मार्च 1599 को दी गई थी फांसी
मुगल सत्ता लंबे समय तक दुल्ला भट्टी की गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं कर सकी। अंततः उन्हें पकड़ लिया गया और 26 मार्च 1599 को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। मुगलों ने सोचा कि इससे विद्रोह खत्म हो जाएगा लेकिन हुआ इसका उल्टा दुल्ला भट्टी मरकर भी अमर हो गए। उनकी शहादत ने उन्हें इतिहास से उठाकर लोकदेवता बना दिया।
इतिहास से ज्यादा ताकतवर लोककथा
इतिहास की किताबों में दुल्ला भट्टी का उल्लेख सीमित है लेकिन लोक-संस्कृति में उनका स्थान बहुत ऊंचा है। यही लोक परंपरा की ताकत है जो आम जनता के नायकों को अमर बना देती है। दुल्ला भट्टी न किसी धर्म विशेष के थे और न किसी सत्ता के। वे सिर्फ अन्याय के खिलाफ खड़े एक साहसी इंसान थे।












