इरफ़ान सिद्दीकी के 5 यादगार शेर
कविता के समानांतर उन्होंने सूचना विभाग में भी काम किया और विभिन्न वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारियाँ निभाईं। पत्रकारिता जगत में भी उनकी मौजूदगी और पहचान रही। हालांकि, कामकाजी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने लेखन को कभी पीछे नहीं छोड़ा उनके लिए शायरी सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना थी।

Irfan Siddiqui : इरफ़ान सिद्दीकी का नाम उन शायरों में आता है, जिन्होंने क्लासिकल उर्दू की तहज़ीब को संभाले रखते हुए उसे अपने दौर की संवेदना से जोड़ दिया। उनकी शायरी में न तो बनावट का शोर है, न शब्दों का दिखावा बस एक सधी हुई भाषा, पक्के बिंब और ऐसा भाव-प्रवाह जो सीधे दिल तक उतर जाता है। वे परंपरा की रौशनी से रास्ता बनाते हैं, लेकिन उनकी पंक्तियों में आज का सच, आज की बेचैनी और आज की उम्मीद भी धड़कती है। इसी संतुलन ने उन्हें महज़ लोकप्रिय नहीं, बल्कि अपनी पीढ़ी का भरोसेमंद और असरदार शायर बना दिया।
इरफ़ान ने कलम को बनाया जीवन-धर्म
1939 में बदायूं में जन्मे इरफ़ान सिद्दीकी का बचपन ऐसे माहौल में बीता जहाँ इल्म, अदब और साहित्यिक संस्कारों को विशेष महत्व दिया जाता था। यही वजह रही कि कविता की ओर उनका झुकाव बहुत कम उम्र में ही स्पष्ट हो गया। समय के साथ उनकी ग़ज़लें और नज़्में साहित्यिक हलकों में चर्चा का विषय बनने लगीं और उनकी पहचान एक गंभीर, सधे हुए रचनाकार के रूप में स्थापित होती चली गई। कविता के समानांतर उन्होंने सूचना विभाग में भी काम किया और विभिन्न वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारियाँ निभाईं। पत्रकारिता जगत में भी उनकी मौजूदगी और पहचान रही। हालांकि, कामकाजी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने लेखन को कभी पीछे नहीं छोड़ा उनके लिए शायरी सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना थी।
इरफ़ान सिद्दीकी टॉप 5 शेर
1 - बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है
उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है
2 - उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए

3 - होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
रंज कम सहता है एलान बहुत करता है

4 - बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं
कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं

5 - सरहदें अच्छी कि सरहद पे न रुकना अच्छा
सोचिए आदमी अच्छा कि परिंदा अच्छा

Irfan Siddiqui : इरफ़ान सिद्दीकी का नाम उन शायरों में आता है, जिन्होंने क्लासिकल उर्दू की तहज़ीब को संभाले रखते हुए उसे अपने दौर की संवेदना से जोड़ दिया। उनकी शायरी में न तो बनावट का शोर है, न शब्दों का दिखावा बस एक सधी हुई भाषा, पक्के बिंब और ऐसा भाव-प्रवाह जो सीधे दिल तक उतर जाता है। वे परंपरा की रौशनी से रास्ता बनाते हैं, लेकिन उनकी पंक्तियों में आज का सच, आज की बेचैनी और आज की उम्मीद भी धड़कती है। इसी संतुलन ने उन्हें महज़ लोकप्रिय नहीं, बल्कि अपनी पीढ़ी का भरोसेमंद और असरदार शायर बना दिया।
इरफ़ान ने कलम को बनाया जीवन-धर्म
1939 में बदायूं में जन्मे इरफ़ान सिद्दीकी का बचपन ऐसे माहौल में बीता जहाँ इल्म, अदब और साहित्यिक संस्कारों को विशेष महत्व दिया जाता था। यही वजह रही कि कविता की ओर उनका झुकाव बहुत कम उम्र में ही स्पष्ट हो गया। समय के साथ उनकी ग़ज़लें और नज़्में साहित्यिक हलकों में चर्चा का विषय बनने लगीं और उनकी पहचान एक गंभीर, सधे हुए रचनाकार के रूप में स्थापित होती चली गई। कविता के समानांतर उन्होंने सूचना विभाग में भी काम किया और विभिन्न वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारियाँ निभाईं। पत्रकारिता जगत में भी उनकी मौजूदगी और पहचान रही। हालांकि, कामकाजी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने लेखन को कभी पीछे नहीं छोड़ा उनके लिए शायरी सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना थी।
इरफ़ान सिद्दीकी टॉप 5 शेर
1 - बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है
उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है
2 - उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए

3 - होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
रंज कम सहता है एलान बहुत करता है

4 - बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं
कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं

5 - सरहदें अच्छी कि सरहद पे न रुकना अच्छा
सोचिए आदमी अच्छा कि परिंदा अच्छा













