टाटा नेक्सन बनाम किआ सोनेट - सेफ्टी, माइलेज और लुक्स में कौन है बाज़ी मारने वाला?

देश के ऑटोमोबाइल बाजार में कॉम्पैक्ट एसयूवी सेगमेंट की लोकप्रियता इन दिनों आसमान छू रही है। इस सेगमेंट में सबसे कड़ा मुकाबला टाटा मोटर्स की 'नेक्सन' और किआ इंडिया की 'सोनेट' के बीच देखा जा रहा है।

Tata Nexon Vs Kia Sonet
टाटा नेक्सन बनाम किआ सोनेट (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar06 Feb 2026 12:26 PM
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दोनों ही वाहन उन खरीदारों को लुभाने में जुटे हैं जो 4 मीटर से कम लंबाई वाली एसयूवी की तलाश में हैं, जिनमें शक्तिशाली इंजन, आधुनिक फीचर्स और कई वैरिएंट हों। ग्राहकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि सेफ्टी और स्टाइल के इस मुकाबले में असली चैंपियन कौन है? आइए, जानते हैं इन दोनों गाड़ियों का तुलनात्मक विश्लेषण।

कीमत और वैरिएंट: बजट में कौन भारी?

अगर हम कीमत के पैमाने को देखें, तो किआ सोनेट थोड़ी सस्ती पड़ती है। टाटा नेक्सन स्मार्ट, प्योर, क्रिएटिव और फियरलेस जैसे ट्रिम लेवल में उपलब्ध है। इसकी एक्स-शोरूम कीमत 7.32 लाख रुपये से शुरू होकर 14.15 लाख रुपये तक जाती है। वहीं, किआ सोनेट ग्राहकों को HTE, HTK, HTX, GTX+ और X-Line समेत कुल नौ ट्रिम्स में मिलती है। इसकी बेस वैरिएंट की कीमत 7.30 लाख रुपये है, जो टॉप-स्पेक मॉडल में 13.65 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। कीमत के मामले में दोनों कारें काफी करीब हैं, लेकिन टॉप एंड में नेक्सन थोड़ी महंगी साबित होती है।

परफॉरमेंस: इंजन और पावर

मैकेनिकल रूप से दोनों गाड़ियां अपनी-अपनी जगह मजबूत हैं। टाटा नेक्सन तीन इंजन ऑप्शन के साथ आती है: 1.2-लीटर टर्बो-पेट्रोल (118 hp), 1.2-लीटर टर्बो-पेट्रोल सीएनजी और 1.5-लीटर डीजल (113 hp)। इसमें ग्राहकों को 5-स्पीड/6-स्पीड मैनुअल, 6-स्पीड एएमटी और 7-स्पीड डीसीए ट्रांसमिशन का विकल्प मिलता है। दूसरी ओर, किआ सोनेट में 1.2 लीटर पेट्रोल, 1.0 लीटर टर्बो-पेट्रोल और 1.5 लीटर डीजल के तीन इंजन विकल्प हैं। इसकी खास बात है इसके ट्रांसमिशन ऑप्शन, जिसमें 5-स्पीड/6-स्पीड मैनुअल के अलावा 6-स्पीड आईएमटी (ऑटोमैटिक मैनुअल), 6-स्पीड ऑटोमैटिक और 7-स्पीड डीसीटी शामिल हैं।

माइलेज: कौन देता है ज्यादा औसत?

माइलेज के मामले में किआ सोनेट का पेट्रोल वैरिएंट टाटा नेक्सन से थोड़ा आगे है। सोनेट का पेट्रोल वैरिएंट 19.2 किमी प्रति लीटर का माइलेज देने का दावा करता है, जबकि नेक्सन पेट्रोल का आंकड़ा 17.18-17.44 किमी प्रति लीटर है। डीजल सेगमेंट में दोनों कारें अपनी-अपनी जगह सशक्त हैं। नेक्सन डीजल (एएमटी) 24.08 किमी प्रति लीटर और सोनेट डीजल 24.1 किमी प्रति लीटर का माइलेज देती हैं। इसके अलावा, नेक्सन सीएनजी वैरिएंट में लगभग 17.44 किमी प्रति किलोग्राम का औसत देती है, जो सीएनजी खरीदारों के लिए अच्छा विकल्प साबित हो सकती है।

फीचर्स और सेफ्टी: दमदारी कहां है?

यहां दोनों कंपनियों की अलग विचारधारा दिखती है। टाटा नेक्सन 'सुरक्षा' को प्राथमिकता देती है। इसमें कई एयरबैग, इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC) और ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम जैसे सेफ्टी फीचर्स स्टैंडर्ड के करीब मिलते हैं। इसके अलावा डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर और टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट भी शामिल हैं। इसके विपरीत, किआ सोनेट 'लग्जरी और टेक्नोलॉजी' पर फोकस करती है। इसके केबिन में बड़ी टचस्क्रीन, एडवांस्ड कनेक्टेड कार टेक, वेंटिलेटेड सीटें और प्रीमियम ऑडियो सिस्टम जैसे फीचर्स देखने को मिलते हैं। हालांकि, सेफ्टी फीचर्स सोनेट में भी हैं, लेकिन वे अक्सर वैरिएंट के आधार पर अलग-अलग होते हैं।

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चंद्रपुर में सत्ता के समीकरण बदले, भाजपा और शिवसेना (यूबीटी) में समझौते की कवायद

भाजपा विधायक किशोर जोरगेवार ने कहा कि उनकी पार्टी ने उद्धव सेना के सामने एक सकारात्मक प्रस्ताव रखा है। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इस पर अच्छा निर्णय लिया जाएगा।

Chandrapur Municipal Corporation
महाराष्ट्र राजनीति में नया मोड़ (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar05 Feb 2026 08:27 PM
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Chandrapur Municipal Corporation : महाराष्ट्र के चंद्रपुर महानगरपालिका में सत्ता के समीकरण साधने के लिए राजनीतिक दलों में हलचल तेज हो गई है। महापौर पद को लेकर जारी गतिरोध को तोड़ने के लिए भाजपा ने उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना यूबीटी) के सामने एक अनोखा प्रस्ताव रखा है। भाजपा ने सत्ता की साझेदारी के लिए 'सव्वा-सव्वा साल' यानी 15-15 महीने का फॉर्मूला पेश किया है। यह प्रस्ताव शिवसेना (यूबीटी) के जिला प्रमुख संदीप गिन्हे को भेजा गया है, हालांकि अभी तक सेना की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

बहुमत का गणित और सियासी समीकरण

चंद्रपुर नगर निगम में सत्ता स्थापित करने के लिए 34 नगरसेवकों का समर्थन जरूरी है। वर्तमान गणित के मुताबिक, भाजपा के पास अपने 23 और शिंदे गुट के 1 नगरसेवक के साथ कुल 24 सदस्य हैं। इसके अलावा उद्धव सेना के 6, वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) के 2 और 2 निर्दलीय सदस्य हैं। अगर ये सभी दल (24+6+2+2) एक साथ आते हैं, तो यह आंकड़ा 34 पर पहुंच जाता है। भाजपा इसी रोडमैप के जरिए प्रशासन पर अपना कब्जा करने की कोशिश में है।

आरक्षण में छिपा सियासी राज

इस पूरी राजनीतिखींचतान का मूल कारण महापौर पद का आरक्षण है। इस बार यह पद ओबीसी महिला श्रेणी के लिए आरक्षित है। उद्धव सेना के जिला प्रमुख संदीप गिन्हे की पत्नी मनस्वी गिन्हे नगरसेवक हैं और महापौर की प्रबल दावेदार मानी जा रही हैं। यही वजह है कि भाजपा उन्हें साधने में जुटी है और सत्ता की साझेदारी का ऑफर देकर उन्हें अपने पाले में लाना चाहती है।

कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें

चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। उसके पास 27 नगरसेवक हैं और सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 30 तक पहुंचता है। लेकिन, बहुमत के जादुई आंकड़े (34) से महज 4 सीटें दूर होने के बावजूद पार्टी अंदरूनी कलह और गुटबाजी की वजह से सत्ता से बाहर दिख रही है। कांग्रेस का यह गैर-जिम्मेदाराना रुख भाजपा को मैदान में उतरने का मौका दे रहा है।

भाजपा का दावा

भाजपा विधायक किशोर जोरगेवार ने कहा कि उनकी पार्टी ने उद्धव सेना के सामने एक सकारात्मक प्रस्ताव रखा है। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इस पर अच्छा निर्णय लिया जाएगा। अब देखना यह है कि क्या उद्धव सेना इस '15-15 महीने' के फॉर्मूले को स्वीकार करती है या फिर कांग्रेस के साथ मिलकर कोई और रास्ता निकालती है। Chandrapur Municipal Corporation

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सुप्रीम कोर्ट का पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ा संदेश, कर्मचारियों को 25% बकाया डीए देने का निर्देश

शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह अपने सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ते (डीए) के बकाया हिस्से का कम से कम 25 प्रतिशत भुगतान अनिवार्य रूप से करे। कोर्ट ने साफ कहा कि कर्मचारियों का डीए कोई कृपा नहीं, बल्कि उनका वैधानिक अधिकार है।

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ममता बनर्जी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar05 Feb 2026 07:32 PM
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DA Issue : पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह अपने सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ते (डीए) के बकाया हिस्से का कम से कम 25 प्रतिशत भुगतान अनिवार्य रूप से करे। कोर्ट ने साफ कहा कि कर्मचारियों का डीए कोई कृपा नहीं, बल्कि उनका वैधानिक अधिकार है। यह मामला लंबे समय से राज्य सरकार और कर्मचारियों के बीच विवाद का विषय बना हुआ था। कर्मचारियों की मांग थी कि उन्हें केंद्र सरकार के समान दर पर डीए दिया जाए, जबकि राज्य सरकार लगातार वित्तीय दबाव का हवाला देकर भुगतान टालती रही।

बकाया राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा तय समय सीमा के भीतर जारी किया जाए

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि आर्थिक कठिनाइयाँ कर्मचारियों के हक को नकारने का आधार नहीं बन सकतीं। अदालत ने निर्देश दिया कि बकाया राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा तय समय सीमा के भीतर जारी किया जाए। कोर्ट के इस फैसले से लगभग 20 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे। हालांकि, अभी पूरी बकाया राशि नहीं मिलेगी, बल्कि शेष भुगतान के लिए आगे एक व्यवस्थित योजना तैयार की जाएगी।

पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के लिए भी एक अहम संदेश

फैसले के बाद राज्य की राजनीति भी गर्मा गई है। विपक्षी दलों ने इसे सरकार की नीतियों पर सवाल उठने वाला फैसला बताया, वहीं कर्मचारी संगठनों ने इसे लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिली बड़ी जीत करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न सिर्फ पश्चिम बंगाल, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक अहम संदेश माना जा रहा है कि कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ी जिम्मेदारियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

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