बीएमसी की जंग में दांव पर महाराष्ट्र का भविष्य
बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) चुनाव इस बार सिर्फ एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह महाराष्ट्र की आने वाली राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला मुकाबला बन गया है।

बता दें कि 227 वार्डों वाली देश की सबसे अमीर नगरपालिका, जिसका बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है, सत्ता की राजनीति का केंद्र बन चुका है। इन चुनावों ने यह भी उजागर कर दिया है कि राज्य की राजनीति में नैतिकता, गठबंधन और वैचारिक स्थिरता लगभग गायब हो चुकी है। हर दल “सब कुछ जायज है” की तर्ज पर मैदान में है। ऐसे में बीएमसी चुनाव महाराष्ट्र के भविष्य से जुड़े पांच बड़े सवालों का जवाब देने वाले हैं।
मराठी अस्मिता में कितना बचा है दम?
बता दें कि मराठी अस्मिता इस चुनाव का सबसे बड़ा और भावनात्मक मुद्दा बनकर उभरी है। उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (एमएनएस) करीब 20 साल बाद एक मंच पर आए हैं और “मराठी माणूस” की रक्षा को मुंबई की “आखिरी जंग” बताया जा रहा है। ठाकरे बंधुओं का आरोप है कि भाजपा मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश कर रही है और हिंदी थोपकर गैर-मराठी हितों को बढ़ावा दे रही है। वहीं, महायुति ने भी अपने मेनिफेस्टो में मराठी माणूस, सस्ते घर और संस्कृति संरक्षण का वादा किया है।
हालांकि बदलती वोटर प्रोफाइल इस मुद्दे को कमजोर कर सकती है। बता दें कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जेन-जेड वोटर्स भाषा से ज्यादा पॉटहोल, कचरा प्रबंधन, वायु गुणवत्ता और सिविक सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। मराठी वोटर जहां 30–35% हैं, वहीं उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदाय मिलकर बड़ी आबादी बनाते हैं। राज ठाकरे के पुराने आक्रामक बयानों से गैर-मराठी वोटर दूर भी हो सकते हैं।
क्या महायुति सच में एकजुट है?
बता दें कि भाजपा–शिंदे शिवसेना–अजित पवार एनसीपी की महायुति राज्य की सत्ता में है, लेकिन बीएमसी चुनावों में उसकी एकजुटता सवालों में बनी हुई है। भाजपा 137, शिंदे शिवसेना 90 सीटों पर लड़ रही है, जबकि अजित पवार की एनसीपी ने 94 सीटों पर अलग उम्मीदवार उतार दिए हैं। बता दें कि कई वार्डों में “फ्रेंडली फाइट” वोट कटवा सकती है। ठाणे जैसे निगमों में भी यही हाल है। अगर महायुति 150 से ज्यादा सीटें जीतती है तो 2029 तक गठबंधन मजबूत रहेगा। लेकिन अगर बीजेपी फिर से बाकी सहयोगियों से आगे निकलती है तो राज्य में एकल दल वर्चस्व की राजनीति तेज हो सकती है।
क्या महा विकास अघाड़ी (MVA) का अंत तय है?
बता दें कि बीएमसी चुनावों में MVA का ढांचा पूरी तरह बिखरा हुआ नजर आ रहा है। जिसमें कांग्रेस 143 सीटों पर VBA के साथ शिवसेना (UBT) – MNS अलग गठबंधन और NCP (SP) कुछ जगह अजित पवार गुट के साथ है। 2019 में बनी MVA ने 2024 लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अब बीएमसी में बिखराव इसकी राजनीतिक उम्र पर सवाल खड़े कर रहा है। अगर कांग्रेस–VBA गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करता है तो सेक्युलर–दलित राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। वरना MVA का यह चुनाव आखिरी साबित हो सकता है।
ठाकरे बंधुओं का मिलन, रणनीति या स्थायी गठबंधन?
बता दें कि उद्धव और राज ठाकरे का मिलन परिस्थितिजन्य ज्यादा लगता है। 2022 में शिवसेना विभाजन, 2024 की चुनावी हार और मराठी वोटरों की घटती संख्या ने दोनों को साथ आने पर मजबूर किया। जहां उद्धव खुद को संयमित और उदार नेता के रूप में पेश करते हैं, वहीं राज ठाकरे के बयान कई बार आक्रामक और विवादित रहे हैं। यह वैचारिक टकराव भविष्य में फिर उभर सकता है। बता दें कि यह गठबंधन जीत पर टिका है, हार या सत्ता-साझेदारी के सवाल पर दरार पड़ सकती है।
‘बाहरी’ बनाम मुंबई: कितना जोखिम भरा मुद्दा?
बता दें कि अडानी–अंबानी, गुजराती, तमिल और उत्तर भारतीयों को “बाहरी” बताकर ठाकरे गुट ने चुनावी नैरेटिव गढ़ा है। धारावी पुनर्विकास, एयरपोर्ट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को अडानी से जोड़कर हमला किया जा रहा है। राज ठाकरे के पुराने नारे “हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी” और अन्नामलाई पर टिप्पणियां इस मुद्दे को और विवादित बनाती हैं। महायुति जहां सभी समुदायों को साथ लेकर चलने और मराठी मेयर का वादा कर रही है, वहीं ठाकरे गठबंधन का यह रुख बहुभाषी मुंबई में उल्टा भी पड़ सकता है।
बता दें कि 227 वार्डों वाली देश की सबसे अमीर नगरपालिका, जिसका बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है, सत्ता की राजनीति का केंद्र बन चुका है। इन चुनावों ने यह भी उजागर कर दिया है कि राज्य की राजनीति में नैतिकता, गठबंधन और वैचारिक स्थिरता लगभग गायब हो चुकी है। हर दल “सब कुछ जायज है” की तर्ज पर मैदान में है। ऐसे में बीएमसी चुनाव महाराष्ट्र के भविष्य से जुड़े पांच बड़े सवालों का जवाब देने वाले हैं।
मराठी अस्मिता में कितना बचा है दम?
बता दें कि मराठी अस्मिता इस चुनाव का सबसे बड़ा और भावनात्मक मुद्दा बनकर उभरी है। उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (एमएनएस) करीब 20 साल बाद एक मंच पर आए हैं और “मराठी माणूस” की रक्षा को मुंबई की “आखिरी जंग” बताया जा रहा है। ठाकरे बंधुओं का आरोप है कि भाजपा मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश कर रही है और हिंदी थोपकर गैर-मराठी हितों को बढ़ावा दे रही है। वहीं, महायुति ने भी अपने मेनिफेस्टो में मराठी माणूस, सस्ते घर और संस्कृति संरक्षण का वादा किया है।
हालांकि बदलती वोटर प्रोफाइल इस मुद्दे को कमजोर कर सकती है। बता दें कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जेन-जेड वोटर्स भाषा से ज्यादा पॉटहोल, कचरा प्रबंधन, वायु गुणवत्ता और सिविक सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। मराठी वोटर जहां 30–35% हैं, वहीं उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदाय मिलकर बड़ी आबादी बनाते हैं। राज ठाकरे के पुराने आक्रामक बयानों से गैर-मराठी वोटर दूर भी हो सकते हैं।
क्या महायुति सच में एकजुट है?
बता दें कि भाजपा–शिंदे शिवसेना–अजित पवार एनसीपी की महायुति राज्य की सत्ता में है, लेकिन बीएमसी चुनावों में उसकी एकजुटता सवालों में बनी हुई है। भाजपा 137, शिंदे शिवसेना 90 सीटों पर लड़ रही है, जबकि अजित पवार की एनसीपी ने 94 सीटों पर अलग उम्मीदवार उतार दिए हैं। बता दें कि कई वार्डों में “फ्रेंडली फाइट” वोट कटवा सकती है। ठाणे जैसे निगमों में भी यही हाल है। अगर महायुति 150 से ज्यादा सीटें जीतती है तो 2029 तक गठबंधन मजबूत रहेगा। लेकिन अगर बीजेपी फिर से बाकी सहयोगियों से आगे निकलती है तो राज्य में एकल दल वर्चस्व की राजनीति तेज हो सकती है।
क्या महा विकास अघाड़ी (MVA) का अंत तय है?
बता दें कि बीएमसी चुनावों में MVA का ढांचा पूरी तरह बिखरा हुआ नजर आ रहा है। जिसमें कांग्रेस 143 सीटों पर VBA के साथ शिवसेना (UBT) – MNS अलग गठबंधन और NCP (SP) कुछ जगह अजित पवार गुट के साथ है। 2019 में बनी MVA ने 2024 लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अब बीएमसी में बिखराव इसकी राजनीतिक उम्र पर सवाल खड़े कर रहा है। अगर कांग्रेस–VBA गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करता है तो सेक्युलर–दलित राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। वरना MVA का यह चुनाव आखिरी साबित हो सकता है।
ठाकरे बंधुओं का मिलन, रणनीति या स्थायी गठबंधन?
बता दें कि उद्धव और राज ठाकरे का मिलन परिस्थितिजन्य ज्यादा लगता है। 2022 में शिवसेना विभाजन, 2024 की चुनावी हार और मराठी वोटरों की घटती संख्या ने दोनों को साथ आने पर मजबूर किया। जहां उद्धव खुद को संयमित और उदार नेता के रूप में पेश करते हैं, वहीं राज ठाकरे के बयान कई बार आक्रामक और विवादित रहे हैं। यह वैचारिक टकराव भविष्य में फिर उभर सकता है। बता दें कि यह गठबंधन जीत पर टिका है, हार या सत्ता-साझेदारी के सवाल पर दरार पड़ सकती है।
‘बाहरी’ बनाम मुंबई: कितना जोखिम भरा मुद्दा?
बता दें कि अडानी–अंबानी, गुजराती, तमिल और उत्तर भारतीयों को “बाहरी” बताकर ठाकरे गुट ने चुनावी नैरेटिव गढ़ा है। धारावी पुनर्विकास, एयरपोर्ट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को अडानी से जोड़कर हमला किया जा रहा है। राज ठाकरे के पुराने नारे “हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी” और अन्नामलाई पर टिप्पणियां इस मुद्दे को और विवादित बनाती हैं। महायुति जहां सभी समुदायों को साथ लेकर चलने और मराठी मेयर का वादा कर रही है, वहीं ठाकरे गठबंधन का यह रुख बहुभाषी मुंबई में उल्टा भी पड़ सकता है।












