ईवी बाजार में ‘माइक्रो कारों’ की फीकी पड़ती चमक, ग्राहकों ने दिखाया ठंडा प्रतिक्रिया

माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है।

Micro Electric Cars
माइक्रो ईवी की बिक्री में सुस्ती बरकरार (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 03:50 PM
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Micro Electric Cars: भीड़-भाड़ वाले शहरों और संकरी गलियों के लिए बनी माइक्रो इलेक्ट्रिक कारें (Micro EVs) कागज पर तो एक बेहतरीन समाधान लगती हैं, लेकिन हकीकत में ये ग्राहकों को रिझाने में असफल साबित हो रही हैं। वैश्विक ऑटोमोबाइल बाजार में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी बेहद नगण्य बनी हुई है। पिछले साल पूरी दुनिया में लगभग 800 अरब डॉलर की इलेक्ट्रिक कारें बिकीं, जिसमें इन नन्ही कारों का हिस्सा महज 11 अरब डॉलर रहा। यानी, कुल मार्केट में इनकी हिस्सेदारी केवल 1.37 प्रतिशत है। आसान शब्दों में कहें तो, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के हर 100 रुपये के कारोबार में इनका हिस्सा डेढ़ रुपये से भी कम है।

‘न नौ मन तेल, न राधा नाचे’

विश्लेषकों का मानना है कि माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है। जिन लोगों को पैसे बचाने होते हैं, वे सस्ते दोपहिया वाहनों को तरजीह दे रहे हैं, जबकि जिन्हें आराम, सुरक्षा और लंबी दूरी तय करनी होती है, वे सीधे बड़ी एसयूवी (SUV) की ओर रुख कर रहे हैं। लोगों को ऐसी गाड़ी चाहिए जो स्कूटर से सुरक्षित हो और बड़ी कार से सस्ती, लेकिन मौजूदा माइक्रो ईवी इस दोहरी मांग को पूरा करने में नाकाम रही हैं।

चीन और भारत में बदला रुझान

छोटी कारों के मामले में सबसे आगे रहने वाला चीन भी अब इस रुझान से बाहर निकल रहा है। हालांकि, चीन की वुलिंग मिनी ईवी (Wuling Mini EV) ने पिछले साल अक्टूबर में बिक्री के मामले में टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था, लेकिन अब वहां के लोगों की पसंद बदल रही है। चीन में लोग अमीर हो रहे हैं और वे छोटी कार की जगह बड़ी और प्रीमियम एसयूवी खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारत की बात करें तो यहां का हाल भी कुछ ऐसा ही है। एमजी (MG) मोटर्स की छोटी कार 'कोमेट' की तुलना में उनकी बड़ी और महंगी 'विंडसर एसयूवी' चार गुना ज्यादा बिक रही है। यह साफ दर्शाता है कि भारतीय ग्राहक भी अब छोटी गाड़ी के बजाय ज्यादा जगह और बेहतर फीचर्स वाली गाड़ी को प्राथमिकता दे रहे हैं।

कंपनियों की नई रणनीति: रोबोटैक्सी पर दांव

आम ग्राहकों की उदासीन प्रतिक्रिया के बावजूद बड़ी कंपनियां पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की दिग्गज कंपनी टेस्ला अपनी दो सीटों वाली 'साइबरकैब' लेकर आ रही है। हालांकि, एलन मस्क इसे आम लोगों को बेचने के बजाय बिना ड्राइवर चलने वाली 'रोबोटैक्सी' (Robotaxi) के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा, होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै जैसी वैश्विक कंपनियां भी अपने नए छोटे मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के लिए माइक्रो ईवी बनाना आसान है, क्योंकि इनमें छोटी बैटरी लगती है और सरकारी नियम भी अपेक्षाकृत ढीले होते हैं। लेकिन, जो स्टार्टअप्स सिर्फ इन्हीं कारों पर निर्भर थीं, उनकी हालत खराब है। कई छोटी कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं और बची हुई कंपनियां टिके रहने के लिए निवेशकों से मदद की गुहार लगा रही हैं। Micro Electric Cars

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चंदूभाई विरानी ने 90 रुपए मात्र से बना दी पाँच हजार करोड़ की कंपनी

चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी हर किसी को प्रेरणा दे सकती है। यह परम सत्य है कि एक सिनेमा घर की कैंटीन में केवल 90 रूपए महीना की नौकरी करने वाले चंदूभाई विरानी इन दिनों पाँच हजार करोड़ रूपए की प्रसिद्ध कंपनी के मालिक हैं।

चंदूभाई विरानी
चंदूभाई विरानी
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar09 Feb 2026 02:54 PM
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Chandubhai Virani : चंदूभाई विरानी ने जो किया है वह काम किसी चमत्कार से कम नहीं है। चंदूभाई विरानी एक समय मात्र 90 रूपए महीना की एक छोटी सी नौकरी करते थे। वहीं चंदूभाई विरानी वर्तमान में 5000 करोड़ रूपए की कंपनी के मालिक हैं। चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी हर किसी को प्रेरणा दे सकती है। यह परम सत्य है कि एक सिनेमा घर की कैंटीन में केवल 90 रूपए महीना की नौकरी करने वाले चंदूभाई विरानी इन दिनों पाँच हजार करोड़ रूपए की प्रसिद्ध कंपनी के मालिक हैं।

10वीं पास चंदूभाई विरानी बन गए बड़े धनपति

हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को प्रेरणा देने वाले चंदूभाई विरानी केवल 10वीं तक पढ़े हैं। 10वीं पास चंदूभाई विरानी ही वह व्यक्ति हैं जो भारत के प्रमुख स्नैक ब्रांड बालाजी वेफर्स के मालिक हैं। बाला जी चिप्स के नाम से वेफर्स बनाने वाली कंपनी की वर्तमान मार्किट वैल्यू पाँच हजार करोड़ रूपए से अधिक की है। बालाजी वेफर्स के मालिक चंदूभाई विरानी का परिचय हम विस्तार से बता रहे हैं। इस परिचय को पढऩे वालों को भी चंदूभाई विरानी की सफलता की इस कहानी से बड़ी प्रेरणा मिलेगी।

गुजरात प्रदेश के राजकोट से जुड़ी है चंदूभाई विरानी की कहानी

चंदूभाई विरानी मूल रूप से गुजरात प्रदेश के राजकोट के रहने वाले हैं। वर्ष-1972 में 15 साल की उम्र में चंदूभाई विरानी अपने भाईयों के साथ राजकोट से गुजरात के जामनगर जिले के घुंडोराजी में चले गए थे। चंदूभाई विरानी के दो भाई थे। मेघजीभाई और भिखूभाई। उनके पिता स्वर्गीय पोपट विरानी ने अपनी बंजर जमीन बेच दी थी। उन्होंने अपने बेटों को अपना जीवन शुरू करने में मदद करने के लिए 20,000 रुपये दिए थे। इस पैसे का इस्‍तेमाल करके भाइयों ने राजकोट में कृषि उत्पादों और फार्म उपकरणों के व्यापार का एक छोटा व्यवसाय शुरू किया। दुर्भाग्य से यह उद्यम दो साल के भीतर ही विफल हो गया। स्थिर आय के बिना जीवन बहुत कठिन होने लगा। भाइयों को कोई भी काम खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। व्यवसाय के पतन के बाद चंदूभाई और उनके भाइयों ने राजकोट के एस्ट्रां सिनेमा की कैंटीन में काम करना शुरू कर दिया। चंदूभाई को प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। वह दरवाजा संभालने से लेकर पोस्टर चिपकाने और दर्शकों को रास्ता दिखाने तक सब कुछ करते थे। कभी-कभी चंदूभाई स्थानीय गुजराती स्नैक 'चोराफारी' की एक प्लेट के बदले सिनेमाघर की फटी सीटों की मरम्मत भी करते थे। 

अचानक आया आइडिया और बदल गई जिदंगी 

सिनेमा कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई ने देखा कि आलू के वेफर्स फिल्म देखने वालों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने इस अवसर को पहचाना। उन्होंने अपने घर के आंगन में लगभग 10,000 रुपये के निवेश से एक छोटा सा शेड स्थापित किया। उन्होंने एक कमरे वाले घर में चिप्स बनाने के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया। उनके चिप्स जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। यह लोकप्रियता न केवल सिनेमा हॉल के अंदर बल्कि बाहर भी फैली। जैसे-जैसे मांग बढ़ी चंदूभाई ने 1989 में राजकोट के अजी जीआईडीसी में गुजरात की तत्कालीन सबसे बड़ी आलू वेफर निर्माण इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्होंने 50 लाख रुपये का बैंक कर्ज लिया था। 1992 में तीनों भाइयों ने आधिकारिक तौर पर बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। कंपनी का नाम उनके कमरे में रखी भगवान हनुमान की एक छोटी सी मूर्ति के नाम पर रखा गया था।वर्तमान समय में बालाजी वेफर्स भारत के शीर्ष स्नैक ब्रांडों में से एक है। यह चार कारखानों का संचालन करती है। इनकी उत्पादन क्षमता बहुत ज्‍यादा है। कंपनी सालाना 65 लाख किलोग्राम आलू और 100 लाख किलोग्राम नमकीन का प्रसंस्करण करती है। यह हर घंटे 3,400 किलोग्राम चिप्स का उत्पादन करती है। भारत के 43,800 करोड़ रुपये के स्नैक बाजार में 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन गई। कंपनी का कारोबार हजारों करोड़ में पहुंच चुका है। चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। Chandubhai Virani

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जाने चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को कैसे बनाया महान सम्राट

चंद्रगुप्त मौर्य को इतिहासकार उन्हें केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रबंधक और प्रशासक मानते हैं, जिन्होंने चाणक्य के मार्गदर्शन में भारतीय उपमहाद्वीप में एक विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य की नींव रखी।

Chandragupta Maurya in the pages of history
इतिहास के पन्नों में चंद्रगुप्त मौर्य (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 02:37 PM
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History of Chandragupta Maurya : चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने ईसा पूर्व चौथी सदी में लगभग 21 वर्षों तक भारत पर शासन किया था, आज भी इतिहास के पन्नों में एक रहस्यमयी और शक्तिशाली व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। संस्कृत, पाली, प्राकृत और यूनानी (ग्रीक) एवं लैटिन भाषाओं की रचनाओं में उनका ज़िक्र मिलता है, लेकिन उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। यहाँ तक कि उनके पोते सम्राट अशोक ने भी अपने शिलालेखों में अपने दादा का नाम नहीं लिखा है। ऐसे में इतिहासकारों के अनुसार, एक बालक (चंद्रगुप्त मौर्य) को महान सम्राट बनाने में चाणक्य की भूमिका और उनकी तैयारी की प्रक्रिया काफी दिलचस्प है।

जन्म और विवाद: क्षत्रिय या शूद्र?

चंद्रगुप्त मौर्य की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बौद्ध ग्रंथों जैसे 'दीघ निकाय' और 'दिव्यावदान' में उन्हें पिप्पलिवन के क्षत्रिय राजाओं का वंशज बताया गया है। वहीं, कुछ विद्वान 'मौर्य' शब्द को 'मयूर' (मोर) से जोड़ते हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि वे मोर पालने वाले या उस क्षेत्र के निवासी थे। विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त के लिए 'वृषला' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसे कई लोग 'शूद्र पुत्र' कहते हैं। हालांकि, इतिहासकार राधाकुमुद मुखर्जी अपनी किताब 'चंद्रगुप्त मौर्य एंड हिज़ टाइम्स' में 'वृषला' को एक आदरसूचक शब्द बताते हैं, जिसका अर्थ है 'सबसे अच्छा राजा'।

चाणक्य से मुलाकात और गुरुकुल की शिक्षा

इतिहासकार देविका रंगाचारी की किताब 'द मौर्याज़, चंद्रगुप्त टु अशोका' के अनुसार, चाणक्य की मुलाक़ात चंद्रगुप्त से तब हुई जब वह मगध के राजा धनानंद के अपमान से क्षुब्ध होकर ग्रामीण इलाकों में घूम रहे थे। उन्होंने लगभग 11-12 वर्षीय चंद्रगुप्त को बच्चों के खेल में राजा की भूमिका निभाते हुए एक पेड़ की डाल पर बैठकर सबूतों के आधार पर न्याय करते देखा। चाणक्य इस बालक की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उसे अपने साथ तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) ले गए। तक्षशिला उस समय शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था। चाणक्य ने उसे गुरुकुल में प्रवेश दिलाया और भविष्य की चुनौतियों के लिए बार-बार परीक्षाओं से गुज़ार कर उसे तैयार किया।

सिकंदर से टकराव और सेना का निर्माण

तक्षशिला में शिक्षा के दौरान ही सिकंदर (अलेक्जेंडर) ने भारत पर आक्रमण किया। चाणक्य ने मौके का फायदा उठाते हुए चंद्रगुप्त को सिकंदर से मिलने भेजा। यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क और जस्टिन के अनुसार, यह मुलाकात असफल रही। चंद्रगुप्त की बातों से नाराज़ सिकंदर ने उसे मारने का आदेश दे दिया, लेकिन चंद्रगुप्त तेज़ी से भागकर अपनी जान बचाने में सफल रहा। जस्टिन लिखते हैं कि भागने के बाद जब चंद्रगुप्त सो रहा था, एक शेर ने उसका पसीना चाटा, जिसे शक्ति का संकेत माना गया। इसके बाद चंद्रगुप्त ने स्थानीय लोगों को इकट्ठा कर सेना बनानी शुरू कर दी और सिकंदर की मृत्यु के बाद पंजाब और सिंध को आज़ाद करा लिया।

मगध विजय और चाणक्य की शपथ

चंद्रगुप्त का अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य मगध था। इतिहासकार दीपा अग्रवाल के अनुसार, चाणक्य की धनानंद से दुश्मनी की वजह एक अपमान थी। जब चाणक्य धनानंद के दरबार में भोजन कर रहे थे, तभी राजा ने आकर उनका अपमान किया और भोजन रोकने को कहा। गुस्से से चाणक्य ने शपथ ली कि जब तक वे नंद वंश की जड़ें नहीं उखाड़ देते, तब तक अपनी चोटी की गांठ नहीं बांधेंगे। 'मिलिंद पन्हो' के अनुसार, भद्दसाला के नेतृत्व में हुए युद्ध में चंद्रगुप्त ने धनानंद को पराजित कर दिया। इस पूरे अभियान में चाणक्य की रणनीति महत्वपूर्ण रही।

राजनीतिक विवाह और प्रशासन

विजय के बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त का विवाह निर्वासित राजा धनानंद की सबसे छोटी बेटी दुर्धरा से कराने का प्रस्ताव दिया। इसका मुख्य कारण राजनीतिक स्थिरता थी। 320 ईसा पूर्व तक चंद्रगुप्त ने पूरे गंगा के मैदान पर नियंत्रण कर लिया था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ की किताब 'इंडिका' के अनुसार, उस समय पाटलिपुत्र (वर्तमान पाटन) दुनिया का सबसे बड़ा शहर था, जिसका क्षेत्रफल 33.8 वर्ग किलोमीटर था—यह रोम से 11 गुना और अलेक्जेंड्रिया से दोगुना बड़ा था। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त की सेना का विवरण देते हुए लिखा है कि उनके पास 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हजार घुड़सवार और 9 हजार हाथी थे।

सुरक्षा, दिनचर्या और अंत

बताया जाता है कि चंद्रगुप्त का जीवन भव्य महल में बीता, लेकिन उन्हें हमेशा हत्या का डर रहता था। उनकी सुरक्षा में सशस्त्र महिला अंगरक्षक तैनात थीं। वे दिन में नहीं सोते थे और रात में अपना कमरा बदल-बदलकर सोते थे। अपने जीवन के अंतिम चरण में, लगभग 293 ईसा पूर्व, चंद्रगुप्त ने शांति की खोज में जैन धर्म अपनाया और सिंहासन का त्याग कर अपने पुत्र बिंदुसार को राजा बनाया। वे जैन साधु भद्रबहु के साथ दक्षिण की ओर चले गए और कर्नाटक के श्रवण बेलगोला में संज्ञा (शरीर त्याग) के माध्यम से अपना शरीर छोड़ा। History of Chandragupta Maurya

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