Thursday, 18 April 2024

धर्म – अध्यात्म : हम आंख भी हैं, काजल भी!

 विनय संकोची अंजन का शाब्दिक अर्थ है – काजल, सुरमा, स्याही, रात्रि, पश्चिम, नीलगिरी और एक वृक्ष विशेष। अंजन से…

धर्म – अध्यात्म :  हम आंख भी हैं, काजल भी!

 विनय संकोची

अंजन का शाब्दिक अर्थ है – काजल, सुरमा, स्याही, रात्रि, पश्चिम, नीलगिरी और एक वृक्ष विशेष। अंजन से नेत्र ज्योति बढ़ती है और नेत्र की सुंदरता में भी वृद्धि होती है। आंख और अंजन का रिश्ता बड़ा पुराना है, शायद जब से आंख बनी तब से है। लेकिन ये रिश्ता है बड़ा अजीब, ये रिश्ता है बड़ा प्यारा और न्यारा। अंजन कही या सुरमा लगने के बाद यह आंख के सबसे ज्यादा करीब होता है, एकदम पास लेकिन आंख में लगा काजल आंखों को ही नहीं दिखाई पड़ता है। कितनी अजीब बात है परंतु काजल को इस स्थिति का कोई मलाल नहीं होता है, वह तो पूरी ईमानदारी के साथ आंखों को स्वास्थ्य और सौन्दर्य प्रदान करता है।

अंजन और आंख के बीच कभी स्वार्थ नहीं आता है। अंजन का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता है, वह तो परहित भाव से आंख के सबसे करीब बना रहकर खुश रहता है। अंजन को इस बात का अभिमान भी नहीं होता है कि उसने आंखों को सुंदरता प्रदान की। शायद अंजन इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि अच्छाई का घमंड बुराई की जड़ों को गहरा करता है। चूंकि अंजन स्वार्थ और अभिमान से रहित हो परहित का भाव रखता है, इसलिए वह श्रेष्ठ है, श्रेष्ठतम है। अंजन को इस बात की तसल्ली होती है कि वह आंख के करीब है। आंख उसे देखे ना देखे क्या फर्क पड़ता है? आंख की निकटता का सुख अंजन को अभिभूत किए रहता है।

दूसरी ओर आंख को भी इस बात का एहसास हमेशा ही बना रहता है कि अंजन उसके करीब है, बहुत करीब। उसे न देख पाने का अफसोस आंख को भी अवश्य ही होता होगा। आंखें बोल पातीं, तो जरूर बतातीं अपने मन की बात।अंजन आंखों पर उपकार करता है लेकिन बदले में कुछ भी नहीं चाहता है। आंखें जानती हैं कि अंजन का उन पर “उपकार-ऋण” है, लेकिन वह उस ऋण को उतारने का कोई मार्ग जानती नहीं है। अजीब सा रिश्ता है अजब सा नाता है।

हमारे जीवन में भी बहुत सारे लोग हमारे बहुत करीब रहकर हम पर उपकार करते हैं। हम सारे संसार को तो देखते रहते हैं लेकिन उन स्वार्थहीन परम उपकारियों को नहीं देख पाते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें उनके उपकार का एहसास नहीं होता है। हम उन्हें और उनके उपकारों को महसूस करते हैं, परंतु कुछ कह नहीं पाते हैं, प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाते हैं। ऐसा होता है और संभवत सबके साथ ही होता है।

जो उपकारी अंजन-श्रेणी के होते हैं, वे हमारे व्यवहार को उपेक्षा के भाव से नहीं देखते हैं और इसीलिए हमारे प्रति अपने मन में कोई द्वेष, कोई कुंठा नहीं पालते हैं। लेकिन जो अंजन के विपरीत व्यवहार करते हैं, जो उपकार के बदले प्रतिउपकार की इच्छा रखते हैं वे कुंठा पाल बैठते हैं और जब ऐसा होता है तो रिश्ते बिगड़ते हैं।

आंख अंजन के उपकार को महसूस भी करती है और उसके ऋण को स्वीकार भी करती है। ऐसे ही यदि कोई अतिनिकट का व्यक्ति हम पर कोई उपकार करता है तो हम उसका ऋण मानते हैं, दिल की गहराइयों से मानते हैं। लेकिन शायद कह इसलिए नहीं पाते हैं क्योंकि कहने से बात छोटी हो जाती है। हम कह इसलिए नहीं पाते हैं कि कहीं उपकारी के नि:स्वार्थ प्रेम स्नेह भाव को ठेस न लग जाए। ज्ञानियों का कहना है – वास्तव में बड़ा वही है, जो दूसरों को बड़ा बनाता है। अंजन आंख को बड़ा ही तो बनाता है और शायद यही नि:स्वार्थ उपकारी भी करते हैं।

“आंख अंजन” के रिश्ते को अपनाकर समाज को मजबूत बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया जा सकता है। हर “आंख” को “अंजन” मिला तो रिश्तों की सुंदरता भी बढ़ेगी और रिश्ते मजबूत भी होंगे

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