मकर संक्रांति कोई साधारण त्यौहार नहीं है, यह है बहुत खास

होली तथा दीपावली जैसे बड़े त्यौहार भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में एक ही नाम से मनते हैं। मकर संक्रांति के त्यौहार के विषय में एक ही नाम से त्यौहार मनाने की परम्परा बदल जाती है।

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 06:04 PM
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Makar Sankranti : मकर संक्रांति भारत का कोई साधारण त्यौहार नहीं है। मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे भारत का उत्सव है। यह भी कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति का पर्व भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ पर्व है। भारत में जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें से ज्यादातर त्यौहार एक ही नाम से मनाए जाते हैं। होली तथा दीपावली जैसे बड़े त्यौहार भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में एक ही नाम से मनते हैं। मकर संक्रांति के त्यौहार के विषय में एक ही नाम से त्यौहार मनाने की परम्परा बदल जाती है।

मकर संक्रांति के रखे गए हैं अनेक नाम

भारत के अलग-अलग भागों में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग नाम से मनाया जाता है खिचड़ी पर्व, पोंगल, बिहू, लोहड़ी तथा संक्रांत नाम से मनाए जाने वाले सभी पर्व वास्तव में मकर संक्रांति के ही प्रतीक हैं। भारत के तमाम पर्व प्रकृति को समर्पित करके मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति का पर्व भी पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित पर्व है। मकर संक्रांति के मूल में सूर्य उपासना, नदी में स्नान तथा दान करने की प्रक्रिया पूरे भारत में एक समान है।

भारत की हर संस्कृति में मौजूद है मकर संक्रांति

भारत अनेक प्रकार की संस्कृतियों का देश है। मकर संक्रांति भारत की हर संस्कृति में है और कश्मीर से कन्याकुमारी और बंगाल से गुजरात तक इसकी मान्यता है। यह पंजाब में लोहड़ी है, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी है, बिहार में संक्रांत हैं. असम में माघ बिहू है तो तमिलनाडु में पोंगल है। संक्रांति से एक दिन पहले हर साल 13 जनवरी को लोहड़ी मनाई जाती है. लोहड़ी सीधे तौर पर अग्नि से जुड़ा त्योहार है। जहां आग पुरानी बुरी यादों, बुरे विचारों और नकारात्मक ताकतों को जला देने की प्रतीक बन जाती है. इस आग में नई फसल के लावे भूने जाते हैं, जो नवीनता को अपनाने का प्रतीक है. लोहड़ी का अर्थ है, लौ (लकड़ी), ओह (उपले) और ड़ी यानी रेवड़ी. लौ जो सकारात्मकता लाती है, उपले जो बीते दिनों के गुजर जाने के प्रतीक हैं और रेवड़ी जो खुशियां लाती हैं. फसलों के घर आने से खुशियां आती हैं और इस खुशी में जुड़ जाती हैं लोककथाएं।

लोहड़ी में भी मिलती है मकर संक्रांति की झलक

लोहड़ी में दुल्ला भट्टी की कहानी गीत बनकर गूंजती है, दुल्ला भट्टी नाम के इस बांके नौजवान ने सत्ता की गलत ताकतों के खिलाफ आवाज उठाई. तब बादशाह अकबर के राज में पंजाब में लड़कियां बेची जा रही थीं. दुल्ला ने उन्हें बचाया और लोहड़ी के दिन उनकी शादी कराई। सामाजिक ताने-बाने में दुल्ला ने ऐसी जगह बनाई कि लोहड़ी की पारंपरिकता में वह हर बार के लिए शामिल हो गया। आज दुल्ला की बातें न हो तो लोहड़ी हो ही नहीं सकती।

उत्तर प्रदेश स​​हित मध्य भारत में खूब मनाई जाती है मकर संक्रांति

ज्योतिष कहता है कि जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है और राशि परिवर्तन करते हुए मकर राशि में पहुंचता है तो इस सूर्य की मकर संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति धरती के अंडाकार परिक्रमा पथ पर चलते हुए सूर्य के निकट पहुंचने का प्रतीक है. ग्रहों की चाल के आधार पर मध्य भारत मकर संक्रांति मनाता है. सूर्य का राशि परिवर्तन, एक राशि से दूसरी राशि में जाना साथ ही पृथ्वी का दिशा परिवर्तन ऐसी खगोलीय घटना है जो कि लोगों के रहन-सहन पर सीधे तौर पर असर डालती है. मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और फिर दान आदि की परंपरा उसी जड़ता को हटा देने का जरिया है. चेतना की और लौटा व्यक्ति जब दोबारा समाज में पहुंचता है तो तिल-गुड़ के लड्डू इसे फिर से समाज में घुलना-जुड़ना सिखाते हैं। त्योहारों की मूल सिद्धांत भी यही है कि वह सामाजिकता को बचाए रखे। राजस्थान में मकर संक्रांति का मतलब है पतंगों से भरा आसमान। जयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में यह दिन रंगों और प्रतिस्पर्धा से भर जाता है। हरियाणा में इसे संक्रांत कहा जाता है और जहां बहुओं द्वारा बुजुर्गों को उपहार देने की परंपरा है।

मकर संक्रांति पर खिचड़ी का बड़ा महत्व

मकर संक्रांति के इस मौके को खिचड़ी भी कहा जाता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में इस दिन खिचड़ी चढ़ाने, दान करने, बनाने और सहभोज करने का बहुत महत्व है। खिचड़ी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण व्यंजन और प्रतीकात्मक भोजन है, जिसका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और पोषण के दृष्टिकोण से है। खिचड़ी विभिन्न सामग्रियों से तैयार की जाती है, जिनमें चावल, दाल, सब्जियां और मसाले शामिल होते हैं। इसे सादगी और संतुलित आहार का प्रतीक माना जाता है। सनातन में इसे साधु भोज, देव अन्न और ऋषिभुक्तम (ऋषियों के भोग लगाने हेतु) कहा गया है।

तमिलनाडु में पोंगल है मकर संक्रांति की झलक

फसलें कटकर घर आ चुकी हैं और उत्साह का माहौल है. फिर जब सूर्य देव आकाश में नजर आते हैं तो तमिल समाज इसे एक नए वर्ष के तौर पर लेता है और पोंगल मनाता है. दरवाजों पर रंग-रोगन आंगन में खूबसूरत पूक्कलम (रंगोली) सजाए गए हैं. गाय-बैलों को नहला-धुला कर सजाया गया है. इस बीच घर की बड़ी-बूढ़ी अलग-अलग मटकों धान को दूध में भिगोकर शक्कर के साथ उबाल रही हैं. वह इसे इतना उबालेंगी कि जब तक यह उफन कर किनारों पर न आ जाए. इसी के साथ उनकी स्थानीय भाषा में एक गीत भी हिलोरे लेता रहेगा. इसका मतलब है कि जैसे सागर का पानी उफन कर तट पर आया है, जैसे मेरी मटकी में उफान आया है, बस मेरे घर के बच्चों में खुशी भी ऐसी उफान पर आए. समृद्धि और साथ-साथ मिलकर हंसने-गाने का यह त्योहार पोंगल है. पोंगल आमतौर पर जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय चार दिनों तक मनाया जाता है. भोगी पोंगल जो सफाई और पुराने सामान और पुराने विचारों को छोड़ने का दिन है. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुराने सामान को जलाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक मानते हैं. दूसरा दिन, थाई पोंगल है जो इसका मुख्य दिन है. लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं और धन्यवाद देते हैं. इस दिन पोंगल नामक विशेष मिठाई पकाई जाती है, जो चावल, दूध और गुड़ से बनाई जाती है। इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है. घरों के आंगन में सुंदर रंगोली (कोलम) बनाई जाती है। मट्टू पोंगल का दिन मवेशियों (गाय और बैल) को समर्पित होता है. मवेशियों को सजाया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं और उन्हें फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं। मवेशियों की पूजा की जाती है क्योंकि वे कृषि कार्यों में मदद करते हैं। फिर आता है कन्नम पोंगल, सूर्य पूजा के साथ कन्याओं को उपहार दिए जाते हैं। यह दिन परिवार और समाज के साथ बिताने के लिए होता है। लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं।

आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना में भी मनाते हैं पर्व

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति तीन दिन मनाई जाती है। भोगी, संक्रांति और कनुमा. गो-पूजा, हरिदासु की टोलियां और रंगोली (मुग्गुलु) इसकी पहचान हैं। वहीं, कर्नाटक में यह पर्व सुग्गी कहलाता है. यहां एलु-बेला (तिल, गुड़) नारियल और मूंगफली का मिश्रण, आपसी सौहार्द का प्रतीक है। केरल में मकर संक्रांति का केंद्र सबरीमला मंदिर है, जहां मकरविलक्कु और मकर ज्योति के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति के दिन उत्तरायणी मनाया जाता है। यह पर्व खासतौर पर गढ़वाली और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों में मनाया जाता है। यहां भी तिल-गुड़ का महत्व है और लोग एक-दूसरे को यह बांटते हैं, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक पकवान है घुघुतिया. ये पकवान मकर संक्रांति की एक लोककथा से जुड़ा हुआ है। यहां छोटे बच्चों को गुड़-आटे-दूध मिलाकर और तलकर बनाई गई घुघुतिया नाम की मिठाई दी जाती है और इसकी माला पिरोकर छोटे बच्चों को पहना दी जाती है। लोककथा में है कि इसी घुघुतिया ने एक बार राजा के बच्चे की न सिर्फ जान बचाई थी बल्कि उत्तराधिकार के बहुत बड़े मसले का हल भी किया था। उत्तरैणी के दिन यहां लोग आटे-गुड़ मिलाकर उसकी माला बनाते हैं और कौवों को खिलाते हैं।

पश्चिम भारत में अलग ही नजारा 

गुजरात में मकर संक्रांति का नाम ही बदल जाता है और यहां यह उत्तरायण कहलाता है। अहमदाबाद से सूरत तक पतंगों का उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। आसमान एक तरीके से सामाजिक एकता का कैनवास बन जाता है। महाराष्ट्र में मकर संक्रांत के लिए कहा जाता है, 'तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला। 'यानी तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो।' यह केवल मिठास का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का संदेश है। महिलाएं हल्दी-कुमकुम के कार्यक्रम आयोजित करती हैं। उधर, गोवा में यह पर्व नदी-स्नान और ग्रामीण मेलों से जुड़ा है. यहां भी तिल-गुड़ और पारंपरिक भोजन का महत्व है।

बिहार में दही-चूड़ा की बहार

सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो बिहार और झारखंड में दही-चूड़ा के भोज का आयोजन किया जाता है। इस वक्त नया धान आया होता है और इससे ही बनता है नर्म-मुलायम चिवड़ा. दही-चूड़ा (चिवड़ा) ऐसा भोजन है जो प्राचीन फास्ट फूड है और नूडल्स से भी तेज बनता है। इसकी शुरुआत कैसे हुई इस पर कोई पौराणिक दावा नहीं किया जा सकता है, लेकिन दंतकथाओं में दर्ज है समुद्र मंथन के समय जब देवता भूख से व्याकुल हुए तब ऋषियों ने तुरंत ही भोजन का प्रबंध करने के लिए दही-चूड़ा का भोजन कराया. शास्त्रों में दही को भी शुभ माना गया है और धान को समृद्धि का प्रतीक. दही-चूड़ा जब मिलकर एक हो जाते हैं तो शुभता और समृद्धि दोनों का प्रभाव पड़ता है। दही हमारे नकारात्मक प्रभाव को हटाता है और चूड़ा या चिवड़ा ऊर्जा देता है।

झारखंड में 'तुसु परब' के रूप में आयोजन

झारखंड में मकर संक्रांति का लोक रूप 'तुसु परब' के रूप में सामने आता है। तुसु गीतों के साथ युवतियां लोक परंपराओं को जीवित रखती हैं। नदी-स्नान और मेले इसका अहम हिस्सा हैं। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह पर्व कृषि से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ में इसे पूस परब कहा जाता है, जहां नई फसल के स्वागत में लोकनृत्य और सामूहिक भोज होते हैं।

गंगा से ब्रह्मपुत्र तक कैसी होती है मकर संक्रांति

पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति को पौष संक्रांति कहा जाता है। यहां गंगासागर मेला इस पर्व का केंद्र बन जाता है जहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। घरों में पिठे-पुली जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं. ओडिशा में यह पर्व मकर चौला के लिए जाना जाता है. सूर्य को अर्पित किए जाने वाले विशेष भोग में कृषि संस्कृति की झलक मिलती है। असम में मकर संक्रांति भोगाली बिहू या माघ बिहू के रूप में मनाई जाती है। यह फसल कटाई के बाद का उत्सव है, जिसमें सामूहिक भोज और मेजी जलाने की परंपरा है. सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में यह पर्व स्थानीय जनजातीय परंपराओं में ढलकर सामने आता है। जहां सूर्य और प्रकृति की आराधना इसका मूल भाव है।

असम में माघ बिहू का उत्साह

असम में माघ बिहू को भोगाली बिहू और माघर दोमाही के नाम से भी जाना जाता है। माघ बिहू से पहले के दिन को उरुका होता है, जो अग्नि देव को समर्पित माना जाता है. इस मौके पर लोक व्यंजन जैसे आलू पितिका, जाक और मसोर टेंगा बनाया जाता है और सब मिलकर भोज करते हैं. इसी के साथ पहली फसल अपने आराध्य देव को अर्पित की जाती है और यह कामना की जाती है कि आने वाले समय में भी अच्छी फसल पैदा हो।

भारत में मकर संक्रांति के अलग अलग नाम

1. उत्तर प्रदेश – खिचड़ी पर्व

2. बिहार – तिल संक्रांति / खिचड़ी / दही चूड़ा

3. झारखंड – तुसु परब

4. मध्य प्रदेश – मकर संक्रांति

5. छत्तीसगढ़ – पुस परब

6. राजस्थान – मकर संक्रांति

7. हरियाणा – संक्रांत

8. पंजाब – लोहड़ी (एक दिन पहले)

9. हिमाचल प्रदेश – माघी

10. उत्तराखंड – घुघुतिया- उत्तरैणी

11. गुजरात – उत्तरायण

12. महाराष्ट्र – मकर संक्रांत

13. गोवा – संक्रांत

14. पश्चिम बंगाल – पौष संक्रांति

15. ओडिशा – मकर  चौला संक्रांति

16. असम – भोगाली बिहू / माघ बिहू

17. सिक्किम – माघे संक्रांति

18. अरुणाचल प्रदेश – माघे संक्रांति

19. नागालैंड – सेक्रेनी (मकर संक्रांति जैसा, पर अलग)

20. मणिपुर – याओसांग के आसपास (संक्रांति पर सूर्य पूजा)

21. मेघालय –  माघीर

22. मिजोरम – संक्रांति

23. त्रिपुरा – पौष संक्रांति

24. आंध्र प्रदेश – भोगी संक्रांति

25. तेलंगाना – कनुमा संक्रांति

26. तमिलनाडु – पोंगल

27. कर्नाटक – सुग्गी / मकर संक्रांति

28. केरल – मकरविलक्कु / मकर ज्योति Makar Sankranti



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खिचड़ी ने बदल दिया था भारत का पुराना इतिहास

दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

खिचड़ी वाली कथा
खिचड़ी वाली कथा
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 05:03 PM
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Makar Sankranti Khichdi History : मकर संक्रांति का पर्व खिचड़ी खाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। भारत के सभी घरों में खिचड़ी खाई जाती है। खिचड़ी के भोजन को देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोजन माना जाता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

जब खिचड़ी ने कर दिया था बड़ा कमाल

खिचड़ी के द्वारा भारत के इतिहास को बदलने की यह घटना बहुत पुरानी घटना है। यह घटना उस समय की है  जब मगध में नंदवंश का शासन था। नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत कू्रर था। जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया। इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली।  उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया। इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े। चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आंकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।

खिचड़ी खाकर बनी रणनीति ने सब कुछ बदल डाला था

उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे। वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे। वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था। इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे। बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई। थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी। घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं। बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना। चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया। मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका। चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा। सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। अब आप समझ गए होंगे कि किस प्रकार खिचड़ी ने भारत का इतिहास बदल दिया था। Makar Sankranti Khichdi History

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जो इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वह कुत्तों के लिए हो गया

मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
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locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 03:59 PM
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Supreme Court stray dogs case : भारत में इन दिनों कुत्ते बहुत खास हो गए हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट से लेकर सडक़ तक कुत्तों की ही चर्चा हो रही है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि भारत में जो काम इंसानों के लिए कभी नहीं हुआ वही काम भारत के कुत्तों के लिए हो गया है। इतना ही नहीं भारत की सबसे बड़ी अदालत यानि भारत का सुप्रीम कोर्ट कुत्तों के लिए लड़ाई लडऩे वाली सबसे बड़ी संस्था बन गई है।

इंसानों की बजाय कुत्तों पर मेहरबान हुआ सुप्रीम कोर्ट

आपको बता दें कि भारत के सुप्रीम कोर्ट में पिछले 6 महीने से कुत्तों का मामला छाया हुआ है। यह मामला आवारा कुत्तों से जुड़ा हुआ है। सडक़ों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट में इतनी लम्बी बहस हो चुकी है जितनी लम्बी बहस भारत में कभी इंसानों के लिए नहीं हुई। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने खुद कहा कि जितनी लम्बी बहस कुत्तों के ऊपर सुनी है उतनी लम्बी बहस उन्होंने कभी भी इंसानों के ऊपर नहीं सुनी।

आवारा कुत्तों को खाना खिलाना पड़ेगा भारी

आवारा कुत्तों को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। देशभर में लावारिस कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अब ऐसे मामलों में राज्य सरकार और स्थानीय नगरीय निकायों को भारी मुआवजा चुकाना होगा। अदालत ने कहा, कुत्ते के काटने पर उन्हें खाना खिलाने वाले लोगों और संगठनों की भी जवाबदेही तय की जाएगी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ इस मुद्दे पर स्वत:संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस नाथ ने कहा, लावारिस कुत्ते के हमले में किसी बच्चे या बुजुर्ग की मौत होती है या वह गंभीर जख्मी होता है, तो हम तय करेंगे कि राज्य सरकार और स्थानीय निकाय उन्हें भारी मुआवजा दें, क्योंकि उन्होंने कोते पांच साल में नियम लागू करने कौ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है। जस्टिस नाथ ने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को भी चेतावनी दी, यदि वे इन जानवरों की चिंता करते हैं, तो उन्हें अपने घरों में रखें। सडक़ों पर खुला छोडक़र लोगों की डराने और काटने देना मंजूर नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया जिम्मेदारी का बड़ा सवाल

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संदीप मेहता ने भी चिंता जताते हुए पूछा, जब नौ साल का बच्चा कुत्ते के हमले का शिकार होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। आप चाहते हैं कि हम आंखें मूंद लें। लावारिस कुत्ते किसी के स्वामित्व में नहीं होते और यदि कोई उन्हें पालना चाहता है, तो उसे कानून के तहत लाइसेंस लेकर पालतू बनाना चाहिए। पीठ नवंबर, 2025 में दिए अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी कर रही है, जिसमें बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से लावारिस कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि कुत्तों का टीकाकरण और नियमों के तहत नसबंदी की जाए और उन्हें उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए। Supreme Court stray dogs case