BMC Election 2026: वोटर लिस्ट गड़बड़ी से मुंबई के कई बूथों पर हंगामा

बीएमसी (मुंबई महानगरपालिका) चुनाव 2026 के मतदान के दौरान गुरुवार को शहर के कई मतदान केंद्रों पर मतदाता सूचीमें गड़बड़ी और प्रशासनिक खामियों के चलते अफरा‑तफरी और नाराजगी देखने को मिली। कई मतदाता लंबी कतारों और रिकॉर्ड में मेल न होने के कारण बिना वोट डाले वापस लौट गए।

Mumbai Municipal Corporation Elections 2026
मुंबई महानगरपालिका चुनाव 2026 (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar15 Jan 2026 02:03 PM
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बता दें कि बस्थानों जैसे बोरीवली, दहिसर और अंधेरी के कई बूथों पर मतदाताओं ने शिकायत की कि ऑनलाइन उपलब्ध वोटर जानकारी उनके बूथ रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रही थी और कई मतदाता बहुत से बूथों पर घुमते हुए भी अपना नाम नहीं ढूँढ पाए, जिससे वे हताश होकर घर लौट गए। एक मतदाता ने बताया कि इंटरनेट पर मिला क्रमांक बूथ पर सही नहीं था, इसलिए उसे बिना वोट डाले वापस जाना पड़ा। स्थिति को उन्होंने एक "संगठनात्मक विफलता" करार दिया।

वोटिंग स्लिप की कमी और लंबी कतारे

बता दें कि फिल्म निर्माता आशुतोष गोवारिकर के भाई अविनाश गोवारिकर ने भी मतदान के दौरान वोटिंग स्लिप की कमी के कारण देरी की बात कही है और कई लोगों को अपना सीरियल नंबर खोजने में पाँच मिनट तक का समय लग रहा था, जिससे काफ़ी कतारें बढ़ गईं और मतदाताओं का उत्साह कम हुआ।

सेनियर सिटिजन और बुनियादी सुविधा की कमी

बता दें कि कुछ बूथों पर बज़ुर्ग मतदाता भी दो घंटे से अधिक समय तक लाइन में खड़े रहे और बूथ स्तर पर पर्याप्त बैठने/सुविधाओं का अभाव देखा गया। 

तकनीकी और वेबसाइट समस्याएँ

बता दें कि बहुत से मतदाताओं ने शिकायत की कि Maharashtra State Election Commission की वेबसाइट और Voter Slip जनरेशन सेवा डाउन थी या सही डेटा नहीं दिखा रही थी, जिससे वे पहले से तैयारी न कर पाए और मतदान पर असर पड़ा।

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WiFi नाम किसने और कब रखा था? जानिए पूरा इतिहास

डिजिटल दौर में WiFi जितना जरूरी है, उतनी ही जरूरी इसकी सुरक्षा भी है। मजबूत पासवर्ड, समय-समय पर राउटर अपडेट और अनजान लोगों को नेटवर्क एक्सेस न देना—ये छोटी सावधानियां आपको बड़े साइबर खतरे से बचा सकती हैं।

WiFi in the digital age
डिजिटल दौर में WiFi (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 08:25 PM
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आज के डिजिटल युग में WiFi हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। घर, ऑफिस, स्कूल, होटल या कैफे—हर जगह इंटरनेट कनेक्टिविटी का सबसे आसान और तेज़ जरिया WiFi ही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि WiFi का नाम वाई-फाई ही क्यों रखा गया और इसका असली मतलब क्या है? ज्यादातर लोग इसका इस्तेमाल तो रोज़ करते हैं, लेकिन इसके नाम, तकनीक और सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारी से अनजान रहते हैं। यही जानकारी की कमी कई बार साइबर खतरे भी बढ़ा देती है।

क्या होता है WiFi?

WiFi एक वायरलेस नेटवर्किंग तकनीक है, जो बिना किसी तार के डिवाइस को इंटरनेट से जोड़ने का काम करती है। यह तकनीक रेडियो फ्रीक्वेंसी पर आधारित होती है और इसे तकनीकी भाषा में WLAN (Wireless Local Area Network) कहा जाता है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, टैबलेट जैसे डिवाइस WiFi के जरिए डेटा भेजते और प्राप्त करते हैं। अक्सर लोग मानते हैं कि WiFi का मतलब Wireless Fidelity होता है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। दरअसल, WiFi किसी शब्द का शॉर्ट फॉर्म नहीं है, बल्कि यह एक ब्रांड नेम है।

WiFi नाम की कहानी

WiFi नाम को साल 1999 में Wi-Fi Alliance नामक संगठन ने चुना था। इसका मकसद था कि IEEE 802.11 जैसे जटिल तकनीकी नाम की जगह आम लोगों के लिए एक आसान और याद रखने योग्य नाम दिया जाए। WiFi नाम को जानबूझकर Hi-Fi (High Fidelity) से प्रेरित होकर रखा गया, ताकि यह भरोसेमंद और हाई-क्वालिटी वायरलेस कनेक्शन का संकेत दे सके।

कैसे काम करता है WiFi?

WiFi सिस्टम में एक राउटर होता है, जो इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से जुड़ा रहता है। यह राउटर रेडियो सिग्नल के जरिए आसपास मौजूद डिवाइस तक नेटवर्क पहुंचाता है। जब कोई डिवाइस इन सिग्नल्स को पकड़ता है, तो वह इंटरनेट से कनेक्ट हो जाता है। इसी तकनीक की वजह से बिना केबल के इंटरनेट इस्तेमाल करना संभव हो पाता है।

क्या WiFi किसी एक कंपनी की तकनीक है?

बता दें कि WiFi किसी एक कंपनी या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। इसके मानकों और तकनीक को Wi-Fi Alliance नाम का संगठन नियंत्रित करता है, जिसमें दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां शामिल हैं। यह संगठन WiFi तकनीक को और ज्यादा तेज़, सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए लगातार काम करता है।

WiFi से जुड़े साइबर खतरे क्यों बढ़ते हैं?

अगर WiFi नेटवर्क सुरक्षित न हो, तो यह साइबर अपराधियों के लिए आसान निशाना बन सकता है। कमजोर पासवर्ड या ओपन नेटवर्क की वजह से डेटा चोरी, हैकिंग, पर्सनल जानकारी लीक, नेटवर्क का गलत इस्तेमाल जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। कई बार लोग बिना सोचे-समझे अपना WiFi पासवर्ड दूसरों से शेयर कर देते हैं, जिससे सुरक्षा जोखिम और भी बढ़ जाता है।

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राम जन्मभूमि विवाद: गोपाल सिंह विशारद की कानूनी लड़ाई की पूरी कहानी

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने न केवल अयोध्या विवाद का अंत किया, बल्कि गोपाल सिंह विशारद के 69 साल पुराने दावे को भी मान्यता दी। यह निर्णय इस बात का उदाहरण है कि न्याय की प्रक्रिया भले ही लंबी हो, लेकिन अंततः न्याय होता है।

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राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 06:34 PM
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राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के साथ एक नाम फिर से चर्चा में आया है—गोपाल सिंह विशारद। 69 साल पहले जिस व्यक्ति ने राम जन्मभूमि में पूजा के अधिकार के लिए मुक़दमा दायर किया था, उसे न्यायालय ने उनकी मृत्यु के 33 साल बाद वह अधिकार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि हिंदू पक्ष को सौंपते हुए राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक ज़मीन देने का भी आदेश दिया गया है।

 कौन थे गोपाल सिंह विशारद?

गोपाल सिंह विशारद अयोध्या विवाद से जुड़े प्रारंभिक चार सिविल मुक़दमों में से एक के याचिकाकर्ता थे। उन्होंने 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में मुक़दमा दायर कर यह मांग की थी कि राम जन्मभूमि पर स्थापित मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें पूजा व दर्शन से रोका न जाए। राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में वे और एम. सिद्दीक दोनों ही मूल पक्षकार थे, जिनका बाद में निधन हो गया। उनके कानूनी वारिसों ने आगे मुक़दमे की पैरवी की।

1949 की रात और विवाद की शुरुआत

दावा किया जाता है कि 22–23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने बाबरी मस्जिद की दीवार फांदकर भीतर राम, जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ स्थापित कर दीं। इसके बाद यह प्रचार हुआ कि भगवान राम अपने जन्मस्थान पर स्वयं प्रकट हुए हैं। इस घटना के बाद प्रशासन ने परिसर को विवादित घोषित कर दिया।

अदालत का पहला आदेश

गोपाल सिंह विशारद की याचिका पर सिविल जज ने उसी दिन स्थगनादेश जारी किया, जिसमें मूर्तियाँ न हटाने और पूजा जारी रखने का निर्देश दिया गया। बाद में इस आदेश को जिला जज और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। हालांकि इस स्थगनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन फ़ाइल वर्षों तक लंबित रही।

प्रशासन का पक्ष

तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. उग्रा ने अपने हलफनामे में कहा था कि विवादित स्थल को लंबे समय से मुसलमान नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते आ रहे थे और मूर्तियाँ चोरी-छिपे रखी गई थीं।

अन्य मुक़दमे भी जुड़े

बता दें कि 1951 में निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर के प्रबंधन और पूजा अधिकार को लेकर मुक़दमा दायर किया।

1961 में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और नौ मुस्लिम पक्षकारों ने मस्जिद और क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर स्वामित्व का दावा किया। 1989 में रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने भगवान राम को न्यायिक व्यक्ति घोषित करते हुए नया मुक़दमा दायर किया। इन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ चलती रही।

मौत के बाद भी जारी रहा मुक़दमा

1986 में गोपाल सिंह विशारद का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह ने मुक़दमे की पैरवी जारी रखी। सुन्नी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि विशारद का दावा व्यक्तिगत पूजा अधिकार तक सीमित था, जो उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

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