रमजान में दुबई सरकार का बड़ा ऐलान, 'फैमिली इयर' का तोहफा

सरकारी कर्मचारी अब सुबह 9 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक ही काम करेंगे।शुक्रवार सप्ताह के अंतिम कार्य दिवस पर काम का समय और सीमित कर दिया गया है। शुक्रवार को टाइमिंग सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक रहेगी।

Year of the Family
दुबई में रमजान के नए नियम लागू (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar18 Feb 2026 03:23 PM
bookmark

Year of the Family : पवित्र महीने रमजान की शुरुआत के साथ ही दुबई में सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी सामने आई है। दुबई सरकार ने अपने कर्मचारियों के कल्याण और पारिवारिक जीवन को प्राथमिकता देते हुए कार्य संस्कृति में बड़े बदलाव की घोषणा की है। 'ईयर ऑफ द फैमिली' (Year of the Family) पहल के तहत लिए गए इस फैसले से लाखों सरकारी कर्मचारियों को रोजे के दौरान काम और निजी जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।

कम हुए काम के घंटे, बदली ऑफिस की टाइमिंग

 दुबई मानव संसाधन विभाग (Dubai Government Human Resources Department) द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, रमजान के दौरान सरकारी दफ्तरों की टाइमिंग में उल्लेखनीय कमी की गई है। नए नियमों के मुताबिक सोमवार से गुरुवार सरकारी कर्मचारी अब सुबह 9 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक ही काम करेंगे।शुक्रवार सप्ताह के अंतिम कार्य दिवस पर काम का समय और सीमित कर दिया गया है। शुक्रवार को टाइमिंग सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक रहेगी। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि कर्मचारी रोजे के दौरान थकान कम महसूस करें और उन्हें अपने परिवार के साथ समय बिताने तथा धार्मिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

लचीलापन है खासियत, 7 से 10 बजे के बीच कर सकते हैं शुरुआत

सिर्फ काम के घंटे घटाना ही काफी नहीं है, सरकार ने काम करने के तरीके में भी लचीलापन लाया है। विभागों को अधिकृत किया गया है कि वे कर्मचारियों को सुबह 7 बजे से 10 बजे के बीच किसी भी समय ऑफिस आने की सुविधा दे सकते हैं। इसके लिए शर्त यह है कि कर्मचारी अपने निर्धारित दैनिक कार्य घंटे पूरे करें। यह व्यवस्था उन कर्मचारियों के लिए राहत का सबब साबित होगी जो सुबह जल्दी उठना पसंद करते हैं या ट्रैफिक की समस्या से बचना चाहते हैं।

हफ्ते में दो दिन की वर्क फ्रॉम होम की सुविधा

आधुनिक कार्य संस्कृति को ध्यान में रखते हुए सरकार ने योग्य (Eligible) कर्मचारियों को हफ्ते में अधिकतम दो दिन घर से काम (Work From Home) करने की अनुमति दे दी है। यह सुविधा कर्मचारी के पद और काम की प्रकृति पर निर्भर करेगी। सरकार का मानना है कि इससे न केवल आने-जाने में होने वाली थकान कम होगी, बल्कि कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ेगा और पारिवारिक स्थिरता मजबूत होगी।

शिफ्ट वाले कर्मचारियों के लिए अलग व्यवस्था

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अस्पतालों, सेवा केंद्रों या आपातकालीन सेवाओं जैसे विभागों में काम करने वाले शिफ्ट कर्मचारियों के लिए अलग से टाइम-टेबल तय किया जाएगा। इसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं में किसी तरह की रुकावट नहीं आने देना है। विभागों को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी जरूरत के हिसाब से समय सारणी तय करें।

संघीय सरकार भी बराबरी में

दुबई के इस कदम के साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की संघीय सरकार ने भी इसी तरह के लचीले नियमों की घोषणा की है। संघीय संस्थाएं शुक्रवार को अपनी 70 प्रतिशत तक कार्यशक्ति (Workforce) को रिमोट वर्क की अनुमति दे सकती हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि देश भर में कर्मचारी कल्याण को तरजीह दी जा रही है।

काम और आस्था का संगम

यह निर्णय खाड़ी देशों की उस परंपरा को दर्शाता है जहाँ रमजान के दौरान काम के घंटे कम किए जाते हैं, लेकिन इस बार इसे 'फैमिली इयर' से जोड़कर एक सामाजिक संदेश भी दिया गया है। सरकार का कहना है कि काम के घंटे कम होने के बावजूद उत्पादकता और संस्थागत प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। सही योजना और तकनीक के इस्तेमाल से कर्मचारियों को राहत देना संभव है। Year of the Family 

संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

राज्यसभा चुनाव की घोषणा, महाराष्ट्र से बिहार तक सियासी हलचल तेज

राजनीतिक दल अपनी-अपनी दाव-पेंच भिड़ाने में लगे हैं। यह चुनाव न केवल संसदीय राजनीति के भविष्य का निर्धारण करेंगे, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा भी तय करेंगे।

Rajya Sabha elections announced
चुनावों से तय होगी देश की राजनीतिक दिशा (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar18 Feb 2026 12:18 PM
bookmark

Rajya Sabha Elections 2026: भारत निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और बिहार की 16 राज्यसभा सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। इस ऐलान से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि इन चुनावों का असर केवल इन राज्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सियासी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

चुनाव की तिथि और प्रक्रिया

आयोग की अधिसूचना के अनुसार, नामांकन की अंतिम तिथि 5 मार्च है, जबकि नामांकन की जांच 6 मार्च को होगी। 9 मार्च तक नाम वापसी की अनुमति होगी। मतदान 16 मार्च को होगा और उसी दिन शाम 5 बजे मतगणना के साथ परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। पूरी प्रक्रिया 20 मार्च 2026 तक संपन्न हो जाएगी।

महाराष्ट्र: शरद पवार के संन्यास की आहट और नई जंग

महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा शरद पवार के भविष्य को लेकर है। वे पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास का संकेत दे चुके हैं। ऐसे में उनकी सीट पर किसका कब्जा होगा, यह सबसे बड़ा सवाल है। इस सीट के लिए धैर्यशील पाटिल, भागवत कराड, फौजिया खान, प्रियंका चतुर्वेदी, रामदास अठावले और रजनी पाटिल जैसे दिग्गजों का नाम चर्चा में है। शिवसेना-भाजपा गठबंधन और उद्धव ठाकरे गुट के बीच समीकरण बदलने के चलते यह चुनाव विशेष महत्व रखता है।  

बिहार: समीकरण बदले, क्या फिर मिलेगा मौका?

बिहार में 9 अप्रैल 2026 को अमरेंद्र धारी सिंह, प्रेम चंद गुप्ता, रामनाथ ठाकुर, हरिवंश नारायण सिंह और उपेंद्र कुशवाहा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मौजूदा गठबंधन में राजद के पास दो सीटें, जदयू और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास एक-एक सीट है। राजनीतिक समीकरणों में बदलाव और गठबंधन की स्थिति के आधार पर इन सीटों की दिशा तय होगी। कुशवाहा की उम्मीदवारी को लेकर संशय बना हुआ है, और यह चुनाव फिर से बिहार की राजनीति में नई दिशा तय कर सकता है।  

हरियाणा: बीजेपी का दबदबा, क्या भरोसा फिर कायम रहेगा?

हरियाणा में 9 अप्रैल 2026 को किरण चौधरी और राम चंदर जांगड़ा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। दोनों सीटें फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के पास हैं। पार्टी की रणनीति और राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह तय किया जाएगा कि मौजूदा प्रतिनिधियों पर भरोसा जताया जाए या नई टक्कर दी जाए।  

छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश: मुकाबला सधा हुआ

छत्तीसगढ़ में कवि तेजपाल सिंह ‘तुलसी’ और फूलो देवी नेताम का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। यहां एक-एक सीट बीजेपी और कांग्रेस के पास है, जिससे मुकाबला सीधा होगा। हिमाचल प्रदेश में इंदु बाला गोस्वामी की सीट खाली हो रही है, जो बीजेपी के खाते में है।  

राज्यसभा का राजनीतिक असर 

इन पांच राज्यों की 16 सीटों पर होने वाले चुनाव का असर केवल इन राज्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर भी दलगत संतुलन को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर महाराष्ट्र और बिहार की नतीजे केन्द्र सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अहम माने जा रहे हैं।  

समय की चुनौती और सियासी दांव-पेंच

इन चुनावों के परिणाम न केवल वर्तमान राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं, बल्कि आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही और नीतिगत फैसलों पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। सभी दल अपने-अपने रणनीतिकारों के साथ इन चुनावों को लेकर सतर्क हैं, क्योंकि यह आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की दिशा तय कर सकता है। Rajya Sabha Elections 2026

संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

महाराष्ट्र में सियासी तूफान, मुस्लिम आरक्षण खत्म, AIMIM का तीखा विरोध

महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2014 में लाए गए अध्यादेश के तहत मुस्लिम समुदाय को दी गई विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (SBC-A) की स्थिति और 5% आरक्षण अब प्रभावी नहीं रहेगा।

Maharashtra Government
महाराष्ट्र सरकार ने रद्द किया विशेष आरक्षण (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar18 Feb 2026 10:41 AM
bookmark

Fadnavis Government : महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों गर्माहट बढ़ती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-शिवसेना गठबंधन की फडणवीस सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम वर्ग को दिए गए 5% आरक्षण को खत्म करने का निर्णय लिया है, जिसने विपक्षी दलों और मुस्लिम समुदाय में हलचल मचा दी है। इस फैसले का विपक्षी दल, खासकर AIMIM ने तीखा विरोध जताते हुए इसे 'रमजान का तोहफा' करार दिया है।

सरकार का बड़ा फैसला

महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2014 में लाए गए अध्यादेश के तहत मुस्लिम समुदाय को दी गई विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (SBC-A) की स्थिति और 5% आरक्षण अब प्रभावी नहीं रहेगा। इसके अनुसार, अब कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में इस कोटे के तहत प्रवेश नहीं मिलेगा और न ही नए जाति या वैधता प्रमाणपत्र जारी किए जाएंगे। सरकार ने पहले से जारी सभी संबंधित आदेशों और परिपत्रों को भी निरस्त कर दिया है। इससे मुस्लिम युवाओं के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

AIMIM का तंज: 'रमजान का तोहफा'

AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक इम्तियाज जलील ने सोशल मीडिया पर सरकार के इस फैसले पर तीखा हमला बोलते हुए लिखा, "महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमानों को रमजान का एक तोहफा दिया है। 5% आरक्षण को खत्म कर दिया गया है।" जलील ने आरोप लगाया कि यह निर्णय उस समय लिया गया है जब हाई कोर्ट ने खुद मुस्लिम समुदाय में पढ़ाई छोड़ने की दर (ड्रॉपआउट रेट) सबसे अधिक होने का संकेत दिया था। उन्होंने कहा, "यह फैसला न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा झटका है, बल्कि मुस्लिम युवाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास है।"

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2014 का है, जब तत्कालीन कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) सरकार ने मुस्लिम समुदाय को विशेष पिछड़ा वर्ग घोषित कर 5% आरक्षण देने के लिए अध्यादेश जारी किया था। हालांकि, इसे मुंबई हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और 14 नवंबर 2014 को कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। संविधान के अनुसार, अध्यादेश को सत्र के दौरान विधायिका में कानून का रूप देना आवश्यक है। चूंकि यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई और अध्यादेश 23 दिसंबर 2014 तक कानून में परिवर्तित नहीं हुआ, इसलिए वह स्वतः ही निरस्त हो गया। वर्तमान सरकार ने इन आदेशों को औपचारिक रूप से रद्द कर स्थिति स्पष्ट कर दी है।

छात्रों और अल्पसंख्यक संस्थानों पर प्रभाव

सरकार के इस निर्णय से मुस्लिम छात्रों के लिए बड़ा झटका लगा है, जो इस कोटे का लाभ लेकर प्रवेश की उम्मीद कर रहे थे। इससे उनके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। साथ ही, सरकार ने हाल ही में 75 अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उनके दर्जे से भी हटा दिया है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय के बीच नाराजगी बढ़ रही है। इन दोनों कदमों ने राज्य की राजनीति में नई गर्माहट ला दी है और विपक्षी दलों, विशेषकर AIMIM और कांग्रेस-एनसीपी ने सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चेतावनी दी है।

राजनीतिकी हलचल और आने वाले कदम

महाराष्ट्र में इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिक्रिया तेज हो गई है। आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन और आंदोलन की संभावना बढ़ सकती है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय और उनके समर्थक इस निर्णय को अपने अधिकारों का उल्लंघन मान रहे हैं। फिलहाल, यह मामला राज्य की राजनीति का केंद्र बिंदु बना हुआ है, जिसमें सरकार की आगामी रणनीतियों पर सभी की निगाहें टिकी हैं।Fadnavis Government

संबंधित खबरें