वसई-पालघर में वोटरों को लुभाने की कोशिश? नकदी जब्त, जांच में जुटी पुलिस

नगर निकाय चुनाव से पहले वसई-पालघर इलाके में सियासी माहौल उस समय गरमा गया, जब वसई फाटा क्षेत्र में पैसे बांटने का आरोप सामने आया। बहुजन विकास आघाड़ी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं ने देर रात कुछ लोगों को कथित तौर पर नकदी बांटते हुए रंगेहाथ पकड़ने का दावा किया है।

Elections in Vasai-Palghar
वसई-पालघर में चुनाव (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 01:11 PM
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घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और बड़ी मात्रा में नकदी जब्त की। पुलिस ने इस मामले में एक व्यक्ति को हिरासत में लिया है। इस घटना के बाद इलाके में काफी देर तक अफरा-तफरी और चर्चा का माहौल बना रहा।

पुलिस कर रही है मामले की जांच

बता दें कि पुलिस अधिकारियों के अनुसार, वसई फाटा में पकड़े गए मामले की जांच जारी है। नकदी कहां से लाई गई और किस उद्देश्य से बांटी जा रही थी, इसकी जांच सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर की जा रही है।

प्रचार खत्म होते ही सामने आई शिकायतें

बता दें कि प्रचार समाप्त होने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में गोरहे ने बताया कि कौसरबाग, कोंढवा और कटराज जैसे इलाकों में शिवसेना उम्मीदवारों के खिलाफ खड़े प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को पैसे बांटे गए और डराने-धमकाने की कोशिश की गई।

कार्यकर्ताओं को धमकाने का भी आरोप

बता दें कि यह भी आरोप लगाया कि कुछ वार्डों में शिवसेना के कार्यकर्ताओं को प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों और उनके समर्थकों द्वारा धमकाया गया। गोरहे ने कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरा हैं और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाती हैं।

शिवसेना नेता ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि इन सभी शिकायतों का संज्ञान लेकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो सकें।

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Dashrath Manjhi: एक ऐसा शख्स जिसने तोड़ा पहाड़ का गुरूर, कॉमन मैन से बने माउंटेन मैन

Dashrath Manjhi: आज दशरथ मांझी को कौन नहीं जानता। हर मेहनती स्टूडेंट के दिल में दशरथ मांझी बसे हुए हैं। माउंटेन मैन कहे जाने वाले दशरथ मांझी ने अपनी जिद और मेहनत से बिहार के गेहलौर गांव के बीच पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। चलिए जानते हैं उनकी अनसुनी कहानी।

Mountain Man Dashrath Manjhi
दशरथ मांझी की कहानी
locationभारत
userअसमीना
calendar14 Jan 2026 12:53 PM
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हर किसी की जिंदगी में ऐसी घटनाएं जरूर होती है जो पूरी दिशा बदल देती हैं। कुछ लोग मुश्किलों के सामने हार मान लेते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो संघर्ष को चुनौती समझकर अपने रास्ते खुद बनाते हैं। दशरथ मांझी ऐसे ही इंसान थे। बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर में जन्मे यह साधारण मजदूर अपनी जिंदगी में कभी भी असंभव को स्वीकार नहीं कर सके और बन गए माउंटेन मैन।

कौन थे दशरथ मांझी?

“माउंटेन मैन” के नाम से मशहूर दशरथ मांझी बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर के एक साधारण मजदूर थे। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती। उन्होंने 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद अपने गांव के लिए पहाड़ को काटकर एक रास्ता बनाया जिससे गांव और अस्पताल की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर सिर्फ 15 किलोमीटर हो गई।

पत्नी से थी बेइंतहा मोहब्बत

दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 को हुआ था। 1959 में उनकी पत्नी फल्गुनी देवी खाना लेकर जा रही थीं लेकिन रास्ते में उनका पैर फिसल गया और वह गहरी खाई में गिर गईं। अस्पताल तक पहुंचने में समय ज्यादा लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने दशरथ को ठान लिया कि वह अपने गांव के लोगों के लिए इस पहाड़ को काटकर रास्ता बनाएंगे।

शुरूआत में लोग कहते थे पागल

1960 में दशरथ मांझी ने काम शुरू किया। लोग उन्हें पागल कहने लगे क्योंकि यह काम बहुत मुश्किल था। 1600 साल पुरानी चट्टानों को केवल हथौड़ा और छेनी से काटना आसान नहीं था। उन्होंने दिन भर खेतों में काम किया और शाम से रात तक पहाड़ काटते रहे। कभी-कभी चट्टानें बहुत सख्त होने पर उन्होंने उन्हें गर्म करके फोड़ते। उनके हाथ छिलते और पैर जख्मी होते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

22 साल बाद मिली सफलता

1982 तक दशरथ मांझी ने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया। इस रास्ते से गांव के लोगों को अस्पताल और बाजार तक पहुंचने में आसानी हुई। उनका यह काम दिखाता है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।

दशरथ मांझी की कहानी हमें यह सिखाती है कि कड़ी मेहनत, जिद और धैर्य से किसी भी मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है। उनके प्रयास ने न केवल अपने गांव के लोगों की जिंदगी बदली बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई।

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बीएमसी की जंग में दांव पर महाराष्ट्र का भविष्य

बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) चुनाव इस बार सिर्फ एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह महाराष्ट्र की आने वाली राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला मुकाबला बन गया है।

Maharashtra Brihanmumbai Municipal Corporation elections
महाराष्ट्र बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar14 Jan 2026 12:06 PM
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बता दें कि 227 वार्डों वाली देश की सबसे अमीर नगरपालिका, जिसका बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है, सत्ता की राजनीति का केंद्र बन चुका है। इन चुनावों ने यह भी उजागर कर दिया है कि राज्य की राजनीति में नैतिकता, गठबंधन और वैचारिक स्थिरता लगभग गायब हो चुकी है। हर दल “सब कुछ जायज है” की तर्ज पर मैदान में है। ऐसे में बीएमसी चुनाव महाराष्ट्र के भविष्य से जुड़े पांच बड़े सवालों का जवाब देने वाले हैं।

मराठी अस्मिता में कितना बचा है दम?

बता दें कि मराठी अस्मिता इस चुनाव का सबसे बड़ा और भावनात्मक मुद्दा बनकर उभरी है। उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (एमएनएस) करीब 20 साल बाद एक मंच पर आए हैं और “मराठी माणूस” की रक्षा को मुंबई की “आखिरी जंग” बताया जा रहा है। ठाकरे बंधुओं का आरोप है कि भाजपा मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश कर रही है और हिंदी थोपकर गैर-मराठी हितों को बढ़ावा दे रही है। वहीं, महायुति ने भी अपने मेनिफेस्टो में मराठी माणूस, सस्ते घर और संस्कृति संरक्षण का वादा किया है।

हालांकि बदलती वोटर प्रोफाइल इस मुद्दे को कमजोर कर सकती है। बता दें कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जेन-जेड वोटर्स भाषा से ज्यादा पॉटहोल, कचरा प्रबंधन, वायु गुणवत्ता और सिविक सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। मराठी वोटर जहां 30–35% हैं, वहीं उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदाय मिलकर बड़ी आबादी बनाते हैं। राज ठाकरे के पुराने आक्रामक बयानों से गैर-मराठी वोटर दूर भी हो सकते हैं।

क्या महायुति सच में एकजुट है?

बता दें कि भाजपा–शिंदे शिवसेना–अजित पवार एनसीपी की महायुति राज्य की सत्ता में है, लेकिन बीएमसी चुनावों में उसकी एकजुटता सवालों में बनी हुई है। भाजपा 137, शिंदे शिवसेना 90 सीटों पर लड़ रही है, जबकि अजित पवार की एनसीपी ने 94 सीटों पर अलग उम्मीदवार उतार दिए हैं। बता दें कि कई वार्डों में “फ्रेंडली फाइट” वोट कटवा सकती है। ठाणे जैसे निगमों में भी यही हाल है। अगर महायुति 150 से ज्यादा सीटें जीतती है तो 2029 तक गठबंधन मजबूत रहेगा। लेकिन अगर बीजेपी फिर से बाकी सहयोगियों से आगे निकलती है तो राज्य में एकल दल वर्चस्व की राजनीति तेज हो सकती है।

क्या महा विकास अघाड़ी (MVA) का अंत तय है?

बता दें कि बीएमसी चुनावों में MVA का ढांचा पूरी तरह बिखरा हुआ नजर आ रहा है। जिसमें कांग्रेस 143 सीटों पर VBA के साथ शिवसेना (UBT) – MNS अलग गठबंधन और NCP (SP) कुछ जगह अजित पवार गुट के साथ है। 2019 में बनी MVA ने 2024 लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अब बीएमसी में बिखराव इसकी राजनीतिक उम्र पर सवाल खड़े कर रहा है। अगर कांग्रेस–VBA गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करता है तो सेक्युलर–दलित राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। वरना MVA का यह चुनाव आखिरी साबित हो सकता है।

ठाकरे बंधुओं का मिलन, रणनीति या स्थायी गठबंधन?

बता दें कि उद्धव और राज ठाकरे का मिलन परिस्थितिजन्य ज्यादा लगता है। 2022 में शिवसेना विभाजन, 2024 की चुनावी हार और मराठी वोटरों की घटती संख्या ने दोनों को साथ आने पर मजबूर किया। जहां उद्धव खुद को संयमित और उदार नेता के रूप में पेश करते हैं, वहीं राज ठाकरे के बयान कई बार आक्रामक और विवादित रहे हैं। यह वैचारिक टकराव भविष्य में फिर उभर सकता है। बता दें कि यह गठबंधन जीत पर टिका है, हार या सत्ता-साझेदारी के सवाल पर दरार पड़ सकती है।

‘बाहरी’ बनाम मुंबई: कितना जोखिम भरा मुद्दा?

बता दें कि अडानी–अंबानी, गुजराती, तमिल और उत्तर भारतीयों को “बाहरी” बताकर ठाकरे गुट ने चुनावी नैरेटिव गढ़ा है। धारावी पुनर्विकास, एयरपोर्ट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को अडानी से जोड़कर हमला किया जा रहा है। राज ठाकरे के पुराने नारे “हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी” और अन्नामलाई पर टिप्पणियां इस मुद्दे को और विवादित बनाती हैं। महायुति जहां सभी समुदायों को साथ लेकर चलने और मराठी मेयर का वादा कर रही है, वहीं ठाकरे गठबंधन का यह रुख बहुभाषी मुंबई में उल्टा भी पड़ सकता है।

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