एवरेस्ट का 'डेथ जोन': 8000 मीटर के बाद शुरू होता है जीवन-मृत्यु का संघर्ष
खतरनाक ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाता है। शरीर को सामान्य कामकाज के लिए जितनी ऑक्सीजन चाहिए, वह यहां उपलब्ध नहीं होती। यही कमी जानलेवा साबित होती है।

Highest peak Mount Everest : दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करना हर पर्वतारोही का सपना होता है, लेकिन इस सपने को पूरा करने के रास्ते में एक ऐसा खतरनाक हिस्सा आता है, जहां सिर्फ इंसान की मेहनत ही नहीं, बल्कि उसकी सांसें भी उसका साथ छोड़ देती हैं। पर्वतारोही इस घातक ऊंचाई को 'डेथ जोन' (मृत्यु क्षेत्र) कहते हैं। यह वह सीमा है, जहां पहुंचकर इंसान का शरीर और दिमाग दोनों जवाब देने लगते हैं।
क्या है डेथ जोन?
विशेषज्ञों के मुताबिक, समुद्र तल से 8,000 मीटर से ऊपर के क्षेत्र को डेथ जोन कहा जाता है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई करीब 8,848.86 मीटर (29,031.7 फीट) है, जिसे 2020 में नेपाल और चीन ने संयुक्त रूप से अपडेट किया था। इसका मतलब है कि एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने के आखिरी चरण में पर्वतारोहियों को इस खतरनाक जोन से गुजरना पड़ता है। यह कोई आधिकारिक कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि माउंटेनियरिंग की दुनिया का एक खौफनाक शब्द है।
ऑक्सीजन का स्तर होता है एक-तिहाई
इस खतरनाक ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाता है। शरीर को सामान्य कामकाज के लिए जितनी ऑक्सीजन चाहिए, वह यहां उपलब्ध नहीं होती। यही कमी जानलेवा साबित होती है। इस जोन में लंबे समय तक रुकना शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह होता है, क्योंकि यहां सबसे बड़ा खतरा 'हाइपोक्सिया' का होता है—यानी शरीर और खासकर दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन न पहुंच पाना।
दिमाग और फेफड़ों पर पड़ता है गहरा असर
डेथ जोन में दिमाग तक ऑक्सीजन की कमी से सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। पर्वतारोहियों को चक्कर आना, भ्रम होना और निर्णय लेने में गलतियां करना आम बात हो जाती है। कई मामलों में यह स्थिति 'हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडेमा' (HACE) में बदल जाती है, जिसमें दिमाग में सूजन आ जाती है। इसके लक्षणों में तेज सिरदर्द, उल्टी, लड़खड़ाकर चलना और बेहोशी शामिल हैं। वहीं, दूसरा खतरा 'हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडेमा' (HAPE) है, जिसमें फेफड़ों में तरल पदार्थ भरने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और लगातार खांसी होती है। अगर तुरंत नीचे उतरा न जाए, तो यह स्थितियां जानलेवा साबित हो सकती हैं।
चढ़ने से ज्यादा उतरना है मुश्किल
विशेषज्ञों का मानना है कि एवरेस्ट पर चढ़ाई से ज्यादा खतरनाक उतरना होता है। ऊंचाई और ऑक्सीजन की कमी के कारण शरीर की ऊर्जा तेजी से खत्म होती है। कई पर्वतारोही चढ़ाई के दौरान अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं, लेकिन वापस उतरते समय उनका शरीर जवाब दे देता है। ऐसे में हर कदम भारी पड़ता है और डेथ जोन में फंसना मौत का कगार बन जाता है। Highest peak Mount Everest
Highest peak Mount Everest : दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करना हर पर्वतारोही का सपना होता है, लेकिन इस सपने को पूरा करने के रास्ते में एक ऐसा खतरनाक हिस्सा आता है, जहां सिर्फ इंसान की मेहनत ही नहीं, बल्कि उसकी सांसें भी उसका साथ छोड़ देती हैं। पर्वतारोही इस घातक ऊंचाई को 'डेथ जोन' (मृत्यु क्षेत्र) कहते हैं। यह वह सीमा है, जहां पहुंचकर इंसान का शरीर और दिमाग दोनों जवाब देने लगते हैं।
क्या है डेथ जोन?
विशेषज्ञों के मुताबिक, समुद्र तल से 8,000 मीटर से ऊपर के क्षेत्र को डेथ जोन कहा जाता है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई करीब 8,848.86 मीटर (29,031.7 फीट) है, जिसे 2020 में नेपाल और चीन ने संयुक्त रूप से अपडेट किया था। इसका मतलब है कि एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने के आखिरी चरण में पर्वतारोहियों को इस खतरनाक जोन से गुजरना पड़ता है। यह कोई आधिकारिक कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि माउंटेनियरिंग की दुनिया का एक खौफनाक शब्द है।
ऑक्सीजन का स्तर होता है एक-तिहाई
इस खतरनाक ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाता है। शरीर को सामान्य कामकाज के लिए जितनी ऑक्सीजन चाहिए, वह यहां उपलब्ध नहीं होती। यही कमी जानलेवा साबित होती है। इस जोन में लंबे समय तक रुकना शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह होता है, क्योंकि यहां सबसे बड़ा खतरा 'हाइपोक्सिया' का होता है—यानी शरीर और खासकर दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन न पहुंच पाना।
दिमाग और फेफड़ों पर पड़ता है गहरा असर
डेथ जोन में दिमाग तक ऑक्सीजन की कमी से सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। पर्वतारोहियों को चक्कर आना, भ्रम होना और निर्णय लेने में गलतियां करना आम बात हो जाती है। कई मामलों में यह स्थिति 'हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडेमा' (HACE) में बदल जाती है, जिसमें दिमाग में सूजन आ जाती है। इसके लक्षणों में तेज सिरदर्द, उल्टी, लड़खड़ाकर चलना और बेहोशी शामिल हैं। वहीं, दूसरा खतरा 'हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडेमा' (HAPE) है, जिसमें फेफड़ों में तरल पदार्थ भरने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और लगातार खांसी होती है। अगर तुरंत नीचे उतरा न जाए, तो यह स्थितियां जानलेवा साबित हो सकती हैं।
चढ़ने से ज्यादा उतरना है मुश्किल
विशेषज्ञों का मानना है कि एवरेस्ट पर चढ़ाई से ज्यादा खतरनाक उतरना होता है। ऊंचाई और ऑक्सीजन की कमी के कारण शरीर की ऊर्जा तेजी से खत्म होती है। कई पर्वतारोही चढ़ाई के दौरान अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं, लेकिन वापस उतरते समय उनका शरीर जवाब दे देता है। ऐसे में हर कदम भारी पड़ता है और डेथ जोन में फंसना मौत का कगार बन जाता है। Highest peak Mount Everest












