
Special Story : भारत के अधिकतर घरों में 'ओम जय जगदीश हरे' आरती गाई जाती है। कभी ना कभी आरती आपने भी जरूर गाई होगी। क्या आपको पता है कि इस आरती को किसने लिखा अथवा इसकी रचना किसने की थी ? शायद आपको नहीं पता होगा। आज हम आपको बताते हैं कि ओम जय जगदीश हरे आरती किसने लिखी थी।
'ॐ जय जगदीश हरे' आरती के रचयिता पंडित श्रद्धाराम शर्मा थे। आज यानि 24 जून को उनकी पुण्यतिथि है। पंडित श्रद्धाराम शर्मा अथवा 'श्रद्धाराम फिल्लौरी' सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे। वे प्रसिद्ध विद्वान ज्योतिषी थे, लेकिन एक ज्योतिषी के रूप में उन्हें वह प्रसिद्धि नहीं मिली, जो इनके द्वारा लिखी गई अमर आरती "ओम जय जगदीश हरे" के कारण मिली। पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी ने इस आरती की रचना 1870 ई. में की थी। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी वाक्पटुता के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया था।
क़रीब डेढ़ सौ वर्ष में मंत्र और शास्त्र की तरह लोकप्रिय हो गई "ओम जय जगदीश हरे" आरती जैसे भावपूर्ण गीत की रचना करने वाले पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म ब्राह्मण कुल में 30 सितम्बर, 1837 में पंजाब के जालंधर ज़िले में लुधियाना के पास एक गाँव 'फ़िल्लौरी'(फुल्लौर) में हुआ था। उनके पिता जयदयालु स्वयं एक अच्छे ज्योतिषी थे। उन्होंने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी कि ये बालक अपने लघु जीवन में चमत्कारी प्रभाव वाले कार्य करेगा।
श्रद्धाराम शर्मा ने किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी, फिर भी उन्होंने मात्र सात वर्ष की आयु में ही गुरुमुखी सीख ली थी। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, पर्शियन और ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू की और कुछ ही वर्षों में वे इन सभी विषयों के निष्णात हो गए। उनका विवाह एक सिक्ख महिला महताब कौर के साथ हुआ था।
उनकी लगभग दो दर्जन से अधिक रचनाओं का पता चलता है, जिनमें संस्कृत की चार, हिंदी की बारह, उर्दू की पांच और पंजाबी की चार रचनाएं शामिल हैं। पंडित जी की ज्योतिष संबंधी एक महत्वपूर्ण लेकिन अधूरी रचना "भृगुसंहिता" (सौ कुंडलियों में फलादेश वर्णन) है। फुल्लौरी जी की अधिकांश रचनाएँ गद्य में हैं। उनके भजनों में खड़ी बोली ही व्यवहृत हुई है।
उत्तर भारत के वैष्णवजन पूजा के समय उनकी प्रसिद्ध आरती "ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भगत जनों के संकट छिन में दूर करें...." गाकर आज भी भगवान को रिझाते हैं। Special Story