पहली बार बिना आडवाणी-जोशी के वोट के होगा भाजपा अध्यक्ष चुनाव, वजह क्या?

पार्टी के संस्थापक स्तंभ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस चुनाव में पहली बार मतदान से बाहर रहेंगे। यह सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि संगठन के बदलते समय और नई पीढ़ी के उभार का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar17 Jan 2026 10:58 AM
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BJP National President Election 2026 : देश की सत्ता में काबिज और दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी मानी जाने वाली भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बड़ी हलचल है। 20 जनवरी 2026 को होने वाला राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनाव पार्टी के संगठनात्मक इतिहास में एक नए अध्याय की तरह दर्ज होने जा रहा है। संकेत साफ हैं कि 45 वर्षीय नितिन नवीन का अध्यक्ष पद पर निर्विरोध चुना जाना लगभग तय है, यानी फैसला वोटिंग से पहले ही तय दिशा में बढ़ चुका है। मगर इसी प्रक्रिया में एक ऐसा अप्रत्याशित मोड़ भी सामने आया है, जिसने भाजपा के शुरुआती दौर की यादें ताजा कर दींपार्टी के संस्थापक स्तंभ लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस चुनाव में पहली बार मतदान से बाहर रहेंगे। यह सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि संगठन के बदलते समय और नई पीढ़ी के उभार का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।

नितिन नवीन का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय

दिसंबर 2025 से कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका निभा रहे नितिन नवीन अब पार्टी की कमान पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर संभालने की ओर बढ़ रहे हैं। वे बिहार के बांकीपुर से विधायक और पूर्व मंत्री रह चुके हैं। संगठन में उनकी पहचान एक सक्रिय कार्यकर्ता-नेता के रूप में रही है, और उन्हें संघ-पृष्ठभूमि से जोड़कर भी देखा जाता है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक 19 जनवरी को नामांकन और 20 जनवरी को औपचारिक घोषणा की प्रक्रिया पूरी होगी। नामांकन प्रस्तावकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे शीर्ष नेताओं के शामिल रहने की चर्चा है।

आडवाणी-जोशी वोटर लिस्ट से बाहर क्यों हुए?

यह स्पष्ट किया जा रहा है कि यह कोई राजनीतिक दूरी या नाराजगी का मामला नहीं है। वजह पूरी तरह संगठनात्मक प्रक्रिया से जुड़ी है। पार्टी के संविधान के मुताबिक राष्ट्रीय परिषद (National Council) का सदस्य वही बन सकता है, जिसके राज्य में संगठनात्मक चुनाव (मंडल-दिला-प्रदेश) पूरे हो चुके हों।

आडवाणी और जोशी फिलहाल दिल्ली से राष्ट्रीय परिषद के सदस्य हैं, लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा के संगठनात्मक चुनाव अभी लंबित हैं। जब तक दिल्ली में यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, वहां से राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों का अंतिम चयन संभव नहीं है और इसी कारण दोनों नेताओं के नाम अध्यक्ष चुनाव की मतदाता सूची में नहीं आ सके। अतीत में आडवाणी गुजरात (गांधीनगर) और जोशी उत्तर प्रदेश (कानपुर) से परिषद सदस्य रहे हैं। सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद दोनों दिल्ली से परिषद सदस्य बने, लेकिन इस बार दिल्ली में संगठन चुनाव लंबित रहने का असर सीधे मतदाता सूची पर पड़ा।

चुनाव का पूरा कार्यक्रम क्या है?

भाजपा के राष्ट्रीय चुनाव अधिकारी के. लक्ष्मण ने अध्यक्ष चुनाव का पूरा कार्यक्रम जारी कर दिया है। तय शेड्यूल के मुताबिक 19 जनवरी को दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे। इसके बाद उसी दिन शाम तक नामांकन पत्रों की जांच और जरूरत पड़ने पर नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। वहीं 20 जनवरी को यदि मुकाबला हुआ तो मतदान कराया जाएगा, लेकिन अगर एक ही उम्मीदवार मैदान में रहा तो पार्टी उसी दिन निर्विरोध चुनाव की औपचारिक घोषणा कर देगी।

नितिन नवीन के सामने बड़ी चुनौती

जेपी नड्डा के बाद नेतृत्व संभालने जा रहे नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत करना और आगामी विधानसभा चुनावों (पश्चिम बंगाल, असम, केरल आदि) में पार्टी के प्रदर्शन को धार देना होगी। पार्टी संकेत दे रही है कि वह युवा नेतृत्व के जरिए संगठन की अगली पीढ़ी की टीम तैयार करने और जमीनी ढांचे को और चुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। BJP National President Election 2026

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26 जनवरी को ही क्यों लागू हुआ संविधान? चौंका देगा इतिहास

Republic Day: भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाता है। यह दिन हमारे संविधान के लागू होने और भारत के लोकतंत्र बनने का प्रतीक है। संविधान 26 नवंबर 1949 को तैयार हुआ और दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया ताकि पूर्ण स्वराज की भावना और स्वतंत्रता संग्राम की याद बनी रहे।

Bhartiya Samvidhan
Constitution of India
locationभारत
userअसमीना
calendar17 Jan 2026 12:09 PM
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भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाता है। यह दिन सिर्फ एक राष्ट्रीय अवकाश नहीं है बल्कि हमारे लोकतंत्र और संविधान का जश्न है। भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन देश 26 जनवरी 1950 को ही संविधान अपनाकर औपचारिक रूप से गणतंत्र बना। अक्सर लोगों को यह सवाल होता है कि संविधान 26 नवंबर 1949 को तो तैयार हो गया था लेकिन इसे लागू करने में दो महीने क्यों लगे? इस सवाल का जवाब भारत की आजादी और स्वराज के आंदोलन से जुड़ा है।

संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया

भारत का संविधान एक लिखित दस्तावेज है जिसे तैयार करने में लगभग 2 साल, 11 महीने और 18 दिन लगे। इसका श्रेय डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों को जाता है जिन्होंने देश के लिए एक मजबूत और आधुनिक संविधान तैयार किया। संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में पारित किया गया और आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इस दिन को भारत के लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू क्यों हुआ?

संविधान अपनाए जाने के दो महीने बाद ही यानी 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। इसकी खास वजह यह थी कि 1930 में 26 जनवरी को लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की घोषणा की थी। इस ऐतिहासिक तारीख को चुनकर भारत ने यह संदेश दिया कि आजादी सिर्फ ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं है, बल्कि देश ने अपने संविधान के साथ लोकतांत्रिक शासन की नींव भी रखी।

गणतंत्र दिवस का इतिहास

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत ने गणराज्य बनने की घोषणा की। इस दिन भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत हुई। इसके बाद से 26 जनवरी को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया और इसे हर साल गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है?

गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत का संविधान लागू हो चुका है और अब हर नागरिक के अधिकार और कर्तव्य सुनिश्चित हैं। यह दिन न्याय, स्वतंत्रता और समानता का प्रतीक है। साथ ही यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि देश की स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक शासन और संविधान की गारंटी भी है।

गणतंत्र दिवस का महत्व

26 जनवरी हमें यह सिखाता है कि सभी नागरिक समान हैं और देश के शासन में उनकी भूमिका अहम है। यह दिन संविधान के महत्व को बताता है और याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि हर नागरिक का अधिकार और जिम्मेदारी है। गणतंत्र दिवस का जश्न सिर्फ परेड और समारोह तक सीमित नहीं है। यह हमें हमारे संविधान, लोकतंत्र और देशभक्ति की याद दिलाने का दिन है।

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BMC Mayor List: मुंबई में 25 साल बाद टूटा शिवसेना का किला, जाने 25 साल का इतिहास

2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है।

BMC Mayor List
बीएमसी चुनाव 2026 (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar16 Jan 2026 09:33 PM
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देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) एक बार फिर सुर्खियों में बनी है। 227 वार्डों वाली इस नगर निगम के 2026 के चुनावों ने मुंबई की राजनीति में नया इतिहास रचा है। बता दें कि 1931 से शिवसेना का गढ़ मानी जाने वाली बीएमसी ने इस बार भाजपा (भारतीय जनता पार्टी ) ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम परिणामों तक, यह साफ हो गया कि मुंबई की जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है।

बीएमसी: एक छोटे बोर्ड से देश की सबसे अमीर संस्था तक

बृहन्मुंबई महानगरपालिका की नींव 19वीं सदी में रखी गई थी। वर्ष 1807 में इसकी शुरुआत बेहद सीमित दायरे में हुई थी, जब इसका कार्य केवल सेशंस कोर्ट तक सीमित था। बाद में शहर की साफ-सफाई, नगर व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियां इसे सौंपी गईं। 1907 में प्राथमिक शिक्षा का दायित्व भी बीएमसी के अधीन आ गया। इसके बाद 1931 में बॉम्बे अधिनियम संख्या 21 के तहत अध्यक्ष के पद को ‘मेयर’ नाम दिया गया। इसी के साथ मुंबई को अपना पहला ‘प्रथम नागरिक’ मिला।

यहां देखें 1931 से 2022 तक बीएमसी मेयर की पूरी सूची

75 हजार करोड़ का बजट, कई राज्यों से ज्यादा ताकत

बता दें कि बीएमसी की असली ताकत उसके विशाल बजट में झलकती है। लगभग 75 हजार करोड़ रुपये का वार्षिक बजट भारत के कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी अधिक है। करीब 1 करोड़ 87 लाख की आबादी वाले मुंबई शहर की बुनियादी सुविधाओं—पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सफाई—की जिम्मेदारी बीएमसी पर ही है। राजनीतिक दृष्टि से यहां मराठी, गुजराती और उत्तर भारतीय मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही है, जिसके चलते ‘मराठी बनाम गैर-मराठी’ जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी बहस का केंद्र बनते रहे हैं।

शिवसेना का लंबा शासन और दिग्गज मेयर

बीएमसी के इतिहास में पिछले 25 वर्षों तक शिवसेना का दबदबा रहा है। पार्टी ने नगर निगम की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखी थी। इससे पहले भी कई दिग्गज नेता मेयर पद तक पहुंचे। 1971 में डॉ. हेमचंद्र गुप्ते मेयर बने। इसके बाद सुधीर जोशी, मनोहर जोशी और छगन भुजबल जैसे कद्दावर नेताओं ने इस प्रतिष्ठित पद को संभाला और मुंबई की राजनीति को दिशा दी।

2026 चुनाव: बदलाव की बयार

2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है। बीएमसी का मेयर पद सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं, बल्कि मुंबई के ‘असली राजा’ की पहचान माना जाता है। 1931 से शुरू हुई यह यात्रा आज भी उतनी ही प्रभावशाली और सत्ता के केंद्र में बनी हुई है।


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