बिहार में चुनावी सरगर्मी एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच चुकी है। राजधानी पटना से लेकर बिहार के छोटे गांवों तक, हर कहीं सत्ता परिवर्तन की चर्चा है। प्रदेश के राजनीतिक माहौल में बदलाव के संकेत साफ नजर आ रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही जनमानस में असंतोष भी कहीं न कहीं दिख रहा है। Bihar Election 2025
पटना एयरपोर्ट पर उतरते ही हमें बदलाव के संकेत मिले। नया टर्मिनल चमकदार था और छठ महापर्व के पोस्टर से सजाया गया था, जो शहर की नई पहचान की ओर इशारा करता था। यह संकेत था कि राजधानी में पुराने दिनों की छवि को बदलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में हमने शहर के बीचों-बीच चल रहे चुनावी माहौल को समझने के लिए लोगों से बात की। टैक्सी ड्राइवर से बात करते हुए उसने कहा, "भैया, इस बार तो मोदी जी को ही लाएंगे... चाहे नमक-रोटी खाएं, पर मोदीया को जिताएंगे!" यह बयान प्रदेश में भाजपा की मजबूत पकड़ को दर्शाता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां नरेंद्र मोदी के प्रति एक गहरी निष्ठा नजर आती है।
Bihar Election 2025: महिलाओं का समर्थन, लेकिन विकास की उम्मीदें
एक होटल में रिसेप्शनिस्ट से बातचीत करते हुए हमें महिलाओं के बीच सत्ता के प्रति एक अलग दृष्टिकोण देखने को मिला। उसने कहा, "भले ही नीतीश जी ने ‘महिला रोजगार योजना’ न चलाई होती, फिर भी मैं NDA को ही वोट देती, क्योंकि आज मैं एक कामकाजी औरत हूं। पहले के जमाने में शायद मेरी शादी कर दी जाती।" यह बयान शासन की योजनाओं से अधिक, महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की अहमियत को दर्शाता है।
हाजीपुर में तेजस्वी यादव की रैली में पहुंचे तो वहां के माहौल में नाराजगी का गुस्सा नहीं था, बल्कि एक तरह की थकान महसूस हो रही थी। युवाओं ने कहा, "विकास आधे रास्ते में रुक गया है, सड़कें तो हैं, पर नौकरियां नहीं। महंगाई सब खा जाती है।" यह असंतोष यह बताता है कि लोगों को सिर्फ बुनियादी सुविधाएं चाहिए, जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं।
Bihar Election 2025:पुनपुन गांव: विकास की हकीकत
बिहार के महादलित और पिछड़े क्षेत्रों में बदलाव की स्थिति अलग है। पटना से महज 40 किलोमीटर दूर स्थित पुनपुन के देहरी गांव में हालात ज्यों के त्यों हैं। यहां न तो साफ पानी है, न ही पक्के घर। गांव के बुजुर्गों ने कहा, "पैसे तो आते हैं, पर गांव तक पहुंचते नहीं।" ग्रामीणों का कहना है कि योजनाओं का फायदा गांव तक पहुंचने से पहले ही रुक जाता है।
हर जगह से एक ही शब्द उभरकर सामने आया - "भ्रष्टाचार"। दरभंगा के एक युवा वोटर ने कहा, "पढ़ाई पूरी कर ली, लेकिन यहां कुछ शुरू नहीं कर सकते। हर काम में घूस देनी पड़ती है।" इस भ्रष्टाचार ने बिहार के लोगों को थका दिया है, और अब उन्हें किसी भी सूरत में बदलाव की उम्मीद है।
NDA के अंदर भी इन दिनों मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। 2020 में नीतीश कुमार से विवाद कर चुके चिराग पासवान अब उन्हीं के लिए वोट मांग रहे हैं। कई बीजेपी और जेडीयू कार्यकर्ता इस गठबंधन की आंतरिक खींचतान को लेकर चिंतित हैं। एक बीजेपी रणनीतिकार ने कहा, "जातीय गणित बहुत नाजुक है। छोटे मतभेद भी सीटों पर असर डाल सकते हैं।"
Bihar Election 2025:बगावत: NDA को खतरा
NDA को सबसे बड़ी परेशानी अपने ही बागियों से हो रही है। पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा है, जबकि जेडीयू के नेता जय कुमार सिंह भी टिकट न मिलने पर अकेले चुनाव मैदान में हैं। ऐसे बागी वोटों का बंटवारा चुनावी मुकाबले को और कठिन बना सकता है।
पटना से लेकर पुनपुन, हाजीपुर से दरभंगा तक घूमने के बाद यह साफ है कि बिहार के मतदाता सजग और समझदार हैं। उन्हें विकास की सच्चाई और सत्ता का असली चेहरा अच्छी तरह से समझ में आ चुका है। हालांकि NDA को अभी भी महिलाओं और पहली बार लाभ पाने वालों का भरोसा हासिल है, लेकिन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अंदरूनी फूट की नाराजगी को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।
जाति, भावनाओं और शासन के बीच इस संघर्ष में बिहार का चुनाव केवल पार्टियों की परीक्षा नहीं, बल्कि लोगों और सत्ता के बीच भरोसे की कसौटी बनने वाला है। जैसा कि एक बुजुर्ग ने अधूरी नाली के पास खड़े होकर कहा, "बिहार बदला है, पर पूरा नहीं।"