एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को घेरा
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक अहम निर्णय दिया था। उस फैसले में कहा गया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (सब क्लासीफिकेशन) किया जा सकता है।

Creamy Layer Scheme for SC/ST Reservations : यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले और उस पर केंद्र सरकार की आगे की कार्रवाई से जुड़ा है। हाल की सुनवाई में अदालत ने सरकार से साफ-साफ पूछा है कि उस फैसले के बाद उसने क्या कदम उठाए हैं, खासकर एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के सवाल पर। इसी वजह से राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
मामला क्या है?
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक अहम निर्णय दिया था। उस फैसले में कहा गया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (सब क्लासीफिकेशन) किया जा सकता है। यानी आरक्षण के दायरे में आने वाले अलग-अलग समुदायों के बीच लाभ का बंटवारा संतुलित तरीके से किया जा सकता है, ताकि सबसे वंचित तबकों तक अवसर पहुँच सके। इसी फैसले के दौरान कुछ न्यायाधीशों ने यह भी राय रखी कि जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू है, उसी तरह एससी-एसटी में भी अपेक्षाकृत संपन्न या आगे बढ़ चुके वर्गों को अलग करने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि यह तत्काल लागू करने का आदेश नहीं था, बल्कि सरकार को नीति बनाने का संकेत था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
हालिया सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि 2024 के फैसले के बाद क्या कोई ठोस नीति, नियम या दिशा-निर्देश बनाए गए हैं? विशेष रूप से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या सरकार एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने पर विचार कर रही है या नहीं। अदालत जानना चाहती है कि सरकार का आधिकारिक रुख क्या है और उसने फैसले के अनुपालन में क्या कार्रवाई की है।
केंद्र सरकार पहले यह कह चुकी है कि संविधान में एससी-एसटी आरक्षण के संदर्भ में क्रीमी लेयर का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। सरकार का तर्क रहा है कि इन वर्गों को ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव के आधार पर आरक्षण दिया गया है, इसलिए आर्थिक मानदंड लागू करना संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से जटिल मुद्दा है। यही कारण है कि सरकार पर एक तरफ अदालत का दबाव है और दूसरी तरफ राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों का संतुलन भी देखना है।
सियासत क्यों गरम है?
यह मुद्दा सीधे तौर पर दलित राजनीति और सामाजिक न्याय की बहस से जुड़ा है।
* कुछ दल और संगठन मानते हैं कि क्रीमी लेयर लागू करने से आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे पिछड़े लोगों तक पहुँचेगा।
* वहीं कई समूहों का तर्क है कि इससे एससी-एसटी आरक्षण की मूल भावना कमजोर हो सकती है, क्योंकि उनका आरक्षण सामाजिक उत्पीड़न के आधार पर है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर। इसी वजह से यह विषय कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बन गया है।
आगे क्या हो सकता है?
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। उसे सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट जवाब देना होगा। संभावित स्थिति यह हो सकती है:
1. सरकार क्रीमी लेयर पर कोई नई नीति बनाए।
2. सरकार साफ कह दे कि वह इसे लागू नहीं करेगी।
3. या फिर मामला दोबारा बड़ी संविधान पीठ के समक्ष विस्तृत सुनवाई के लिए जाए।
जो भी फैसला होगा, उसका असर देश की आरक्षण नीति और दलित राजनीति दोनों पर दूरगामी हो सकता है।
Creamy Layer Scheme for SC/ST Reservations : यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले और उस पर केंद्र सरकार की आगे की कार्रवाई से जुड़ा है। हाल की सुनवाई में अदालत ने सरकार से साफ-साफ पूछा है कि उस फैसले के बाद उसने क्या कदम उठाए हैं, खासकर एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के सवाल पर। इसी वजह से राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
मामला क्या है?
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक अहम निर्णय दिया था। उस फैसले में कहा गया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (सब क्लासीफिकेशन) किया जा सकता है। यानी आरक्षण के दायरे में आने वाले अलग-अलग समुदायों के बीच लाभ का बंटवारा संतुलित तरीके से किया जा सकता है, ताकि सबसे वंचित तबकों तक अवसर पहुँच सके। इसी फैसले के दौरान कुछ न्यायाधीशों ने यह भी राय रखी कि जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू है, उसी तरह एससी-एसटी में भी अपेक्षाकृत संपन्न या आगे बढ़ चुके वर्गों को अलग करने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि यह तत्काल लागू करने का आदेश नहीं था, बल्कि सरकार को नीति बनाने का संकेत था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
हालिया सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि 2024 के फैसले के बाद क्या कोई ठोस नीति, नियम या दिशा-निर्देश बनाए गए हैं? विशेष रूप से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या सरकार एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने पर विचार कर रही है या नहीं। अदालत जानना चाहती है कि सरकार का आधिकारिक रुख क्या है और उसने फैसले के अनुपालन में क्या कार्रवाई की है।
केंद्र सरकार पहले यह कह चुकी है कि संविधान में एससी-एसटी आरक्षण के संदर्भ में क्रीमी लेयर का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। सरकार का तर्क रहा है कि इन वर्गों को ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव के आधार पर आरक्षण दिया गया है, इसलिए आर्थिक मानदंड लागू करना संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से जटिल मुद्दा है। यही कारण है कि सरकार पर एक तरफ अदालत का दबाव है और दूसरी तरफ राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों का संतुलन भी देखना है।
सियासत क्यों गरम है?
यह मुद्दा सीधे तौर पर दलित राजनीति और सामाजिक न्याय की बहस से जुड़ा है।
* कुछ दल और संगठन मानते हैं कि क्रीमी लेयर लागू करने से आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे पिछड़े लोगों तक पहुँचेगा।
* वहीं कई समूहों का तर्क है कि इससे एससी-एसटी आरक्षण की मूल भावना कमजोर हो सकती है, क्योंकि उनका आरक्षण सामाजिक उत्पीड़न के आधार पर है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर। इसी वजह से यह विषय कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बन गया है।
आगे क्या हो सकता है?
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। उसे सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट जवाब देना होगा। संभावित स्थिति यह हो सकती है:
1. सरकार क्रीमी लेयर पर कोई नई नीति बनाए।
2. सरकार साफ कह दे कि वह इसे लागू नहीं करेगी।
3. या फिर मामला दोबारा बड़ी संविधान पीठ के समक्ष विस्तृत सुनवाई के लिए जाए।
जो भी फैसला होगा, उसका असर देश की आरक्षण नीति और दलित राजनीति दोनों पर दूरगामी हो सकता है।












