भारत रत्न: देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की पूरी कहानी

समय के साथ भारत रत्न से जुड़े नियमों, परंपराओं और मानदंडों में कई बड़े बदलाव हुए हैं। वर्ष 2024 में एक साथ 5 हस्तियों को यह सम्मान देकर सरकार ने 70 साल पुरानी परंपरा तोड़ दी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और सामान्य पाठकों के लिए भारत रत्न से जुड़े ये तथ्य बेहद महत्वपूर्ण हैं।

Bharat Ratna
भारत रत्न (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar02 Jan 2026 01:59 PM
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भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह केवल एक पदक नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति असाधारण सेवा, त्याग और योगदान का प्रतीक माना जाता है। इसकी शुरुआत 2 जनवरी 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की थी। यह सम्मान कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और वर्ष 2011 से “मानवीय प्रयास के किसी भी क्षेत्र” में उत्कृष्ट योगदान देने वाली हस्तियों को दिया जाता है।

भारत रत्न से जुड़े 10 रोचक और अनसुने तथ्य

1️⃣ पदक की खास बनावट और पीपल का पत्ता

बता दें कि भारत रत्न का पदक पीपल के पत्ते के आकार का होता है। यह तांबे से बना होता है, जिसकी लंबाई 59 मिमी और चौड़ाई 48 मिमी होती है। इसके बीच में प्लेटिनम का सूर्य और नीचे चांदी से लिखा होता है – भारत रत्न। इसे सफेद फीते के साथ गले में पहना जाता है।

2️⃣ नकद इनाम नहीं, लेकिन मिलते हैं विशेष अधिकार

बता दें कि भारत रत्न के साथ कोई नकद राशि नहीं दी जाती। हालांकि, प्राप्तकर्ता को राजकीय अतिथि का दर्जा मिलता है। उन्हें एयर इंडिया और भारतीय रेलवे की प्रथम श्रेणी में आजीवन मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलती है और वे Table of Precedence में 7वें स्थान पर होते हैं।

3️⃣ जब सरकार को वापस लेना पड़ा फैसला

बता दें कि साल 1992 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मरणोपरांत भारत रत्न देने की घोषणा हुई थी। लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर कानूनी विवाद और परिवार की आपत्ति के चलते सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। यह भारत रत्न के इतिहास की इकलौती ऐसी घटना है।

4️⃣ जब भारत रत्न पर लग गया था प्रतिबंध

बता दें कि 1977 में मोरारजी देसाई सरकार ने भारत रत्न सहित सभी नागरिक सम्मानों पर रोक लगा दी थी। उनका मानना था कि ऐसे पुरस्कार “व्यक्ति पूजा” को बढ़ावा देते हैं। 1980 में इंदिरा गांधी सरकार ने इस फैसले को पलटते हुए सम्मान फिर से शुरू किया।

5️⃣ विदेशी भी बन चुके हैं भारत रत्न

भारत रत्न केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है। अब तक दो विदेशियों को यह सम्मान मिल चुका है खान अब्दुल गफ्फार खान (1987), नेल्सन मंडेला (1990) वहीं मदर टेरेसा को 1980 में यह सम्मान मिला, जो बाद में भारतीय नागरिक बनीं।

6️⃣ मरणोपरांत सम्मान कब शुरू हुआ?

बता दें कि शुरुआत में भारत रत्न मरणोपरांत नहीं दिया जाता था। यह नियम 1955 में बदला गया। 1966 में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री मरणोपरांत भारत रत्न पाने वाले पहले व्यक्ति बने।

7️⃣ सबसे युवा और सबसे बुजुर्ग भारत रत्न

सचिन तेंदुलकर (40 वर्ष) सबसे कम उम्र में भारत रत्न पाने वाले व्यक्ति हैं। धोंडो केशव कर्वे को उनके 100वें जन्मदिन पर यह सम्मान दिया गया, जो एक अनोखा रिकॉर्ड है।

8️⃣ 2024 में टूटी 70 साल पुरानी परंपरा

आमतौर पर एक साल में अधिकतम 3 भारत रत्न दिए जाते हैं। लेकिन 2024 में एक साथ 5 हस्तियों को यह सम्मान दिया गया:

  • कर्पूरी ठाकुर
  • लालकृष्ण आडवाणी
  • चौधरी चरण सिंह
  • पी.वी. नरसिम्हा राव
  • एम.एस. स्वामीनाथन

9️⃣ खुद को सम्मान देने पर विवाद

बता दें कि भारत के इतिहास में जवाहरलाल नेहरू (1955) और इंदिरा गांधी (1971)को उनके प्रधानमंत्री रहते हुए ही भारत रत्न मिला।

इस पर आज भी बहस होती है कि क्या कोई प्रधानमंत्री खुद के नाम की सिफारिश कर सकता है।

🔟 नाम के आगे ‘भारत रत्न’ नहीं लिख सकते

संविधान के अनुच्छेद 18(1) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अपने नाम के आगे या पीछे भारत रत्न को उपाधि के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। वे केवल यह लिख सकते हैं “राष्ट्रपति द्वारा भारत रत्न से सम्मानित”

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न्यू ईयर के दिन ही 1 जनवरी को शहीद हुए थे महान योद्धा गोकुला जाट

1 जनवरी 1670 को शहीद हुए महान योद्धा गोकुल सिंह जाट की वीरता और बलिदान की पूरी कहानी पढ़ें, जिन्होंने मुगल सत्ता के खिलाफ किसान सेना का नेतृत्व किया।

गोकुल सिंह जाट का इतिहास
गोकुल सिंह जाट का इतिहास
locationभारत
userसुप्रिया श्रीवास्तव
calendar01 Jan 2026 12:10 PM
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आज पूरा देश नए साल 2026 के स्वागत के जश्न में डूबा हुआ है। पूरे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए यह खुशी का पल है, लेकिन इसके साथ ही आज के दिन से जुड़ा एक दुखद और गौरवपूर्ण इतिहास भी है, क्योंकि आज ही के दिन भारत की धरती ने एक ऐसे महान योद्धा को खोया था, जिसकी वीरता से मुगल सत्ता तक कांप उठी थी। यह कहानी है 1 जनवरी 1670 को शहीद हुए जाट वीर गोकुल सिंह जाट की, जिनका बलिदान भारतीय इतिहास के सबसे साहसी अध्यायों में गिना जाता है।

सत्रहवीं शताब्दी का भारत और अत्याचारों का दौर

सत्रहवीं शताब्दी में भारत पर मुगल साम्राज्य का शासन बताया जाता है, लेकिन उस समय की सच्चाई यह थी कि कई क्षेत्रों में मुगल सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी। मथुरा और आसपास के इलाकों में आम जनता पर अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा था और किसानों से जबरन लगान वसूला जा रहा था। इन्हीं हालातों में मथुरा क्षेत्र के सिनसिनी गांव से एक किसान नेता और योद्धा के रूप में गोकुल सिंह जाट उभरे।

गोकुल सिंह जाट का असहयोग और किसान आंदोलन

साल 1666 के आसपास जब मुगल फौजदार अब्दुन्नवी के सैनिक लगान वसूली के लिए गांव-गांव पहुंचे, तब गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया। यह कदम उस दौर में सत्ता के खिलाफ एक बड़ा साहसिक विरोध था। जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, मेव और मीणा समाज के लोग एकजुट होकर गोकुल सिंह के साथ खड़े हो गए। जाति-पाति से ऊपर उठकर यह संघर्ष एक साझा प्रतिरोध बन गया।

सिहोरा का युद्ध और मुगल सेना की हार

मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गांव पर हमला किया, जहां गोकुल सिंह मौजूद थे। भीषण युद्ध हुआ, लेकिन गांव के लोगों और गोकुल सिंह की अगुवाई में लड़ी गई किसान सेना के सामने मुगल सैनिक टिक नहीं पाए। इस जीत ने पूरे क्षेत्र में मुगल सत्ता के खिलाफ साहस और आत्मविश्वास भर दिया।

महीनों चला संघर्ष और असफल होती मुगल रणनीति

इसके बाद करीब पांच महीनों तक लगातार युद्ध होते रहे। मुगल सेना की कई रणनीतियां और सेनापति असफल साबित हुए। गोकुल सिंह की युद्ध नीति और उनके साहस का ऐसा प्रभाव पड़ा कि अंत में मुगल पक्ष की ओर से संधि का प्रस्ताव तक भेजा गया, जिसे गोकुल सिंह ने साफ शब्दों में ठुकरा दिया।

औरंगजेब का मथुरा आगमन और निर्णायक युद्ध

नवंबर 1669 में औरंगजेब स्वयं दिल्ली से मथुरा पहुंचा और विशाल सेना के साथ गोकुल सिंह के खिलाफ अभियान चलाया गया। तोपों, हाथियों और प्रशिक्षित सैनिकों से लैस मुगल सेना के सामने गोकुल सिंह के पास केवल किसानों की सीमित और अवैतनिक सेना थी। इसके बावजूद चार दिनों तक चला युद्ध यह दिखाता है कि कैसे सीमित संसाधनों के बावजूद साहस और संकल्प से बड़ी शक्ति का सामना किया जा सकता है।

स्त्रियों का साहस और युद्ध का अंतिम मोड़

इस संघर्ष में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि स्त्रियों ने भी अद्भुत साहस दिखाया। जब युद्ध का पलड़ा मुगल सेना की ओर झुकने लगा, तब कई स्त्रियों ने जौहर कर अपने सम्मान की रक्षा की। अंत में अतिरिक्त मुगल टुकड़ी के आने से गोकुल सिंह की सेना पराजित हुई।

आगरा में बलिदान और अमर गाथा

गोकुल सिंह, उनके ताऊ उदय सिंह और हजारों साथियों को बंदी बनाकर आगरा ले जाया गया। धर्म परिवर्तन के दबाव को उन्होंने ठुकरा दिया और अमानवीय यातनाएं सहते हुए भी अपने विश्वास से नहीं डिगे। 1 जनवरी 1670 को गोकुल सिंह जाट ने वीरगति पाई। उनका बलिदान आज भी साहस, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की मिसाल है।

इतिहास में उपेक्षा और आज की जरूरत

इतना महान बलिदान देने के बावजूद गोकुल सिंह जाट का उल्लेख इतिहास की मुख्यधारा में बहुत कम मिलता है। वह किसी एक समाज के नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए लड़े थे। नए साल के इस दिन उनका स्मरण हमें यह याद दिलाता है कि भारत की आज़ादी और अस्मिता के लिए अनगिनत गुमनाम नायकों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया।

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भारत में दागी गई “प्रलय” मिसाइल की गूँज पाकिस्तान तक पहुंची

DRDO के वैज्ञानिकों ने एक ही लांचर से एक के बाद एक ‘प्रलय’ मिसाइल दाग कर यह साबित कर दिया है कि भारत के पास युद्ध में ‘प्रलय’ (कोहराम) मचाने वाली बहुत बड़ी शक्ति आ गई है। भारत में दागी गई ‘प्रलय’ मिसाइल की गूँज पाकिस्तान से लेकर चीन तथा अमेरिका तक में महसूस की गई है।

प्रलय मिसाइल
प्रलय मिसाइल
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar31 Dec 2025 05:29 PM
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National News : बुधवार 31 दिसंबर 2025 का दिन भारत के स्वर्णिम इतिहास का एक और शानदार दिन बन गया। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन DRDO ने बुधवार को बड़ा इतिहास रच दिया। DRDO के वैज्ञानिकों ने एक ही लांचर से एक के बाद एक  ‘प्रलय’ मिसाइल दाग कर यह साबित कर दिया है कि भारत के पास युद्ध में  ‘प्रलय’  (कोहराम) मचाने वाली बहुत बड़ी शक्ति आ गई है। भारत में दागी गई ‘प्रलय’ मिसाइल की गूँज पाकिस्तान से लेकर चीन तथा अमेरिका तक में महसूस की गई है।

DRDO की ‘प्रलय’ मिसाइल बन गई बड़ी मिसाल

आपको बता दें कि भारत के DRDO की ‘प्रलय’ मिसाइल परीक्षण में शत-प्रतिशत सफल साबित हुई है। DRDO ने बुधवार को ओडिशा के पास सुबह करीब 10:30 बजे एक ही लॉन्चर से दो प्रलय मिसाइलों को बहुत कम अंतराल में लगातार (सल्वो लॉन्च) दागा। यह परीक्षण यूजर ट्रायल का हिस्सा था। दोनों मिसाइलें तय ट्रैजेक्टरी पर उड़ीं और सभी उद्देश्यों को पूरा किया। चांदीपुर के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज के ट्रैकिंग सेंसरों और समुद्र में तैनात जहाज पर लगे टेलीमेट्री सिस्टम ने इसकी पुष्टि की।

क्यों खास है भारत की प्रलय मिसाइल 

भारत की प्रलय मिसाइल एक पूरी तरह स्वदेशी क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल है। प्रलय मिसाइल सॉलिड प्रोपेलेंट से चलती है और अत्याधुनिक गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम से लैस है, प्रलय मिसाइल बहुत सटीक निशाना लगा सकती है। इसकी खासियत यह है कि यह अलग-अलग तरह के वॉरहेड ले जा सकती है और विभिन्न लक्ष्यों पर हमला कर सकती है।

भारत के रक्षा मंत्री ने ‘प्रलय’ पर दी बधाई

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को ‘प्रलय’ के सफल परीक्षण पर बधाई दी है। अपने बधाई संदेश के द्वारा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, वायुसेना, थलसेना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और उद्योग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि लगातार दो मिसाइलों का सफल प्रक्षेपण प्रलय की विश्वसनीयता साबित करता है। DRDO चेयरमैन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास सचिव डॉ. समीर वी कामत ने भी टीमों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि यह सफलता दर्शाती है कि प्रलय मिसाइल जल्द ही सेना में शामिल होने के लिए तैयार है। यह परीक्षण भारतीय रक्षा क्षमता में एक और महत्वपूर्ण कदम है। प्रलय मिसाइल सेना को दुश्मन के गहरे और महत्वपूर्ण ठिकानों पर तेज और सटीक हमला करने की नई ताकत देगी। National News