2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है।

देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) एक बार फिर सुर्खियों में बनी है। 227 वार्डों वाली इस नगर निगम के 2026 के चुनावों ने मुंबई की राजनीति में नया इतिहास रचा है। बता दें कि 1931 से शिवसेना का गढ़ मानी जाने वाली बीएमसी ने इस बार भाजपा (भारतीय जनता पार्टी ) ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम परिणामों तक, यह साफ हो गया कि मुंबई की जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है।
बृहन्मुंबई महानगरपालिका की नींव 19वीं सदी में रखी गई थी। वर्ष 1807 में इसकी शुरुआत बेहद सीमित दायरे में हुई थी, जब इसका कार्य केवल सेशंस कोर्ट तक सीमित था। बाद में शहर की साफ-सफाई, नगर व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियां इसे सौंपी गईं। 1907 में प्राथमिक शिक्षा का दायित्व भी बीएमसी के अधीन आ गया। इसके बाद 1931 में बॉम्बे अधिनियम संख्या 21 के तहत अध्यक्ष के पद को ‘मेयर’ नाम दिया गया। इसी के साथ मुंबई को अपना पहला ‘प्रथम नागरिक’ मिला।

बता दें कि बीएमसी की असली ताकत उसके विशाल बजट में झलकती है। लगभग 75 हजार करोड़ रुपये का वार्षिक बजट भारत के कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी अधिक है। करीब 1 करोड़ 87 लाख की आबादी वाले मुंबई शहर की बुनियादी सुविधाओं—पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सफाई—की जिम्मेदारी बीएमसी पर ही है। राजनीतिक दृष्टि से यहां मराठी, गुजराती और उत्तर भारतीय मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही है, जिसके चलते ‘मराठी बनाम गैर-मराठी’ जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी बहस का केंद्र बनते रहे हैं।
बीएमसी के इतिहास में पिछले 25 वर्षों तक शिवसेना का दबदबा रहा है। पार्टी ने नगर निगम की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखी थी। इससे पहले भी कई दिग्गज नेता मेयर पद तक पहुंचे। 1971 में डॉ. हेमचंद्र गुप्ते मेयर बने। इसके बाद सुधीर जोशी, मनोहर जोशी और छगन भुजबल जैसे कद्दावर नेताओं ने इस प्रतिष्ठित पद को संभाला और मुंबई की राजनीति को दिशा दी।
2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है। बीएमसी का मेयर पद सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं, बल्कि मुंबई के ‘असली राजा’ की पहचान माना जाता है। 1931 से शुरू हुई यह यात्रा आज भी उतनी ही प्रभावशाली और सत्ता के केंद्र में बनी हुई है।