क्विक कॉमर्स में मुनाफे की बात, रिलायंस के दावे से बाजार में हलचल
इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से कंपनी ने कहा है कि उसका क्विक कॉमर्स बिजनेस अब कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो गया है, यानी हर ऑर्डर पर ऑपरेशनल स्तर पर कंपनी पैसे बचा/कमा रही है।

Reliance Quick Commerce Profit : भारत में 10 मिनट डिलीवरी का बाजार जिस रफ्तार से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी सामने आई है। दूध, ब्रेड, स्नैक्स या रोजमर्रा का राशन… ग्राहक अब दुकान की बजाय ऐप पर भरोसा कर रहे हैं। मगर इस स्पीड के पीछे लागत, डिस्काउंट और डिलीवरी का भारी दबाव होता है। ऐसे में रिलायंस इंडस्ट्रीज का ताजा दावा उद्योग के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से कंपनी ने कहा है कि उसका क्विक कॉमर्स बिजनेस अब कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो गया है, यानी हर ऑर्डर पर ऑपरेशनल स्तर पर कंपनी पैसे बचा/कमा रही है। साथ ही, तीन साल पहले शुरू किया गया उसका एफएमसीजी कारोबार भी EBITDA पॉजिटिव होने की बात कही गई है।
क्विक कॉमर्स का मुनाफे वाला मोड़ कैसे आया?
अक्टूबर 2024 में रिलायंस ने अपने 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को आक्रामक रफ्तार दी और अब कंपनी का दावा है कि उसने बेहद कम समय में वह मुकाम छू लिया है, जिसके लिए क्विक कॉमर्स के दूसरे दिग्गज सालों से संघर्ष कर रहे हैं। रिलायंस के मुताबिक इस तेज और टिकाऊ मॉडल की बुनियाद तीन मजबूत स्तंभों पर टिकी है। पहला, सोर्सिंग पावर देश के बड़े किराना/ग्रोसरी नेटवर्क के चलते रिलायंस बड़े पैमाने पर खरीद करता है, जिससे ब्रांड्स और सप्लायर्स से उसे बेहतर दरें मिलती हैं और लागत अपने आप नीचे आती है। दूसरा, कमाई का सबसे बड़ा इंजन फूड और बेवरेज (F&B) कैटेगरी है, जहां मार्जिन तुलनात्मक रूप से ज्यादा रहता है। कंपनी का कहना है कि उसके प्लेटफॉर्म पर हर तीन में से एक ऑर्डर इसी से जुड़ा होता है। तीसरा, किराना कारोबार की सबसे बड़ी चुनौती वेस्टेज पर कंट्रोल। रिलायंस का दावा है कि बेहतर इन्वेंट्री प्लानिंग और सख्त सप्लाई चेन मैनेजमेंट के जरिए उसने खाने-पीने की चीजों में होने वाले नुकसान को सीमित किया, जिससे मार्जिन सुधरा और 10 मिनट डिलीवर का मॉडल घाटे से निकलकर कमाई की दिशा में बढ़ा।
कम खर्च में बड़ी पहुंच का दावा
रिलायंस की क्विक कॉमर्स रणनीति का सबसे मजबूत पत्ता उसका पहले से बना रिटेल इकोसिस्टम है। कंपनी नई-नई सुविधाएं खड़ी करने की बजाय अपने मौजूदा स्टोर नेटवर्क को ही 10 मिनट डिलीवरी के लिए इस्तेमाल कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस के करीब 3,000 आउटलेट्स इस मॉडल से जुड़े हैं, जिनमें लगभग 800 डार्क स्टोर्स शामिल बताए जाते हैं। यही वह बढ़त है जो उसे कई प्रतिद्वंद्वियों से अलग खड़ा करती है जहां बाकी कंपनियों को विस्तार के लिए नए इंफ्रास्ट्रक्चर, गोदाम और संचालन व्यवस्था पर भारी निवेश करना पड़ता है, वहीं रिलायंस तैयार नेटवर्क के सहारे लागत को काबू में रखने और संचालन को अधिक कुशल बनाने का दावा कर रही है।
ऑर्डर्स की रफ्तार भी तेज
रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 की तिमाही में रिलायंस को औसतन 16 लाख ऑर्डर प्रतिदिन मिल रहे थे और ऑर्डर वॉल्यूम में तिमाही-दर-तिमाही 53% बढ़ोतरी दर्ज होने की बात कही गई है। कंपनी का लक्ष्य इसे देश का सबसे बड़ा क्विक कॉमर्स प्लेयर बनाने का है। साथ ही, रिलायंस अब केवल ग्रोसरी तक सीमित नहीं रहकर इलेक्ट्रॉनिक्स और फैशन जैसी कैटेगरी में भी डिलीवरी बढ़ा रही है, जिससे बास्केट साइज और रेवेन्यू दोनों बढ़ने की संभावना बनती है।
Blinkit–Swiggy की स्थिति क्या?
क्विक कॉमर्स की रेस में Blinkit और Swiggy ने रफ्तार जरूर पकड़ ली है, लेकिन मुनाफे की सीधी लाइन अभी भी इनके लिए चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट के संकेतों के मुताबिक, दोनों कंपनियां ग्रोथ के दम पर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही हैं, मगर कुल मिलाकर प्रॉफिटेबिलिटी अभी दूर है। Blinkit ने कई शहरों/क्लस्टर्स में यूनिट-इकोनॉमिक्स सुधरने की बात कही है, लेकिन जैसे ही कंपनी नए शहरों में विस्तार करती है, डार्क स्टोर्स, लॉजिस्टिक्स और डिस्काउंट का खर्च बढ़कर मार्जिन पर दबाव डाल देता है। वहीं Swiggy के नुकसान में कमी के संकेत जरूर मिले हैं, मगर कंपनी ने अब तक खुद को पूरी तरह प्रॉफिटेबल घोषित नहीं किया है। यानी ग्रोथ की तेज रफ्तार के बावजूद, इस सेक्टर में असली जीत अभी भी उसी की होगी जो स्केल के साथ कमाई का संतुलन बना पाए।
बाजार के लिए संकेत क्या है?
यदि रिलायंस का यह दावा आने वाली कई तिमाहियों तक भी कायम रहता है, तो क्विक कॉमर्स की बहस “यूज़र बढ़ाओ” से निकलकर सीधे टिकाऊ मुनाफा की तरफ शिफ्ट हो जाएगी। क्योंकि 10 मिनट डिलीवरी की असली लड़ाई सिर्फ रफ्तार की नहीं, सिस्टम की मजबूती की है। यहां वही कंपनी बाज़ी मारेगी, जिसके पास लागत को न्यूनतम रखने का मजबूत ढांचा हो, हाई-मार्जिन कैटेगरी का सही और लगातार बिकने वाला मिश्रण हो, और इन्वेंट्री व लॉजिस्टिक्स पर ऐसी पकड़ हो जो वेस्टेज को घाटे में बदलने ही न दे। Reliance Quick Commerce Profit
Reliance Quick Commerce Profit : भारत में 10 मिनट डिलीवरी का बाजार जिस रफ्तार से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी सामने आई है। दूध, ब्रेड, स्नैक्स या रोजमर्रा का राशन… ग्राहक अब दुकान की बजाय ऐप पर भरोसा कर रहे हैं। मगर इस स्पीड के पीछे लागत, डिस्काउंट और डिलीवरी का भारी दबाव होता है। ऐसे में रिलायंस इंडस्ट्रीज का ताजा दावा उद्योग के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से कंपनी ने कहा है कि उसका क्विक कॉमर्स बिजनेस अब कंट्रीब्यूशन मार्जिन पॉजिटिव हो गया है, यानी हर ऑर्डर पर ऑपरेशनल स्तर पर कंपनी पैसे बचा/कमा रही है। साथ ही, तीन साल पहले शुरू किया गया उसका एफएमसीजी कारोबार भी EBITDA पॉजिटिव होने की बात कही गई है।
क्विक कॉमर्स का मुनाफे वाला मोड़ कैसे आया?
अक्टूबर 2024 में रिलायंस ने अपने 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को आक्रामक रफ्तार दी और अब कंपनी का दावा है कि उसने बेहद कम समय में वह मुकाम छू लिया है, जिसके लिए क्विक कॉमर्स के दूसरे दिग्गज सालों से संघर्ष कर रहे हैं। रिलायंस के मुताबिक इस तेज और टिकाऊ मॉडल की बुनियाद तीन मजबूत स्तंभों पर टिकी है। पहला, सोर्सिंग पावर देश के बड़े किराना/ग्रोसरी नेटवर्क के चलते रिलायंस बड़े पैमाने पर खरीद करता है, जिससे ब्रांड्स और सप्लायर्स से उसे बेहतर दरें मिलती हैं और लागत अपने आप नीचे आती है। दूसरा, कमाई का सबसे बड़ा इंजन फूड और बेवरेज (F&B) कैटेगरी है, जहां मार्जिन तुलनात्मक रूप से ज्यादा रहता है। कंपनी का कहना है कि उसके प्लेटफॉर्म पर हर तीन में से एक ऑर्डर इसी से जुड़ा होता है। तीसरा, किराना कारोबार की सबसे बड़ी चुनौती वेस्टेज पर कंट्रोल। रिलायंस का दावा है कि बेहतर इन्वेंट्री प्लानिंग और सख्त सप्लाई चेन मैनेजमेंट के जरिए उसने खाने-पीने की चीजों में होने वाले नुकसान को सीमित किया, जिससे मार्जिन सुधरा और 10 मिनट डिलीवर का मॉडल घाटे से निकलकर कमाई की दिशा में बढ़ा।
कम खर्च में बड़ी पहुंच का दावा
रिलायंस की क्विक कॉमर्स रणनीति का सबसे मजबूत पत्ता उसका पहले से बना रिटेल इकोसिस्टम है। कंपनी नई-नई सुविधाएं खड़ी करने की बजाय अपने मौजूदा स्टोर नेटवर्क को ही 10 मिनट डिलीवरी के लिए इस्तेमाल कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस के करीब 3,000 आउटलेट्स इस मॉडल से जुड़े हैं, जिनमें लगभग 800 डार्क स्टोर्स शामिल बताए जाते हैं। यही वह बढ़त है जो उसे कई प्रतिद्वंद्वियों से अलग खड़ा करती है जहां बाकी कंपनियों को विस्तार के लिए नए इंफ्रास्ट्रक्चर, गोदाम और संचालन व्यवस्था पर भारी निवेश करना पड़ता है, वहीं रिलायंस तैयार नेटवर्क के सहारे लागत को काबू में रखने और संचालन को अधिक कुशल बनाने का दावा कर रही है।
ऑर्डर्स की रफ्तार भी तेज
रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 की तिमाही में रिलायंस को औसतन 16 लाख ऑर्डर प्रतिदिन मिल रहे थे और ऑर्डर वॉल्यूम में तिमाही-दर-तिमाही 53% बढ़ोतरी दर्ज होने की बात कही गई है। कंपनी का लक्ष्य इसे देश का सबसे बड़ा क्विक कॉमर्स प्लेयर बनाने का है। साथ ही, रिलायंस अब केवल ग्रोसरी तक सीमित नहीं रहकर इलेक्ट्रॉनिक्स और फैशन जैसी कैटेगरी में भी डिलीवरी बढ़ा रही है, जिससे बास्केट साइज और रेवेन्यू दोनों बढ़ने की संभावना बनती है।
Blinkit–Swiggy की स्थिति क्या?
क्विक कॉमर्स की रेस में Blinkit और Swiggy ने रफ्तार जरूर पकड़ ली है, लेकिन मुनाफे की सीधी लाइन अभी भी इनके लिए चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट के संकेतों के मुताबिक, दोनों कंपनियां ग्रोथ के दम पर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही हैं, मगर कुल मिलाकर प्रॉफिटेबिलिटी अभी दूर है। Blinkit ने कई शहरों/क्लस्टर्स में यूनिट-इकोनॉमिक्स सुधरने की बात कही है, लेकिन जैसे ही कंपनी नए शहरों में विस्तार करती है, डार्क स्टोर्स, लॉजिस्टिक्स और डिस्काउंट का खर्च बढ़कर मार्जिन पर दबाव डाल देता है। वहीं Swiggy के नुकसान में कमी के संकेत जरूर मिले हैं, मगर कंपनी ने अब तक खुद को पूरी तरह प्रॉफिटेबल घोषित नहीं किया है। यानी ग्रोथ की तेज रफ्तार के बावजूद, इस सेक्टर में असली जीत अभी भी उसी की होगी जो स्केल के साथ कमाई का संतुलन बना पाए।
बाजार के लिए संकेत क्या है?
यदि रिलायंस का यह दावा आने वाली कई तिमाहियों तक भी कायम रहता है, तो क्विक कॉमर्स की बहस “यूज़र बढ़ाओ” से निकलकर सीधे टिकाऊ मुनाफा की तरफ शिफ्ट हो जाएगी। क्योंकि 10 मिनट डिलीवरी की असली लड़ाई सिर्फ रफ्तार की नहीं, सिस्टम की मजबूती की है। यहां वही कंपनी बाज़ी मारेगी, जिसके पास लागत को न्यूनतम रखने का मजबूत ढांचा हो, हाई-मार्जिन कैटेगरी का सही और लगातार बिकने वाला मिश्रण हो, और इन्वेंट्री व लॉजिस्टिक्स पर ऐसी पकड़ हो जो वेस्टेज को घाटे में बदलने ही न दे। Reliance Quick Commerce Profit












