कर चोरी पकड़ने के बाद राहत देने के नाम पर मोटी रकम की डील तय की जाती थी। इसके लिए अधिकारियों द्वारा व्यापारियों और उनके प्रतिनिधियों को निजी आवास पर बुलाया जाता था, जहां लेन-देन की शर्तें तय होती थीं।

UP News : उत्तर प्रदेश के झांसी में सामने आए केंद्रीय जीएसटी (CGST) रिश्वतकांड ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। सीबीआई ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में गिरफ्तार उत्तर प्रदेश की डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ जांच का दायरा और बढ़ा दिया है। अब एजेंसी सिर्फ रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं, बल्कि आय से अधिक संपत्ति और बेनामी निवेश के एंगल से भी पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है। जांच में सामने आया है कि व्यापारियों के यहां छापेमारी के बाद असली खेल शुरू होता था। कर चोरी पकड़ने के बाद राहत देने के नाम पर मोटी रकम की डील तय की जाती थी। इसके लिए अधिकारियों द्वारा व्यापारियों और उनके प्रतिनिधियों को निजी आवास पर बुलाया जाता था, जहां लेन-देन की शर्तें तय होती थीं।
सीबीआई सूत्रों की मानें तो रिश्वत से जुटाई गई रकम को सिर्फ नकद में दबाकर रखने की बजाय रियल एस्टेट रूट से खपाने की कोशिश की गई। आशंका है कि इस काली कमाई का हिस्सा उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में कथित बेनामी संपत्तियों में लगाया गया, ताकि पैसे की परतें छिपी रहें और ट्रेल टूट जाए। छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेजों ने एजेंसी को इसी नेटवर्क के अहम सुराग दिए हैं। डिप्टी कमिश्नर (आईआरएस) प्रभा भंडारी के साथ-साथ CGST के अधीक्षक अनिल कुमार तिवारी और अजय कुमार शर्मा के ठिकानों से बरामद कागजात अब जांच की नई दिशा तय कर रहे हैं। सीबीआई अब इन अधिकारियों की कुल संपत्ति, बैंक खातों, लेन-देन और निवेश के लिंक जोड़कर यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर पैसा किन रास्तों से घूमता रहा और किन लोगों के जरिए ठिकाने लगाया गया।
इस पूरे मामले की शुरुआत 18 दिसंबर की उस कार्रवाई से जुड़ती है, जब झांसी में जय दुर्गा हार्डवेयर और जय अंबे प्लाईवुड के ठिकानों पर CGST की टीम ने छापेमारी की। छानबीन में टैक्स चोरी के गंभीर संकेत मिलने के बाद आरोप है कि कार्रवाई का अगला कदम कानून के हिसाब से नहीं, बल्कि ‘सेटलमेंट’ की डील के जरिए तय किया जाने लगा। कहा जा रहा है कि देनदारी कम कराने और केस को “निपटाने” के बदले करीब डेढ़ करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई। इसी कथित सौदेबाजी के दौरान अफसरों, फर्म संचालकों और उनके वकील के बीच दफ्तर से बाहर निजी ठिकानों पर बैठकें हुईं, जहां रकम और शर्तों का खाका तैयार किया गया। अब एजेंसियां उसी कथित बातचीत और लेन-देन की कड़ियों को जोड़कर पूरे नेटवर्क की असल तस्वीर सामने लाने में जुटी हैं।
इस रिश्वतकांड में सीबीआई की कार्रवाई तब निर्णायक मोड़ पर पहुंची, जब एजेंसी ने 70 लाख रुपये लेते हुए CGST के दो अधीक्षकों को रंगे हाथ दबोच लिया। इसके बाद जांच की परतें तेजी से खुलीं और फर्म के मालिक के साथ उनके वकील को भी हिरासत में लिया गया। आगे चलकर दिल्ली से डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी की गिरफ्तारी ने केस को और हाई-प्रोफाइल बना दिया। सीबीआई के मुताबिक, झांसी, दिल्ली और ग्वालियर में एक साथ की गई छापेमारी में एजेंसी को करीब 90 लाख रुपये नकद, कीमती जेवरात, चांदी की ईंटें और कई संपत्तियों के दस्तावेज हाथ लगे हैं। अब इन बरामदियों की कड़ी जोड़कर यह पता लगाया जा रहा है कि रिश्वत की रकम किन रास्तों से घूमी और संपत्तियों के पीछे असली मालिकाना हक किसका है।
सीबीआई ने इस मामले में कार्रवाई का दायरा और फैलाते हुए जय अंबे प्लाईवुड के मालिक लोकेश तोलानी और जय दुर्गा हार्डवेयर के मालिक तेजपाल मंगतानी को भी FIR में नामजद किया है। दोनों की तलाश में एजेंसी की टीमें दबिशें दे रही हैं, क्योंकि जांच अधिकारियों के मुताबिक इस केस की अहम कड़ियां इन्हीं तक पहुंच सकती हैं। उधर, शुरुआती पूछताछ और दस्तावेजी पड़ताल में CGST के कुछ अन्य अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध नजर आई है। संकेत मिलते ही सीबीआई ने उन्हें भी जांच के घेरे में ले लिया है। UP News