ईवी बाजार में ‘माइक्रो कारों’ की फीकी पड़ती चमक, ग्राहकों ने दिखाया ठंडा प्रतिक्रिया
माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है।

Micro Electric Cars: भीड़-भाड़ वाले शहरों और संकरी गलियों के लिए बनी माइक्रो इलेक्ट्रिक कारें (Micro EVs) कागज पर तो एक बेहतरीन समाधान लगती हैं, लेकिन हकीकत में ये ग्राहकों को रिझाने में असफल साबित हो रही हैं। वैश्विक ऑटोमोबाइल बाजार में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी बेहद नगण्य बनी हुई है। पिछले साल पूरी दुनिया में लगभग 800 अरब डॉलर की इलेक्ट्रिक कारें बिकीं, जिसमें इन नन्ही कारों का हिस्सा महज 11 अरब डॉलर रहा। यानी, कुल मार्केट में इनकी हिस्सेदारी केवल 1.37 प्रतिशत है। आसान शब्दों में कहें तो, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के हर 100 रुपये के कारोबार में इनका हिस्सा डेढ़ रुपये से भी कम है।
‘न नौ मन तेल, न राधा नाचे’
विश्लेषकों का मानना है कि माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है। जिन लोगों को पैसे बचाने होते हैं, वे सस्ते दोपहिया वाहनों को तरजीह दे रहे हैं, जबकि जिन्हें आराम, सुरक्षा और लंबी दूरी तय करनी होती है, वे सीधे बड़ी एसयूवी (SUV) की ओर रुख कर रहे हैं। लोगों को ऐसी गाड़ी चाहिए जो स्कूटर से सुरक्षित हो और बड़ी कार से सस्ती, लेकिन मौजूदा माइक्रो ईवी इस दोहरी मांग को पूरा करने में नाकाम रही हैं।
चीन और भारत में बदला रुझान
छोटी कारों के मामले में सबसे आगे रहने वाला चीन भी अब इस रुझान से बाहर निकल रहा है। हालांकि, चीन की वुलिंग मिनी ईवी (Wuling Mini EV) ने पिछले साल अक्टूबर में बिक्री के मामले में टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था, लेकिन अब वहां के लोगों की पसंद बदल रही है। चीन में लोग अमीर हो रहे हैं और वे छोटी कार की जगह बड़ी और प्रीमियम एसयूवी खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारत की बात करें तो यहां का हाल भी कुछ ऐसा ही है। एमजी (MG) मोटर्स की छोटी कार 'कोमेट' की तुलना में उनकी बड़ी और महंगी 'विंडसर एसयूवी' चार गुना ज्यादा बिक रही है। यह साफ दर्शाता है कि भारतीय ग्राहक भी अब छोटी गाड़ी के बजाय ज्यादा जगह और बेहतर फीचर्स वाली गाड़ी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कंपनियों की नई रणनीति: रोबोटैक्सी पर दांव
आम ग्राहकों की उदासीन प्रतिक्रिया के बावजूद बड़ी कंपनियां पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की दिग्गज कंपनी टेस्ला अपनी दो सीटों वाली 'साइबरकैब' लेकर आ रही है। हालांकि, एलन मस्क इसे आम लोगों को बेचने के बजाय बिना ड्राइवर चलने वाली 'रोबोटैक्सी' (Robotaxi) के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा, होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै जैसी वैश्विक कंपनियां भी अपने नए छोटे मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के लिए माइक्रो ईवी बनाना आसान है, क्योंकि इनमें छोटी बैटरी लगती है और सरकारी नियम भी अपेक्षाकृत ढीले होते हैं। लेकिन, जो स्टार्टअप्स सिर्फ इन्हीं कारों पर निर्भर थीं, उनकी हालत खराब है। कई छोटी कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं और बची हुई कंपनियां टिके रहने के लिए निवेशकों से मदद की गुहार लगा रही हैं। Micro Electric Cars
Micro Electric Cars: भीड़-भाड़ वाले शहरों और संकरी गलियों के लिए बनी माइक्रो इलेक्ट्रिक कारें (Micro EVs) कागज पर तो एक बेहतरीन समाधान लगती हैं, लेकिन हकीकत में ये ग्राहकों को रिझाने में असफल साबित हो रही हैं। वैश्विक ऑटोमोबाइल बाजार में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी बेहद नगण्य बनी हुई है। पिछले साल पूरी दुनिया में लगभग 800 अरब डॉलर की इलेक्ट्रिक कारें बिकीं, जिसमें इन नन्ही कारों का हिस्सा महज 11 अरब डॉलर रहा। यानी, कुल मार्केट में इनकी हिस्सेदारी केवल 1.37 प्रतिशत है। आसान शब्दों में कहें तो, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के हर 100 रुपये के कारोबार में इनका हिस्सा डेढ़ रुपये से भी कम है।
‘न नौ मन तेल, न राधा नाचे’
विश्लेषकों का मानना है कि माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है। जिन लोगों को पैसे बचाने होते हैं, वे सस्ते दोपहिया वाहनों को तरजीह दे रहे हैं, जबकि जिन्हें आराम, सुरक्षा और लंबी दूरी तय करनी होती है, वे सीधे बड़ी एसयूवी (SUV) की ओर रुख कर रहे हैं। लोगों को ऐसी गाड़ी चाहिए जो स्कूटर से सुरक्षित हो और बड़ी कार से सस्ती, लेकिन मौजूदा माइक्रो ईवी इस दोहरी मांग को पूरा करने में नाकाम रही हैं।
चीन और भारत में बदला रुझान
छोटी कारों के मामले में सबसे आगे रहने वाला चीन भी अब इस रुझान से बाहर निकल रहा है। हालांकि, चीन की वुलिंग मिनी ईवी (Wuling Mini EV) ने पिछले साल अक्टूबर में बिक्री के मामले में टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था, लेकिन अब वहां के लोगों की पसंद बदल रही है। चीन में लोग अमीर हो रहे हैं और वे छोटी कार की जगह बड़ी और प्रीमियम एसयूवी खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारत की बात करें तो यहां का हाल भी कुछ ऐसा ही है। एमजी (MG) मोटर्स की छोटी कार 'कोमेट' की तुलना में उनकी बड़ी और महंगी 'विंडसर एसयूवी' चार गुना ज्यादा बिक रही है। यह साफ दर्शाता है कि भारतीय ग्राहक भी अब छोटी गाड़ी के बजाय ज्यादा जगह और बेहतर फीचर्स वाली गाड़ी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कंपनियों की नई रणनीति: रोबोटैक्सी पर दांव
आम ग्राहकों की उदासीन प्रतिक्रिया के बावजूद बड़ी कंपनियां पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की दिग्गज कंपनी टेस्ला अपनी दो सीटों वाली 'साइबरकैब' लेकर आ रही है। हालांकि, एलन मस्क इसे आम लोगों को बेचने के बजाय बिना ड्राइवर चलने वाली 'रोबोटैक्सी' (Robotaxi) के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा, होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै जैसी वैश्विक कंपनियां भी अपने नए छोटे मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के लिए माइक्रो ईवी बनाना आसान है, क्योंकि इनमें छोटी बैटरी लगती है और सरकारी नियम भी अपेक्षाकृत ढीले होते हैं। लेकिन, जो स्टार्टअप्स सिर्फ इन्हीं कारों पर निर्भर थीं, उनकी हालत खराब है। कई छोटी कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं और बची हुई कंपनियां टिके रहने के लिए निवेशकों से मदद की गुहार लगा रही हैं। Micro Electric Cars












