बिहार में मतदाता सूची की बारीक जांच क्यों जरूरी है? जानिए पूरे मसले की जड़ें
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भारत
चेतना मंच
09 Jul 2025 08:33 PM
Bihar News : बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर सियासत गरमा गई है। विरोध के सुर लगातार तेज हो रहे हैं। लेकिन असल सवाल यह है क्या सरकार और चुनाव आयोग यह समझा पाने में नाकाम रहे हैं कि यह प्रक्रिया आखिर जरूरी क्यों है?
भरोसेमंद मतदाता सूची के बिना निष्पक्ष चुनाव मुमकिन नहीं
लोकतंत्र की नींव ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर टिकी होती है और यह तब तक संभव नहीं जब तक मतदाता सूची पूर्णत: सही और साफ न हो। चुनाव आयोग के अनुसार, बिहार में 2003 के बाद से कभी भी व्यापक स्तर पर मतदाता सूची की समीक्षा नहीं हुई है। अनुमान है कि राज्य में लगभग 8 करोड़ मतदाता हैं। इस लंबे अंतराल के चलते डुप्लिकेट नाम, मृतक मतदाता, अपात्र नागरिकों के नाम जैसी कई गंभीर खामियां सूचियों में बनी हुई हैं।
सीमांचल के चार जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव
किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जैसे सीमांचल के जिले न केवल जनसंख्या विस्फोट का सामना कर रहे हैं, बल्कि वहां जारी आधार कार्डों की संख्या अब वास्तविक जनसंख्या से भी ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यहां फर्जी वोटर और अवैध घुसपैठिए बड़े पैमाने पर मतदाता बन गए हैं? यह क्षेत्र "चिकन नेक" यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। यदि ऐसे क्षेत्रों में बिना जांच-पड़ताल के फर्जी लोगों को मतदाता बना दिया गया, तो यह केवल चुनावी निष्पक्षता ही नहीं, देश की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है।
आधार कार्ड प्राथमिक दस्तावेज
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर एक सवाल यह भी उठ रहा है कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए आधार कार्ड को प्राथमिक दस्तावेज माना जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। 8 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में निवास प्रमाण पत्र जारी करने के लिए भी आधार को ही आधार बनाया जा रहा है, जो तकनीकी और संवैधानिक दोनों ही स्तर पर चिंता का विषय है।
समय-सीमा को लेकर विपक्ष का एतराज
विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर समय सीमा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इतना विशाल कार्य महज़ तीन-चार महीनों में कैसे संभव होगा? हालांकि चुनाव आयोग को अपनी तैयारियों और तंत्र पर पूरा भरोसा है। आयोग ने अब तक 77,895 बीएलओ तैनात किए हैं और अतिरिक्त 20,603 BLO की नियुक्ति की जा रही है। साथ ही लगभग 4 लाख स्वयंसेवकों, सरकारी अधिकारियों और NCC कैडेट्स को भी जोड़ा गया है। ये संख्या दर्शाती है कि यह अभियान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। यह भी याद रखना जरूरी है कि 1990 के दशक में जब टीएन शेषन ने मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य किया था, तो उसे भी असंभव बताया गया था। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वह कार्य भी दो वर्षों में पूरा हो गया।
हजारों की संख्या में फर्जी वोटर?
चुनाव आयोग को प्राप्त शिकायतों और कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में दावा किया गया है कि बिहार के कई विधानसभा क्षेत्रों में 8 से 10 हजार तक फर्जी या मृत लोगों के नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं। कुछ याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि सीमांचल में जनसंख्या के बदलते अनुपात के पीछे अवैध प्रवासियों की बड़ी भूमिका है, जिससे स्थानीय जनसंख्या संतुलन बिगड़ रहा है। ऐसे में सूची की सफाई केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, राजनीतिक और सामाजिक संतुलन की बुनियाद है। Bihar News