‘बेटा लापता है… जवाब चाहिए’ एक पिता की लड़ाई से हिल गया प्रशासन
परिजनों ने 17 जुलाई 2024 को चिनहट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। परिवार का कहना है कि रंजन बिना मोबाइल और पैसे के घर से निकले थे। पिता ने आरोप लगाया कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने शुरुआती दौर में जितनी तेजी और गंभीरता दिखानी चाहिए थी, वह नजर नहीं आई।

UP News : उत्तर प्रदेश में लापता लोगों के मामलों ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक गुमशुदगी मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) के तौर पर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि लापता मामलों में तेजी और जवाबदेही नहीं बढ़ी, तो यह सिर्फ पुलिसिंग ही नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था पर भरोसे का भी मुद्दा बन जाएगा।
लखनऊ का मामला बना प्रदेशव्यापी सवाल
यह प्रकरण लखनऊ के गोमती नगर स्थित विकल्प खंड निवासी 32 वर्षीय रंजन कुमार के लापता होने से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, रंजन 15 जुलाई 2024 को शाम करीब 6 बजे घर से निकले थे, लेकिन उसके बाद उनका कोई सुराग नहीं मिला। परिजनों ने 17 जुलाई 2024 को चिनहट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। परिवार का कहना है कि रंजन बिना मोबाइल और पैसे के घर से निकले थे। पिता ने आरोप लगाया कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने शुरुआती दौर में जितनी तेजी और गंभीरता दिखानी चाहिए थी, वह नजर नहीं आई। इसी निराशा के बीच पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के सामने आए आंकड़े, बेंच ने जताई हैरानी
जनवरी 2026 की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने पुलिस तकनीकी सेवा मुख्यालय से संबंधित आंकड़े रखे गए। इन आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच उत्तर प्रदेश में 1,08,300 लोगों के लापता होने की शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन इनमें से केवल 9,700 मामलों में ही ट्रेसिंग/खोजबीन की कार्रवाई दर्ज होने की बात सामने आई। कोर्ट ने इस स्थिति पर तीखा सवाल करते हुए पूछा कि शेष मामलों में तलाश के प्रयास इतने सीमित क्यों रहे और इसका औचित्य क्या है?
कोर्ट ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया
अदालत ने इस प्रकरण में पुलिस के रवैये को कैजुअल और कैवलियर बताते हुए नाराजगी दर्ज की। अदालत ने राज्य सरकार को साफ निर्देश दिए कि गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के जरिए विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लापता मामलों की जांच आखिर किस स्तर पर और क्यों कमजोर पड़ रही है। याचिकाकर्ता पक्ष ने दलील दी कि यह मामला उस प्रवृत्ति का उदाहरण बन गया है, जहां कई बार लापता व्यक्तियों की शिकायतों को औपचारिकता की तरह लिया जाता है और जब शुरुआती समय निकल जाता है, तो सुराग मिलना और मुश्किल हो जाता है। कोर्ट ने 6 फरवरी 2026 को आदेश दिया कि इस याचिका को PIL के रूप में पंजीकृत किया जाए और राज्य सरकार से लापता मामलों से जुड़े समग्र आंकड़े, उठाए गए कदम और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा जाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि लापता मामलों में तेज, प्रभावी और समयबद्ध जांच की व्यवस्था मजबूत करना बेहद जरूरी है। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश में लापता लोगों के मामलों ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक गुमशुदगी मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) के तौर पर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि लापता मामलों में तेजी और जवाबदेही नहीं बढ़ी, तो यह सिर्फ पुलिसिंग ही नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था पर भरोसे का भी मुद्दा बन जाएगा।
लखनऊ का मामला बना प्रदेशव्यापी सवाल
यह प्रकरण लखनऊ के गोमती नगर स्थित विकल्प खंड निवासी 32 वर्षीय रंजन कुमार के लापता होने से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, रंजन 15 जुलाई 2024 को शाम करीब 6 बजे घर से निकले थे, लेकिन उसके बाद उनका कोई सुराग नहीं मिला। परिजनों ने 17 जुलाई 2024 को चिनहट थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। परिवार का कहना है कि रंजन बिना मोबाइल और पैसे के घर से निकले थे। पिता ने आरोप लगाया कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने शुरुआती दौर में जितनी तेजी और गंभीरता दिखानी चाहिए थी, वह नजर नहीं आई। इसी निराशा के बीच पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के सामने आए आंकड़े, बेंच ने जताई हैरानी
जनवरी 2026 की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने पुलिस तकनीकी सेवा मुख्यालय से संबंधित आंकड़े रखे गए। इन आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच उत्तर प्रदेश में 1,08,300 लोगों के लापता होने की शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन इनमें से केवल 9,700 मामलों में ही ट्रेसिंग/खोजबीन की कार्रवाई दर्ज होने की बात सामने आई। कोर्ट ने इस स्थिति पर तीखा सवाल करते हुए पूछा कि शेष मामलों में तलाश के प्रयास इतने सीमित क्यों रहे और इसका औचित्य क्या है?
कोर्ट ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया
अदालत ने इस प्रकरण में पुलिस के रवैये को कैजुअल और कैवलियर बताते हुए नाराजगी दर्ज की। अदालत ने राज्य सरकार को साफ निर्देश दिए कि गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के जरिए विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लापता मामलों की जांच आखिर किस स्तर पर और क्यों कमजोर पड़ रही है। याचिकाकर्ता पक्ष ने दलील दी कि यह मामला उस प्रवृत्ति का उदाहरण बन गया है, जहां कई बार लापता व्यक्तियों की शिकायतों को औपचारिकता की तरह लिया जाता है और जब शुरुआती समय निकल जाता है, तो सुराग मिलना और मुश्किल हो जाता है। कोर्ट ने 6 फरवरी 2026 को आदेश दिया कि इस याचिका को PIL के रूप में पंजीकृत किया जाए और राज्य सरकार से लापता मामलों से जुड़े समग्र आंकड़े, उठाए गए कदम और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा जाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि लापता मामलों में तेज, प्रभावी और समयबद्ध जांच की व्यवस्था मजबूत करना बेहद जरूरी है। UP News












